बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे आए अभी जुम्मा-जुम्मा आठ दिन भी नहीं हुए कि राज्य की राजनीति में फिर से दलबदल की सुगबुगाहट तेज हो गई है। एनडीए की ‘प्रचंड जीत’ के दो महीने बाद ही गठबंधन के भीतर की खींचतान और विपक्षी खेमे में मची भगदड़ ने कड़ाके की ठंड में भी राजनीतिक गलियारों को गर्म कर दिया है।
कांग्रेस के वजूद पर संकट: क्या ‘शून्य’ पर सिमट जाएगी पार्टी?
सबसे चौंकाने वाली खबर कांग्रेस खेमे से आ रही है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो बिहार में कांग्रेस के सभी 6 विधायक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जदयू (JDU) के संपर्क में हैं।
परिणाम: यदि ये विधायक पाला बदलते हैं, तो 243 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।
अहम पहलू: यह न केवल महागठबंधन के लिए एक बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका होगा, बल्कि सदन में विपक्ष की आवाज को और कमजोर कर देगा।
आरसीपी सिंह: क्या होगी नीतीश के पुराने ‘हनुमान’ की घर वापसी?
सियासी गलियारों में एक और चर्चा जोरों पर है—पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह की जदयू में संभावित वापसी।
नीतीश कुमार के कभी सबसे भरोसेमंद रहे आरसीपी सिंह 2022 में पार्टी से निष्कासित किए गए थे।
हाल ही में प्रशांत किशोर की ‘जन सुराज’ का साथ छोड़कर एक ‘कुर्मी सम्मेलन’ में नीतीश कुमार के साथ उनकी परोक्ष मौजूदगी ने पुरानी कड़वाहटों के मिटने के संकेत दिए हैं।
सत्ता के भीतर वर्चस्व की जंग;
भले ही एनडीए के पास पूर्ण बहुमत है, लेकिन गठबंधन के अंदर सब कुछ ठीक नहीं दिख रहा:
RLM के बागी तेवर: राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के तीन विधायकों के बदले रुख ने गठबंधन की स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
शक्ति संतुलन: छोटे दलों का असंतोष और जदयू का संख्या बल बढ़ाने का प्रयास सीधे तौर पर भाजपा के साथ ‘पावर शेयरिंग’ के संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
बिहार की राजनीति अब एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ संख्या बल से ज्यादा ‘सियासी रसूख’ की लड़ाई लड़ी जा रही है। यदि ये दल-बदल हकीकत में बदलते हैं, तो नीतीश कुमार एक बार फिर राज्य की राजनीति के केंद्र बिंदु बनकर उभरेंगे, जिससे न केवल विपक्ष बल्कि उनके सहयोगियों के लिए भी नई चुनौतियां खड़ी होंगी।