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बेरोजगारी के कारण पेशे से विमुख हो रहे हैं बांस के पुश्तैनी कारीगर

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सिटी पोस्ट लाइव, खूंटी: खूंटी जिले में तुरी नामक एक जाति निवास करती है, जो पारंपरिक ढंग से बांस के सिद्धहस्त कलाकार हैं, पर इस पेशे से कमाई नहीं होने के कारण अधिकतर लोग अपने पुश्तैनी पेशे को छोड़ रहे है। बांस के सामान बनाकर बेचने से परिवार का पेट भी नहीं चलता, फिर बचत की बात तो सोचना भी बेकार है। यूं तो तुरी समाज का पूरा परिवार दिन भर बांस की टोकरी, सूप, दउरा, पंखा, टोकरी सहित अन्य सामान के निर्माण में व्यस्त रहता है, पर दिन भर की होड़तोड़ मेहनत के बाद भी परिवार की उतनी कमाई नहीं हो पाती, जिससे पूरे परिवार की उदरपूर्ति हो सके। तुरी समाज का युवा वर्ग तो लगभग अपने पेशे से विमुख हो ही चुका है, एक दो युवक पुश्तैनी धंधे में लगे हैं, पर बेमन से और मजबूरीवश।

बांस के लगभग सभी कलाकार चाहते हैं कि उनके बच्चे इस पेशे को न अपनायें, अन्यथा उन्हें भी बेरोजगारी और गरीबी में ही अपना जीवन काटना होगा। तोरपा के एनएचपीसी कॉलोनी में रहने वाले तुरी समाज के लोगों से बातचीत में उनका दर्द छलक आया। एनएचपीसी कॉलोनी के ही रहने वाले प्रेमचंद तुरी कहते हैं कि कहने को तो तुरी जाति अनुसूचित जनजाति में आती है, पर अभी तक सरकार से उन्हें कोई लाभ नहीं मिला। तुरी समाज के अधिकतर लोग कम पढ़े-लिखे हैं। तुरी समाज में गरीबी के कारण अधिकतर लोगों के लिए शिक्षा के द्वार प्राथमिक विद्यालय के बाद ही बंद हो जाते हैं। हाई स्कूल और कॉलेज का मुंह तो गिने-चुने लोग ही देख पाते हैं। वैसे इस कॉलोनी में एक दर्जन से अधिक तुरी परिवार रहते हैं, पर बांस का पुश्तैनी धंधा करने वाले एक-दो लोग ही बचे हैं। अन्य लोग दूसरे पेशे को अपना कर जीवन की गाड़ी खींच रहे हैं। यहां रहने वाले सभी लोग दूसरे जिलों के रहने वाले हैं। कोई गुमला का है, तो कोई सिमडेगा जिले का। प्रेमचंद तुरी तो कहते हैं कि वे सुबह छह बजे से देर रात तक सूप, दउरा, टोकरी आदि बनाते रहते हैं, पर इतनी मेहनत के बाद भी उनके परिवार को ढंग से भरपेट भोजन तक नहीं मिल पाता। लाचारी में उन्हें इसे पेशे की गाड़ी को धकेलना पड़ रहा है। इन परिवारों के पास राशन कार्ड तक नहीं है। कॉलोनी में रहने वाले पवन तुरी, रूपेश तुरी, लोदरो तुरी, पवन तुरी, बिरसा तुरी सहित कई परिवारों ने अपने खानदानी पेशे को तिलांजलि दे दी है।

उत्पादों को नहीं मिलता बाजार

पिछले कई पीढ़ियों से बांस की कारीगरी में लगे प्रेमचंद तुरी, जो मूल रूप से गुमला जिले के पकरा गांव के रहने वाले हैं, कहते हैं कि दिन भर की जीतोड़ मेहनत के बाद वे कई तरह की सामग्रियों का निर्माण करते हैं। बसों या ट्रकों पर लटक कर बाजार जाते हैं और अपने उत्पादों को बेचते हैं। सामान बिक गये, तब घर का चूल्हा जलता है, अन्यथा फाकाकशी की भी नौबत आ जाती है। वे कहते हैं कि यदि सरकार उनकी कला को सम्मान, सहयोग, संरक्षण और बाजार उपलब्ध नहीं करायेगी, तो बांस की कारीगरी का यह पुश्तैनी पेशा हमेशा के लिए बंद हो जायेगा। बिरसा मांझी और उनकी पत्नी सिलवंती देवी कहते हैं कि कच्चे बांस के सामान बनाने में काफी मेहनत है और यह कला पुश्तैनी है, पर बाजार नहीं मिलने के कारण वे भुखमरी का सामना कर रहे हैं। उनके उत्पाद बिक नहीं पाते। पूजी नहीं रहने के कारण वे वृहद पैमाने पर बांस के उत्पादों का निर्माण नहीं कर पाते।

गरीबी के कारण कर लिया धर्म परिवर्तन

प्रेमचंद तुरी बताते हैं कि गरीबी के कारण बिरसा मांझी, पवन तुरी, फिरनी तुरी और लोदरो तुरी सहित कई अन्य परिवारों ने हिन्दू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपना लिया। हालांकि बिरसा मांझी और उनकी पत्नी सिलवंती देवी कहते हैं कि बिरसा तुरी की बीमारी के कारण उन्होंने धर्म परिवर्तन किया है। उन्होंने कहा कि उनके पति बिरसा मांझी को मिर्गी की बीमारी थी। उसने डॉक्टरी इलाज से लेकर झाड़फूंक सब कराया, पर लाभ नहीं हुआ। एक ईसाई पादरी के कहने पर उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया और अब वे चंगा महसूस करते हैं। फिरनी तुरी ने भी बीमारी से तंग आकर ईसाई धर्म अपना लिया। पवन तुरी भी हिन्दू धर्म के बदले ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। हालांकि तुरी समाज के अधिकतर लोग मानते हैं कि बीमारी तो मात्र बहाना है, वास्तव में गरीबी से तंग आकर इन लोगों ने ईसाई धर्म अपना लिया।

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