By, Shrikant Pratyush
News 24X7 Hour

अपनी मां को लेकर लिखा आईएएस रमेश घोलप का फेसबुक पोस्ट सुर्खियों में

;

- sponsored -

भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी और कोडरमा के उपायुक्त रमेश घोलप का एक फेसबुक पोस्ट सुर्खियों में है।

[pro_ad_display_adzone id="49226"]

-sponsored-

सिटी पोस्ट लाइव, रांची: भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी और कोडरमा के उपायुक्त रमेश घोलप का एक फेसबुक पोस्ट सुर्खियों में है। सोशल मीडिया पर उसे खूब पढ़ा और साझा (शेयर) किया जा रहा है, समर्थन में प्रतिक्रियाओं का दौर जारी है। उपायु्क्त ने यह पोस्ट अपनी मां को लेकर लिखा है-‘‘ जब वह उनके दफ्तर में आई थीं। आईएएस रमेश घोलप की मां ने चूड़ियां बेचकर उन्हें पढ़ाया है, गृहस्थी संभालने में उन्हें कठिन और विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है।  एक दौर आया था जब रमेश घोलप भी मां के साथ चूड़ियां बेचने निकलते।

आईएएस रमेश घोलप का फेसबुक पोस्ट
रमेश घोलप ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा है- आठ बच्चों में सबसे छोटी होने के कारण वह सबकी ’लाडली’ थी। घर में उसकी हर जिद पूरी करने के लिए चार बड़े भाई, तीन बहनें और माता-पिता थे। यह बात वह हमेशा गर्व के साथ कहती है।  ’फिर तुमको बचपन में स्कूल में भेजकर पढ़ाया क्यों नहीं?’ इस सवाल का उसके पास कोई जवाब नहीं होता। इस बात का उसे दुख ज़रूर है, पर इसके लिए वह किसी को दोषी नहीं मानती।

शादी के बाद वह लगभग मायके जितने ही बड़े परिवार की ’बड़ी बहु’ बनी थी।  उससे बातचीत के क्रम में कभी भी शिकायत के सुर नहीं सुने, लेकिन लगभग 1985 में गांव देहात में जो सामाजिक व्यवस्थाएँ थीं उसके अनुरूप माता-पिता की ’छोटी लाडली बेटी’ और ससुराल की ’बड़ी बहु’ में जो फ़र्क़ था उसे उसने करीब से देखा था। जिस व्यक्ति से शादी हुई है, उनको शराब पीने की आदत है, यह पता चलने के बाद, कई बार उस आदत के परिणाम भुगतने के बाद भी कभी उसने अपने मायके में माता-पिता से इसकी शिकायत नहीं की। ख़ुद के दुःख को नज़र अंदाज़ कर परिवार के भविष्य को सोचकर वह लड़ती रही। हालात की ज़ंजीरो को तोड़कर अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए और घर चलाने के लिए ख़ुद को भी कमाई के लिए कुछ करना होगा , इस सच्चाई को स्वीकार कर उसने रिश्तेदारों के विरोध के बावजूद चूड़ियाँ बेचने का काम शुरू किया। गांव-गांव जाकर चूड़ियाँ बेची।

Also Read
[pro_ad_display_adzone id="49171"]

