By, Shrikant Pratyush
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ऐसा लग रहा है पूरा भारत इस नेतरहाट की वादियों में आ बसा हो: पद्मश्री श्याम शर्मा

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डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान द्वारा नेतरहाट में आयोजित आदिवासी  लोक चित्रकारों के प्रथम राष्ट्रीय शिविर में शुक्रवार को देश भर से आए लोक कलाकारों को झारखंड के सांस्कृतिक पर्व सोहराय के बारे में फ़िल्म के जरिये अवगत कराया गया।

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ऐसा लग रहा है पूरा भारत इस नेतरहाट की वादियों में आ बसा हो: पद्मश्री श्याम शर्मा
सिटी पोस्ट लाइव, मेदिनीनगर: डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान द्वारा नेतरहाट में आयोजित आदिवासी  लोक चित्रकारों के प्रथम राष्ट्रीय शिविर में शुक्रवार को देश भर से आए लोक कलाकारों को झारखंड के सांस्कृतिक पर्व सोहराय के बारे में फ़िल्म के जरिये अवगत कराया गया। जाने-माने फिल्म तथा डॉक्यूमेंट्री मेंकर मेघनाथ एवं बीजू टोप्पो ने नेतरहाट में स्थित प्रभात विहार के परिसर में अपनी नई फिल्म सोहराय का प्रीमियर किया। प्रीमियर में देशभर से जुटे लोक चित्रकार शामिल हुए।
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फिल्म डेवलपमेंट काउंसिल ऑफ झारखंड के अध्यक्ष मेघनाथ ने कार्यक्रम की शुरुआत एवं अंत खुद के निर्देशित गांव छोड़ब नाही’ जंगल छोड़ब नाही, म्यूजिक वीडियो से किया। तत्पश्चात सृष्टि के निर्माण की कहानी सृष्टिकथा फ़िल्म के माध्यम से किया। सृष्टि कथा फिल्म के बाद उन्होंने सोहराय पर्व पर आधारित अपनी नवनिर्मित फिल्म का प्रीमियर किया। फिल्म में बताया गया कि कैसे सोहराय पर्व से मानव और पशुओं के बीच गहरा संबंध स्थापित होता है। फिल्म में दिखाया गया कि सोहराय पर्व झारखंड की सभ्यता व संस्कृति का प्रतीक है। यह पर्व भारत के मूल निवासियों के लिए एक विशेष त्योहार है क्योंकि भारत के मूल निवासि खेती बारी पर निर्भर है। खेती बाड़ी का काम बैलों व भैंसों के माध्यम से किया जाता है। इसलिए इस पर्व में पशुओं का माता लक्ष्मी की तरह पूजा की जाती है।
मौके पर आदिवासी एवं लोग चित्रकारों के प्रथम राष्ट्रीय शिविर में पहुंचे पद्मश्री श्याम शर्मा ने कहा कि ऐसा लग रहा है जैसे पूरा भारत इस नेतरहाट की वादियों में आ बसा है। चित्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि आप सभी के अंदर कला की कस्तूरी है। दुनिया में अनगिनत कलाकार हैं परंतु हमें जानना होगा की अपने अंदर क्या है जो सभी से अलग है। इस चीज को अगर हम ध्यान में रखकर काम करते हैं तो हमारे अंदर एक अलग से स्फूर्ति पैदा होती है जो हमें बाकियों से अलग करती है। आप सभी कलाकार नहीं कला साधक हैं। शिविर में पहुंचे कलाकार श्री हीरेन ठाकुर ने कहा कि यहां आकर हम धन्य महसूस कर रहे हैं। आप सभी लोक कलाकार अपनी संस्कृति तथा चित्रकारी को कुचियों से कैनवास पर रंग रहे हैं। आपको ही इस ओरिजिनल आर्ट फॉर्म को बचाना है। हम जैसे चित्रकारों के लिए आप सभी रिसोर्स पर्सन हैं। हम सभी इस लोक चित्रकारी को रंग रेखा से ही बचा सकते हैं।

 

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