के लिए बड़ा ‘खतरा’ तो नहीं, क्या यह रणनीतिक चूक होगी?
सिटी पोस्ट लाइव : असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के महागठबंधन में शामिल होने से बिहार में राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं. इससे मुस्लिम वोटों का बिखराव रुक सकता है और महागठबंधन को फायदा हो सकता है. लेकिन अगर हिन्दुओं का ध्रुवीकरण हो गया तो क्या होगा.सवाल ये भी है कि क्या असदुद्दीन ओवैसी, राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के साथ एक मंच पर नजर आएंगे? अगर ऐसा हुआ तो इसका परिणाम क्या होगा? क्या यह एनडीए के लिए नुकसानदायक होगा? या फिर क्या महागठबंधन को इसका फायदा होगा?
असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानी एआईएमआईएम (AIMIM) ने वर्ष 2020 में सीमांचल की जिन 20 सीटों पर चुनाव लड़ा था उसमें एआईएमआईएम को 14.3% वोट मिले थे. जाहिर है कि यह विधानसभा चुनाव के लिहाज से बड़ा आंकड़ा है. यह मत प्रतिशत यह भी साबित करता है कि 2015 के चुनाव में जहां एआईएमआईएम 0.50% वोट प्राप्त किया था और कोई भी सीट नहीं जीत पाई थी, वहीं 2020 में 14% से अधिक मत ले आना अपने आप में बड़ा सियासी संदेश है.
2024 के लोकसभा चुनाव में असदुद्दीन ओवासी की पार्टी ने आठ सीटों पर अकेले अपने उम्मीदवार उतारे, लेकिन सभी कैंडिडेट हार गए. हालांकि, पार्टी ने 4.5% वोट शेयर प्राप्त किया था. अब एआईएमआईएम के महागठबंधन के साथ आने को लेकर यही कहा जा रहा है कि मुस्लिम वोटों का बिखराव रुकेगा और इसका सीधा फायदा महागठबंधन को होगा. लेकिन, इसके साथ ही बड़ा सवाल यह कि पहले से ही 6 पार्टियों के महागठबंधन के एआईएमआईएम की एंट्री कितनी सहज होगी. क्या बाकी दल अपने हिस्सों की सीटों को दांव पर लगाएंगे? यही नहीं क्या कांग्रेस और आरजेडी अपने कोटे से सीटें ओवैसी को देंगे?
सीमांचल के महत्वपूर्ण सीटों पर असदुद्दीन ओवैसी दावेदारी क्या महागठबंधन को मजबूर हो मंजूर होगी? असदुद्दीन ओवैसी एक मुस्लिम चेहरा तो हैं, लेकिन वह इतने आक्रामक और कट्टर दिखते हैं कि महागठबंधन पर इसका उल्टा रिएक्शन भी हो सकता है. किशनगंज की 67 प्रतिशत मुस्लिम आबादी का ध्रुवीकरण हुआ तो यह तो महागठबंधन को बंपर फायदा होगा, लेकिन कटिहार में 38% मुस्लिम आबादी, अररिया में 32% और पूर्णिया में 30% मुस्लिम आबादी के ध्रुवीकरण के साथ अगर हिंदू आबादी कहीं गोलबंद हो गई तो इसका सीधा नुकसान महागठबंधन को होगा.
एक समीकरण तीसरे मोर्चे को लेकर भी है. बीएसपी और AIMIM दो ऐसी पार्टियां हैं, जिनका बिहार के एक लिमिटेड इलाके में अपना जनाधार तो है, लेकिन ये किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं. प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी भी मैदान में हैं. ऐसे में एक तीसरा मोर्चा बनने की संभावना दिखाई दे रही है. लेकिन, यह तभी तक है जब तक असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम महागठबंधन में शामिल नहीं होती. अगर एआईएमआईएम महागठबंधन में शामिल हुई तो तीसरे मोर्चे की संभावना लगभग खत्म हो जाएगी.