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बिहार की राजनीति में करीब दो दशकों तक सत्ता के शीर्ष पर रहने वाले नीतीश कुमार ने अब राज्यसभा जाने का निर्णय लिया है। बख्तियारपुर की गलियों से निकलकर दिल्ली की संसद तक पहुँचने का उनका यह सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। कभी राजनीति छोड़ने का मन बना चुके ‘मुन्ना’ (नीतीश कुमार का घरेलू नाम) आज बिहार के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले मुख्यमंत्री के रूप में इतिहास दर्ज करा चुके हैं।
बिजली विभाग की नौकरी छोड़ी और ‘संपूर्ण क्रांति’ में कूदे
1 मार्च 1951 को जन्मे नीतीश कुमार पढ़ाई में मेधावी थे। उन्होंने बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज (अब NIT पटना) से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री ली। उन्हें रांची में बिजली विभाग में ट्रेनी इंजीनियर की नौकरी भी मिल गई थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। जयप्रकाश नारायण (जेपी) के ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन की लहर ने युवा नीतीश को ऐसा प्रभावित किया कि उन्होंने सुरक्षित भविष्य वाली नौकरी को लात मार दी और आंदोलन की आग में कूद पड़े। आपातकाल के दौरान उन्हें 9 महीने जेल में भी बिताने पड़े।
शुरुआती हार से टूटे, पर 1985 ने बदल दी तकदीर
नीतीश कुमार का शुरुआती राजनीतिक सफर कांटों भरा था। 1977 और 1980 के विधानसभा चुनावों में उन्हें लगातार दो बार हार का सामना करना पड़ा। वे इतने हताश हो गए थे कि उन्होंने राजनीति छोड़ने तक का मन बना लिया था। लेकिन 1985 में हरनौत सीट से मिली पहली जीत ने उनके भीतर एक नए नेता को जन्म दिया। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और 1989 में पहली बार संसद (लोकसभा) पहुँचे।
अटल बिहारी वाजपेयी के खास और ‘रेलवे’ के सुधारक
केंद्र की राजनीति में नीतीश कुमार ने अपनी कार्यकुशलता से अटल बिहारी वाजपेयी का दिल जीत लिया। रेल मंत्री के रूप में उन्होंने ‘तत्काल टिकट’ जैसी क्रांतिकारी योजना शुरू की, जिसका लाभ आज करोड़ों भारतीय उठा रहे हैं। हालांकि, गैसल रेल दुर्घटना के बाद नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देकर उन्होंने अपनी एक अलग छवि पेश की।
सुशासन का दौर और 10 बार शपथ लेने का रिकॉर्ड
2005 में जब नीतीश कुमार ने बिहार की कमान संभाली, तब राज्य ‘जंगलराज’ के ठप्पे से जूझ रहा था। उन्होंने कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता दी और ‘सुशासन बाबू’ के रूप में अपनी पहचान बनाई। महिलाओं को पंचायतों में 50% आरक्षण और अति पिछड़ों को मुख्यधारा में लाना उनकी मास्टरस्ट्रोक नीतियां रहीं।
भले ही विरोधियों ने बार-बार पाला बदलने के कारण उन्हें ‘पलटूराम’ कहा, लेकिन हकीकत यह है कि बिहार की राजनीति बीते 20 सालों से उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती रही। 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना उनके अदम्य राजनीतिक कौशल का प्रमाण है। आज जब वे राज्यसभा के लिए नामांकन कर रहे हैं, तो जेडीयू कार्यकर्ताओं की आंखों में आंसू इस बात की तस्दीक करते हैं कि बिहार ने अपना एक अभिभावक दिल्ली भेज दिया है।