-sponsored-

तुम पढ़ेगा, तो संघर्ष पूरा होगा
दो बच्चों को पढ़ाने और पति के बिगड़ते शारीरिक स्वास्थ्य का चिकित्सा उपचार करवाने के लिए वह परिस्थितियों से दो हाथ कर ’मर्दानी’ की तरह लड़ती रही। पति की मृत्यु के तीसरे दिन मुझे यह कहकर कॉलेज की परीक्षा के लिए भेजा था कि ’तुमने अपने पिता को वचन दिया था, की जब मेरा 12वीं का रिजल्ट आएगा तो आपको मेरा अभिमान होगा। रिजल्ट के दिन वो जहां भी होंगे उनको तुझपर पर गर्व होना चाहिए। तू पढ़ेगा तभी हम लोगों का संघर्ष समाप्त होगा।’ उस वक़्त उसने एक ’कर्तव्य कठोर माँ’ की भूमिका निभाई थी। मेरे बड़े भाई का शिक्षक का डिप्लोमा पूर्ण हुआ था. मैं भी डिप्लोमा की पढ़ाई कर रहा था और बड़े भाई को नौकरी नहीं लग रही थी, तब बहुत लोगों ने उसे कहा कि अब पढाई छोड़कर बड़े बेटे को गाँव में मज़दूरी के लिए भेज दो।’ लेकिन ’बड़ा बेटा मज़दूरी नहीं बल्कि नौकरी ही करेगा,  यह कहकर वह चूड़ियाँ बेचने के साथ साथ दूसरे गाँव में भी मज़दूरी के लिए जाने लगी और बड़े बेटे को आगे की पढ़ाई के लिए शहर भेज दिया।

अपना घर नहीं था  
मुझे 2009 में प्राथमिक शिक्षक की नौकरी लगी। हमलोगों को रहने के लिए ख़ुद का घर नहीं था, तब मैंने टीचर की सरकारी नौकरी का इस्तीफ़ा देकर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करने का निर्णय लिया।उस समय भी वह मेरे निर्णय के साथ खड़ी रही। मां ने कहा, ’’हम लोगों का संघर्ष और कुछ दिन रहेगा, लेकिन तुम्हारा जो सपना है उसे हासिल करने के लिये तू पढ़ाई कर यह कहकर मेरे ऊपर ’विश्वास’ दिखानेवाली मेरी ’आक्का’ (माँ) और मेरे विपरीत हालात यही पढ़ाई की दिनों में सबसे बड़ी प्रेरणा थी। सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के दिनों में जब भी पढ़ाई से ध्यान विचलित होता था, तब मुझे दूसरों की खेत में जाकर मज़दूरी करनेवाली मेरी माँ याद आती थीं’’।

मेरे ऊपर के उसके विश्वास को सही साबित कर मैं 2012 में आईएएस (उसकी भाषा में ’कलेक्टर’) बना। पिछले साल जून में मैंने दूसरी बार ’कलेक्टर’ का पदभार ग्रहण किया। उसके बाद वह एक दिन ऑफिस में आयी थी। बेटे के लिए अभिमान उसके चेहरे पर साफ़ दिखायी दे रहा था। उसकी भरी हुयी आँखो के देखकर मैं सोच रहा था, ’जिले की सभी लड़कियों को शिक्षा मिलनी चाहिए।इसकी ज़िम्मेदारी कलेक्टर पर होती है, यह सोचकर उसके अंदर की उस लड़की को क्या लग रहा होगा जो बचपन में शिक्षा नहीं ले पायी थी?’ अवैध शराब के उत्पादन और बिक्री रोकने के लिए हम प्रयास करते है यह सुनकर पति की शराब की आदत से जिस महिला का संसार ध्वस्त हुआ था, उसके अंदर की वह महिला क्या सोच रही होगी?, जिले के सभी सरकारी अस्पतालों में सरकार की सभी जन कल्याणकारी आरोग्य योजना एवं सुविधाएँ आम लोगों तक पहुँचे इसके लिए हम प्रयास करते है यह मेरे द्वारा कहने पर, पति की बीमारी के दौरान जिस पत्नी ने सरकारी अस्पताल की अव्यवस्था एवं उदासीनता को बहुत नज़दीक से झेला था, उसके अंदर की उस पत्नी को क्या महसूस हो रहा होगा?, संघर्ष के दिनों में जब सर पर छत नहीं था, तब हम लोगों का नाम भी बीपीएल में दर्ज करकर हमको एक ’इंदिरा आवास’ का घर दे दीजिए इस फ़रियाद को लेकर जिस महिला ने कई बार गाँव के मुखिया और हल्का कर्मचारी के ऑफिस के चक्कर काटे थे, उस महिला को अब अपने बेटे के हस्ताक्षर से जिले के आवासहीन ग़रीब लोगों को घर मिलता है यह समझने पर उसके मन में क्या विचार आ रहें होंगे?, पति की मृत्यू के बाद विधवा पेंशन स्वीकृत कराने के नाम से एक साल से ज़्यादा समय तक गाँव की एक सरकारी महिला कर्मी जिससे पैसे लेती रही थी, उस महिला के मन में आज अपना बेटा कैम्प लगाकर विधवा महिलाओं को तत्काल पेंशन स्वीकृत कराने का प्रयास करता है यह पता चलने पर क्या विचार आये होंगे?’       आईएएस बनने के बाद पिछले ६ साल में उसने मुझे कई बार कहा है, “रमू, जो हालात हमारे थे, जो दिन हम लोगों ने देखे है वैसे कई लोग यहाँ पर भी है। उन ग़रीब लोगों की समस्याएँ पहले सुन लिया करो, उनके काम प्राथमिकता से किया करो। ग़रीब, असहाय लोगों की सिर्फ़ दुवाएँ कमाना। भगवान तुझे सब कुछ देगा!’’ आईएएस रमेश घोलप ने अंत मेंं यह भी लिखा  एक बात पक्की है-’संस्कार और प्रेरणा का ऐसा विश्वविद्यालय जब घर में होता है, तब संवेदनशीलता और लोगों के लिए काम करने का जुनून ज़िंदा रखने के लिए और किसी बाहरी चीज़ की ज़रूरत नहीं होती।’

