नीतीश कुमार : बिहार विधान परिषद में जब अचानक मौन हो गए मुख्यमंत्री, विपक्ष ने पूछा- किसके इशारे पर हुआ खेल?

Ritu Raj

सिटी पोस्ट लाइव
बिहार विधान परिषद की कार्यवाही के पांचवें दिन एक अभूतपूर्व दृश्य देखने को मिला। सदन में विपक्ष के हंगामे के बीच जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बेहद आक्रामक अंदाज में पलटवार कर रहे थे, तभी अचानक उनका माइक बंद हो गया। मुख्यमंत्री बोलते रहे, हाथ हिलाते रहे, लेकिन उनकी आवाज सदन और लाइव टेलीकास्ट से गायब हो गई।

हंगामे के बीच मुख्यमंत्री का रौद्र रूप
सदन की कार्यवाही शुरू होते ही राजद सदस्यों ने नीट (NEET) मामले, पप्पू यादव की गिरफ्तारी और कानून-व्यवस्था को लेकर वेल में आकर नारेबाजी शुरू कर दी। इसी बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सदन में दाखिल हुए। विपक्ष का आक्रामक रवैया देख मुख्यमंत्री का पारा चढ़ गया। उन्होंने खड़े होकर तीखे लहजे में कहा कि विपक्ष को काम से कोई मतलब नहीं है, ये सिर्फ शोर मचाना जानते हैं।

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राबड़ी देवी पर टिप्पणी से भड़का विवाद
नीतीश कुमार का गुस्सा तब और बढ़ गया जब उन्होंने विपक्षी महिला सदस्यों और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी की ओर इशारा करते हुए कहा, “यह क्या जानती है?” राबड़ी देवी के लिए “लड़की” शब्द का इस्तेमाल और “क्या जानती है” जैसी टिप्पणी ने आग में घी डालने का काम किया। राजद सदस्यों ने इसे महिलाओं का अपमान बताते हुए सदन में शोर और तेज कर दिया।

पीछे की बेचैनी और ‘साइलेंट’ माइक का रहस्य
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान मुख्यमंत्री के ठीक पीछे बैठे जेडीयू एमएलसी संजय गांधी काफी बेचैन नजर आए। वे बार-बार अपनी सीट से उठ रहे थे। जैसे ही नीतीश कुमार का हमला और तेज हुआ, संजय गांधी मुख्यमंत्री के करीब गए, कुछ इशारा किया और वापस अपनी सीट पर बैठ गए। इसके तुरंत बाद मुख्यमंत्री का माइक म्यूट हो गया। नीतीश कुमार करीब एक मिनट तक बिना आवाज के बोलते रहे, जिसे देखकर सदन में मौजूद हर शख्स हैरान रह गया।

सियासी गलियारों में चर्चा
विपक्ष ने इस घटना को लोकतंत्र का अपमान बताया है। राजद एमएलसी सुनील सिंह ने सवाल उठाया कि जब सदन के नेता का ही माइक सुरक्षित नहीं है, तो दूसरों का क्या होगा? वहीं सत्ता पक्ष ने इसे ‘तकनीकी खराबी’ करार दिया है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री के अनियंत्रित गुस्से और विवादित टिप्पणियों को लाइव प्रसारण से रोकने के लिए संभवतः यह कदम उठाया गया।

इस घटना ने बिहार की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या यह महज एक संयोग था या मुख्यमंत्री को और अधिक असहज होने से बचाने का कोई ‘इमरजेंसी’ रास्ता।

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