सिटी पोस्ट लाइव
बिहार की न्यायिक प्रणाली को आधुनिक बनाने के दावों के बीच एक कड़वी सच्चाई सामने आई है। पटना हाईकोर्ट में ई-फाइलिंग और वर्चुअल सुनवाई के इस दौर में ‘कमजोर इंटरनेट’ न्याय के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा बन गया है। इस समस्या को लेकर अधिवक्ता ओम प्रकाश ने हाईकोर्ट में एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) दायर की है। याचिका में मांग की गई है कि कोर्ट परिसर और प्रत्येक कोर्ट रूम में उच्च गति (High-Speed) की इंटरनेट कनेक्टिविटी और निर्बाध वाई-फाई की सुविधा समयबद्ध तरीके से बहाल की जाए।
डिजिटल विजन और जमीनी हकीकत में फासला
याचिकाकर्ता का तर्क है कि आधुनिक न्यायिक प्रणाली के लिए इंटरनेट अब कोई ‘लक्जरी’ नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है। याचिका में इस बात पर गहरा दुख जताया गया है कि पटना हाईकोर्ट ने ई-कोर्ट प्रणाली, वर्चुअल हाइब्रिड सुनवाई, ऑनलाइन कॉज लिस्ट और ई-फाइलिंग जैसे आधुनिक प्लेटफॉर्म तो अपना लिए हैं, लेकिन इनके सुचारू संचालन के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा (Infrastructure) नदारद है। कोर्ट के गलियारों और कमरों में सिग्नल इतने कमजोर हैं कि डिजिटल केस मैनेजमेंट सिस्टम तक पहुँचना भी एक चुनौती बन गया है।
अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मौलिक अधिकार की दुहाई
अधिवक्ता ओम प्रकाश ने इस मुद्दे को सीधे तौर पर भारत के संविधान से जोड़ा है। उन्होंने दलील दी है कि निर्बाध इंटरनेट की अनुपस्थिति न्याय के प्रशासन में गंभीर बाधा डालती है। इसे उन्होंने अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत प्राप्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है। याचिका में मांग की गई है कि डिजिटल सेवाओं को सुरक्षित और प्रभावी बनाने के लिए एक ठोस सुरक्षा और रखरखाव नीति तैयार की जाए।
अधिकारियों की चुप्पी पर उठे सवाल
याचिका में बिहार सरकार और हाईकोर्ट के महानिबंधक (Registrar General) की भूमिका पर भी तीखे सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि अधिकारी मौजूदा खराब परिस्थितियों और वकीलों को होने वाली तकनीकी परेशानियों से पूरी तरह वाकिफ हैं, फिर भी उनकी उदासीनता बनी हुई है। इंटरनेट के बार-बार कटने से वर्चुअल सुनवाई के दौरान ऑडियो-वीडियो बाधित हो जाता है, जिससे न केवल वकीलों का समय बर्बाद होता है, बल्कि वादकारियों को न्याय मिलने में भी अनावश्यक देरी होती है।