By, Shrikant Pratyush
News 24X7 Hour

सुप्रीम कोर्ट ने बाबूलाल मरांडी के दलबदल मामले में याचिका खारिज की

;

- sponsored -

उच्चतम न्यायालय ने दल बदल मामले में झारखंड विधानसभा के द्वारा  दायर याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया है।  झारखंड के महाधिवक्ता राजीव रंजन के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाइकोर्ट को यह निर्देश दिया है कि  बुधवार को झारखंड हाइकोर्ट में  दल बदल के मामले में सुनवाई पूरी कर अपना फैसला सुनाये।

[pro_ad_display_adzone id="49226"]

-sponsored-

सिटी पोस्ट लाइव, रांची: उच्चतम न्यायालय ने दल बदल मामले में झारखंड विधानसभा के द्वारा  दायर याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया है।  झारखंड के महाधिवक्ता राजीव रंजन के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाइकोर्ट को यह निर्देश दिया है कि  बुधवार को झारखंड हाइकोर्ट में  दल बदल के मामले में सुनवाई पूरी कर अपना फैसला सुनाये। सुप्रीम कोर्ट के  फैसले के बाद  अब सबकी निगाहें बुधवार को झारखंड हाइकोर्ट में होने वाली सुनवाई पर टिकी हुई है।

गौरतलब है कि झारखंड विधानसभा की ओर से झारखंड हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की गयी थी।  झारखंड हाईकोर्ट ने पिछले दिनों बाबूलाल मरांडी की याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पीकर के ट्रिब्यूनल में चल रहे दल बदल मामले की सुनवाई पर 13 जनवरी तक रोक लगा दी थी हाईकोर्ट के इसे आदेश को विधानसभा सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी३. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा द्वारा दायर एसएलपी को खारिज कर दिया हैता दें कि झारखंड विधानसभा के स्पीकर रविंद्र नाथ महतो ने विधायक भूषण तिर्की के आवेदन पर 10वीं अनुसूची के तहत बाबूलाल मरांडी को एक बार फिर 17 दिसंबर को नोटिस जारी किया है. नोटिस में बाबूलाल मरांडी सेदुबारा यह पूछा गया है कि क्यों न आपके खिलाफ दलबदल कानून के तहत कार्रवाई की जाए? इस पर जवाब मांगा गया है। पूर्व में झारखंड विधानसभा अध्यक्ष के द्वारा स्वतः संज्ञान लेते हुए बाबूलाल मरांडी को नोटिस जारी किया गया था, जिस पर हाई कोर्ट ने 17 दिसंबर को यह कहते हुए रोक लगा दी थी कि 10वीं अनुसूची में स्वतः संज्ञान लेकर अध्यक्ष को नोटिस जारी करने का अधिकार नहीं है जबकि अदालत में सुनवाई के दौरान विधानसभा की तरफ से पक्ष रहे महाधिवक्ता राजीव रंजन ने अपनी जिरह में कहा था की दल बदल के इस मामले में विधानसभा अध्यक्ष के द्वारा लिया गया संज्ञान संवैधानिक है और आर्टिकल 226 के तहत जब तक विधानसभा के न्यायाधिकरण में यह मामला लंबित है अदालत को इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

;

-sponsored-

Comments are closed.