प्रशासनिक कामकाज में बेहद दक्ष है रमेश घोलप
आईएएस रमेश घोलप को प्रशासनिक कामकाज में बेहद दक्ष माना जाता है।  इसके साथ ही आम आदमी की शिकायतों, मुश्किलों को निपटाने तथा जरूरतमंद बच्चों खासकर लड़कियों को शिक्षा के लिए प्रेरित और मदद करने में भी उनकी अलग पहचान रही है। मूल तौर पर महाराष्ट्र के एक गांव से आने वाले रमेश घोलप चित्रकारी, पेंटिंग और फूल पौधे लगाने में भी काफी रुचि रखते हैं। समय मिलने पर वह अपना समय ऐसे रचनात्मक कार्यों में व्यतीत करते हैं, मराठी भाषा में वे हास्य कविताएं रचने के भी शौकीन हैं।  घोलप कई मौके पर वे बेसहारा बच्चों को लेकर खुद स्कूल चले आते हैं और अभिवावक बनकर स्कूल में दाखिला दिलाते हैं। बीते अगस्त महीने में गणेश चतुर्थी उत्सव को लेकर उपायुक्त रमेश घोलप ने मिट्टी से खुद गणेश की प्रतिमा गढ़ी है, इसे उन्होंने ’इको फ्रेंडली गणेशा’ बताया है। 14 नवंबर को उपायुक्त अपनी पत्नी के साथ कोडरमा ज़िले के सुदूरवर्ती क्षेत्र जियोरायडीह और बिंडोमोड़ में बसे आदिम जनजाति समुदाय के बिरहोर परिवारों के साथ दीपावली मनाने पहुंचे थे।

इस मौके पर उन्होंने बिरहोरों को दीया, मिठाई, कंबल दिए।साथ ही दिवाली के लिए खास घर पर बनाई गयी मिठाइयों (महाराष्ट्र में उसे ’दिवाली का फराल’ बोलते हैं) बांटे। बच्चों को कॉपी कलम दिए और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए बीडीओ को आवश्यक निर्देश दिए।  इससे पहले 10 नवंबर को उपायुक्त सरकारी अधिकारियों के साथ कुम्हारों के घरों को पहुंचे थे और उनका साहस बढ़ाने के लिए एक लाख रुपए के दीये खरीदे थे।  इसके साथ ही उपायुक्त ने संदेश दिया, ’’आप सब भी गरीबों के घर में रोशनी जलाने वाली दिवाली मनाएं।’’

;

-sponsored-

Comments are closed.