By, Shrikant Pratyush
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पटना में आ गया राजद फैन चाय वाला,टे तेजप्रताप यादव उनकी दुकान पर चाय पीने पहुंचे।

RJD fan chaiwala came to Patna, Tej Pratap Yadav reached his shop to drink tea.

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ब पटना में RJD फेन चयावला आ गया है |आरजेडी, बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी है। मुकेश सहनी की पार्टी के विधायकों को भाजपा द्वारा तोड़ कर लाने से पहले तक यही पार्टी बिहार की सबसे बड़ी पार्टी थी।

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सिटी पोस्ट लाइव – लैला नहीं थामती किसी बेरोजगार का हाथ, मजनू को अगर इश्क है तो कमाने लग जाए।’ ‘परवाह मत करो लोग क्या कहते हैं, क्योंकि तुम्हारे घर का खर्च लोग नहीं तुम खुद उठाते हो।’   आजतक अपने सुना और देखा भी ग्रेजुएट चायवाली BCA आत्मनिर्भर  चायवाली  INEPENDENT चायवाली MBA चायवाला और ये लोग कोई मह्मुली चायवाले नही बल्कि पढ़े लिखे चायवाले है|

नौकरी नही मिली COMPTEETITON करने के बाद भी

इनलोगों को नौकरी नही मिली COMPTEETITON करने के बाद भी तो ये लोग अपना रास्ता निकल लिए इनलोगों के द्वारा  समाज में एक मेसेज मिला की नौकरी के भरोसे अपनी जिंदगी युवाओ को बरबाद नजी करना चाहिए या नौकरी नही मिलने पर खुद को कमज़ोर या बेरोजगार नही समझना चाहिए अपना रास्ता खुद बनाना चाहिए इसे हमारे समाज में हमारे देश में विकास  होगा इन युवाओ के द्वारा समाज में एक अच्छा मेसेज मिल रहा हाजी

 

RJD फेन चयावला आ गया

वही बताते की इनलोगों के बाद अब पटना में RJD फेन चयावला आ गया है |आरजेडी, बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी है। मुकेश सहनी की पार्टी के विधायकों को भाजपा द्वारा तोड़ कर लाने से पहले तक यही पार्टी बिहार की सबसे बड़ी पार्टी थी। लालू प्रसाद और तेजस्वी यादव की पार्टी से प्रेम करने वाले अखिलेन्द्र यादव हिंदुस्तानी ने ‘आरजेडी फैन चाय वाला’ नाम से चाय-नाश्ते की दुकान खोली है।   दिलचस्प यह कि लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव उनकी दुकान पर चाय पीने पहुंचे। तेज ने कहा कि नरेन्द्र मोदी ने 19 लाख रोजगार दे दिया होता तो यह चायवाले भी किसी ऑफिस में बैठते एसी में।अखिलेन्द्र यादव हिंदुस्तानी र अभी बीएससी फाइनल ईयर के छात्र हैं। बातचीत में अखिलेन्द्र बताते हैं कि पहले वे प्राइवेट जॉब करते थे जिससे उनका गुजारा नहीं हो पा रहा था। इसलिए उन्होंने स्वरोजगार करने का मन बनाया। इसलिए उन्होंने चाय की दुकान खोल ली। वे बताते हैं कि चाय की दुकान खोलने में पूंजी कम लगती है और मुनाफा अधिक होता है। अखिलेन्द्र कहते हैं कि केन्द्र और राज्य सरकार में सरकारी नौकरी से भरोसा टूट चुका है।

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