बिहार के छपरा जिले की वह पावन भूमि, जहाँ सरयू की कलकल धाराएँ संघर्ष का गीत सुनाती हैं, वहीं 1960 के दशक में एक ऐसे व्यक्तित्व का उदय हुआ जिसे आज हम मृत्युंजय दुबे के नाम से जानते हैं। एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार, पिता के समाजवादी संस्कार और माँ के धैर्य की लोरी—यही वह पाठशाला थी जिसने मृत्युंजय जी को सादगी और निष्ठा का पाठ पढ़ाया।

संघर्ष से शिखर तक;
एक ‘एक्स्ट्रा क्लर्क’ की मामूली नौकरी से शुरू हुआ सफर, सरकारी फाइलों के उन अंबारों के बीच से होकर गुजरा जहाँ अक्सर सपने दम तोड़ देते हैं। दिन भर दफ्तर की व्यस्तता और फिर खेत की मिट्टी से जुड़ाव ने उन्हें शारीरिक रूप से थकाया तो बहुत, पर उनके आत्मबल को और फौलादी बना दिया। भ्रष्टाचार के उस दौर में भी मृत्युंजय जी एक ऐसे अडिग हिमालय बने रहे, जिसे प्रलोभन की कोई भी आँधी हिला न सकी। ईमानदारी उनके व्यक्तित्व का आभूषण नहीं, बल्कि उनकी आत्मा थी। वहीं, सेवानिवृत्ति के बाद जहाँ लोग विश्राम खोजते हैं, मृत्युंजय जी ने अपने जीवन की सबसे बड़ी तपस्या को पूर्ण किया। दशकों के शोध और बिहार की रग-रग को समझने के बाद उन्होंने अपनी पहली कृति ‘बिहारी गौरव’ समाज को समर्पित की। यह केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक बेटे का अपनी मातृभूमि को दिया गया सबसे अमूल्य उपहार है।

इतिहास के झरोखे से भविष्य की पुकार;
मृत्युंजय दुबे की यह कृति बिहार की उस सोई हुई चेतना को जगाने का शंखनाद है, जिसने सदियों तक अखंड भारत का नेतृत्व किया। लेखक ने बड़ी ही कुशलता से इतिहास और वर्तमान के बीच एक ऐसा सेतु बनाया है, जो आने वाली पीढ़ियों को गौरवान्वित करेगा। पुस्तक में स्वामी सहजानंद सरस्वती के त्याग से लेकर राजकुमार शुक्ल की उस जिजीविषा तक का वर्णन है, जिसने मोहनदास करमचंद गांधी को ‘महात्मा’ बनाने की आधारशिला रखी। दरअसल, यह पुस्तक केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। इसमें जयपाल सिंह मुंडा की जनजातीय गर्जना है, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई की पाकीजगी है, और आनंद कुमार जैसे आधुनिक द्रोणाचार्यों का विजन भी है। सामाजिक शिल्पकार डॉ. बिंदेश्वर पाठक जैसे नायकों के माध्यम से लेखक ने यह सिद्ध किया है कि बिहार ने सदैव मानवता को सेवा का नया मार्ग दिखाया है।

एक नई पीढ़ी के लिए मशाल;
70 की उम्र पार कर चुके मृत्युंजय जी की आँखों में आज भी वही छपरा वाली चमक है। उनका कहना है कि “बिहार ने मुझे गढ़ा है, अब मेरी बारी है कि मैं बिहार के उस गौरव को विश्व पटल पर पुनः स्थापित करूँ।” स्पर्श पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक आज हर उस युवा के हाथ में होनी चाहिए जो अपनी जड़ों को तलाश रहा है। यह कृति बताती है कि संसाधन कम हो सकते हैं, पर संकल्प यदि दृढ़ हो तो सादगी के साथ भी इतिहास रचा जा सकता है।