सोना और चांदी दोनों ही ‘सुरक्षित निवेश’ माने जाते हैं, लेकिन जब बात इन्हें खरीदने की आती है, तो इनके पैमाने बदल जाते हैं। सोने के लिए हम ‘कैरेट’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, जबकि चांदी के लिए ‘फाइननेस’ और ‘वजन’ (किलो) प्राथमिक होता है। आइए समझते हैं कि ऐसा क्यों है:

सोने में ‘कैरेट’ का खेल;
सोने की शुद्धता को 24 के पैमाने पर मापने के पीछे मुख्य कारण इसकी कोमलता है। 24 कैरेट यानी 99.9% शुद्ध सोना इतना नरम होता है कि उससे बने गहने अपना आकार नहीं रख सकते। दरअसल, ‘कैरेट’ असल में एक अनुपात (Ratio) है। यह बताता है कि धातु के कुल 24 हिस्सों में से कितने हिस्से सोना है। उदाहरण के लिए, 18 कैरेट का मतलब है 18 हिस्से सोना और 6 हिस्से अन्य धातुएं (तांबा या जस्ता)। यह प्रणाली सदियों पुरानी है और दुनिया भर के ज्वेलरी बाजार में एक समान भाषा का काम करती है।

चांदी में ‘टंच’ और ‘फाइननेस’ का महत्व;
चांदी की प्रकृति सोने से अलग होती है, इसलिए इसके मापन के तरीके भी अधिक सीधे हैं। चांदी, सोने की तुलना में थोड़ी अधिक कठोर होती है, इसलिए इसे सीधे प्रतिशत में मापना आसान होता है। आधुनिक बाजार में इसे ‘फाइननेस’ कहा जाता है। जैसे 925 स्टर्लिंग सिल्वर का मतलब है कि इसमें 92.5% शुद्ध चांदी है। भारत के सराफा बाजारों में ‘टंच’ शब्द का प्रयोग होता है, जो शुद्धता का देसी पैमाना है। 99.9 टंच मतलब उच्चतम शुद्धता।

चांदी किलो में क्यों बेची जाती है?
सोने को हम आमतौर पर ‘ग्राम’ या ‘तोला’ (10 ग्राम) में तौलते हैं, लेकिन चांदी के लिए ‘किलोग्राम’ एक मानक इकाई बन गई है। इसके पीछे कुछ ठोस कारण हैं। सबसे पहले, सोने और चांदी की कीमतों में जमीन-आसमान का अंतर है। जहां 10 ग्राम सोना हजारों में आता है, वहीं उतनी ही कीमत में कई किलो चांदी खरीदी जा सकती है। कम कीमत के कारण इसका व्यापार बड़ी मात्रा (Bulk) में होता है। दूसरा, चांदी का उपयोग सिर्फ गहनों में ही नहीं, बल्कि मोबाइल फोन, सोलर पैनल और चिकित्सा उपकरणों में भारी मात्रा में होता है। औद्योगिक खरीद हमेशा किलो या टन में होती है। वहीं, ग्लोबल मार्केट (जैसे LBMA) में चांदी की बड़ी सिल्लियां (Bars) ही ट्रेड होती हैं। भारत जैसे देशों में निवेश के लिए 1 किलो की सिल्ली सबसे लोकप्रिय इकाई मानी जाती है।