क्यों अब ‘चांदनी रात’ सिर्फ यादों में रह गई? लाइट पॉल्यूशन और प्रदूषण का डरावना सच!..

Ritu Raj

अगर आपको लगता है कि बचपन वाली वो ‘दूधिया चांदनी’ अब कहीं खो गई है, तो आप अकेले नहीं हैं। विज्ञान कहता है कि चांद उतना ही चमकदार है, लेकिन हमारी दुनिया बदल गई है। यहाँ इसके मुख्य कारण दिए गए हैं:

लाइट पॉल्यूशन;
शहरों की जगमगाहट ने रात के अंधेरे को निगल लिया है। स्ट्रीट लाइट्स और ऊंची इमारतों की रोशनी से आसमान में ‘स्काई ग्लो’ (Sky Glow) बन जाता है। यह आर्टिफिशियल उजाला चांद की कोमल रोशनी को धुंधला कर देता है। आज दुनिया के 80% लोग कभी असली अंधेरी रात देख ही नहीं पाते।

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प्रदूषित हवा और धुंध;
हवा में मौजूद धूल, धुंआ और जहरीले कण एक फिल्टर की तरह काम करते हैं। ये कण चांदनी को बिखेर (scatter) देते हैं, जिससे चांद की चमक कम हो जाती है और वह कभी-कभी मटमैला या लाल दिखाई देने लगता है।

हमारी आंखों का बदलता मिजाज;
पहले लोग अंधेरे में रहने के आदी थे, जिससे उनकी आंखों की ‘नाइट विजन’ (रात में देखने की क्षमता) बेहतर थी। आज हम दिन-भर स्क्रीन्स और तेज लाइटों के बीच रहते हैं, जिससे हमारी आंखें अब कम रोशनी या हल्की चांदनी के प्रति उतनी संवेदनशील नहीं रहीं।

धरती का बदलता परावर्तन (Albedo);
वैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी की अपनी चमक जिसे ‘एल्बेडो’ (Albedo) कहते हैं, उसमें बदलाव आ रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण बादलों और बर्फ की परतों में होने वाले बदलावों का असर इस बात पर पड़ता है कि रात का आसमान हमें कैसा दिखाई देता है।

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