जब दोनों पार्टियों को मिलें बराबर सीटें, तब कौन बनाएगा सरकार? जानिए राज्यपाल की भूमिका कितनी अहम!…

Ritu Raj

भारत की संसदीय व्यवस्था में विधानसभा चुनाव के बाद अगर कोई एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत न मिले, तो इसे हंग असेंबली (Hung Assembly) कहा जाता है। अगर दो पार्टियां बराबर सीटें हासिल कर लें, तो सरकार बनाने की प्रक्रिया थोड़ी जटिल हो जाती है। यहां राज्यपाल की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि वे संविधान के अनुच्छेद 163 और 164 के तहत मुख्यमंत्री (CM) की नियुक्ति करते हैं। आइए स्टेप बाय स्टेप समझते हैं:

हंग असेंबली की स्थिति क्या है?
विधानसभा में कुल सीटों का बहुमत आमतौर पर आधी से ज्यादा (उदाहरण: 100 सीटों वाली विधानसभा में 51) होता है।
अगर कोई पार्टी बहुमत न पा सके, तो राज्यपाल को तय करना पड़ता है कि किसे सरकार बनाने का मौका दिया जाए।
बराबर सीटों का मामला: अगर दो पार्टियां बिल्कुल बराबर सीटें (जैसे दोनों को 50-50) पा लें, तो राज्यपाल सबसे पहले सबसे बड़े समर्थन वाली पार्टी या गठबंधन को आमंत्रित करते हैं। यह ‘सबसे बड़ा समर्थन’ प्री-पोल एलायंस (चुनाव से पहले गठबंधन), पोस्ट-पोल सपोर्ट (चुनाव बाद समर्थन पत्र) या अन्य दलों के समर्थन पर आधारित होता है।
सरकार बनाने की प्रक्रिया:
सबसे बड़ी पार्टी को बुलाना – राज्यपाल सबसे पहले सबसे ज्यादा सीट वाली पार्टी के नेता को आमंत्रित करते हैं। लेकिन बराबर सीटों पर, वे सर्कारिया कमीशन की सिफारिशों का पालन करते हैं, जो कहती हैं कि राज्यपाल को ‘सबसे चौड़े राजनीतिक समर्थन’ वाली पार्टी या गठबंधन को बुलाना चाहिए। अगर बराबर हो, तो राज्यपाल दलों से समर्थन पत्र मांग सकते हैं।
बहुमत साबित करना – आमंत्रित नेता को 30 दिनों के अंदर विधानसभा में बहुमत साबित करना होता है (फ्लोर टेस्ट)। अगर वे गठबंधन बना लें और बहुमत दिखा दें, तो सरकार बन जाती है।
अगर कोई बहुमत न बना सके – अगर कोई भी गठबंधन बहुमत न दिखा सके, तो राज्यपाल राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकते हैं (अनुच्छेद 356 के तहत)। इससे केंद्र सरकार राज्य को सीधे संभालती है, जब तक नए चुनाव न हों।
अगर फिर भी बहुमत नहीं बन पाए तो क्या होता है?
– अगर फ्लोर टेस्ट (Floor Test) में कोई बहुमत नहीं जुटा पाता, तो कुछ वैकल्पिक रास्ते अपनाए जाते हैं। कभी-कभी ऐसा होता है कि न तो कोई पार्टी बहुमत जुटा पाती है और न ही गठबंधन बनता है। ऐसे में कुछ और विकल्प सामने आते हैं, जिन्हें नीचे विस्तार से समझाया गया है:
अल्पमत सरकार- अगर एक पार्टी या गठबंधन को थोड़ा ज्यादा समर्थन है (लेकिन पूर्ण बहुमत नहीं), तो राज्यपाल उसे सरकार बनाने का मौका दे सकते हैं। यह सरकार अल्पमत में चलती है और बाहर से समर्थन (Outside Support) पर निर्भर रहती है।
ऐसी सरकार तब तक चलती है जब तक विपक्ष उसे गिरा नहीं देता—यानी अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion) पास नहीं हो जाता।
सत्ता-साझेदारी- इसमें दोनों पार्टियां (या गठबंधन) आपसी सहमति से तय कर सकती हैं कि वे मिला-जुला शासन करेंगे। जैसे, आधा कार्यकाल एक पार्टी का मुख्यमंत्री रहे, फिर आधा कार्यकाल दूसरी पार्टी का। यह रोटेशनल सीएम मॉडल कहलाता है।
संविधान में इसका स्पष्ट प्रावधान नहीं है, लेकिन राजनीतिक समझौते से संभव है। राज्यपाल इस पर सहमति होने पर नियुक्ति करते हैं।
फिर से चुनाव- अगर कोई स्थिर सरकार नहीं बन पाती, न अल्पमत सरकार चल पाए, न गठबंधन बने, तो राज्यपाल विधानसभा को भंग (Dissolve) करने की सिफारिश राष्ट्रपति को करते हैं। इसके बाद, अनुच्छेद 174 के तहत फिर से चुनाव करवाए जाते हैं।

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हालांकि, यह लास्ट ऑप्शन होता है, क्योंकि नए चुनाव का खर्च (करोड़ों रुपये) और राजनीतिक अस्थिरता दोनों ही बड़ी चुनौतियां होती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्यपाल को पहले हर संभव कोशिश करनी चाहिए कि सरकार बने। इससे पहले राष्ट्रपति शासन, अनुच्छेद 356 लग सकता है, जहां केंद्र राज्य को सीधे संभालता है, आमतौर पर 6 महीने तक, लेकिन संसद की मंजूरी से बढ़ाया जा सकता है।

राष्ट्रपति शासन:
अगर ऊपर के सभी विकल्प फेल हो जाएं, तो राज्यपाल राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करते हैं। यह तब तक रहता है जब तक नई सरकार न बने या नए चुनाव न हों।

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