By, Shrikant Pratyush
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कानूनी बारीकियों से अवगत हुए पलामू के पैनल अधि

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शहर के नालसा मॉडल रूल थ्री के तहत पुराना डीआरडीए हॉल में पैनल अधिवक्ताओं को दूसरे दिन रविवार को प्रशिक्षण दिया गया। डीएलएसए के सचिव प्रफुल्ल कुमार ने सभी विषय के बारे में संक्षित जानकारी देते हुए सभी पैनल अधिवक्ताओं को अपना संदेह दूर करने को कहा।

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कानूनी बारीकियों से अवगत हुए पलामू के पैनल अधि

सिटी पोस्ट लाइव, मेदिनीनगर: शहर के नालसा मॉडल रूल थ्री के तहत पुराना डीआरडीए हॉल में पैनल अधिवक्ताओं को दूसरे दिन रविवार को प्रशिक्षण दिया गया। डीएलएसए के सचिव प्रफुल्ल कुमार ने सभी विषय के बारे में संक्षित जानकारी देते हुए सभी पैनल अधिवक्ताओं को अपना संदेह दूर करने को कहा। प्रशिक्षण की शुरुआत बीएन लॉ कॉलेज के प्राचार्य पंकज कुमार ने की। उन्होंने कहा कि संपत्ति दो तरह की होती है, एक वह जो खुद अर्जित की गई हो और दूसरा जो विरासत में मिली हो। अपनी कमाई से खरीदी गई संपत्ति स्वार्जित कही जाती है। जबकि विरासत में मिली पैतृक संपत्ति कहलाती है। किसी भी पैतृक संपत्ति पर सभी बच्चों और पत्नी का बराबर का अधिकार होता है। उन्होंने कहा कि किसी भी पुरुष को अपने पिता, दादा और परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति का हक मिलता है। बच्चा जन्म के साथ ही पिता की संपत्ति का अधिकारी हो जाता है। पिता की पूरी संपत्ति बेटे को नहीं मिल सकती अगर जीवित हैं और पिता की संपत्ति में बहन का भी अधिकार है। उन्होंने पैतृक संपत्ति पाने के अधिकार का भी विस्तार से चर्चा की। सरकारी अधिवक्ता अखिलेश्वर प्रसाद ने भी हिंदू कानून के अनुसार महिलाओं के संपत्ति अधिकार पर विस्तार से प्रकाश डाला। साथ ही इस कानून से संबंधित बारीकियों की जानकारी दी। ट्रेनर अधिवक्ता संतोष कुमार पांडेय ने कहा कि महिलाओं को अपने जीवन को सुरक्षित करने के लिए संपत्ति के अधिकारों की रक्षा करना आवश्यक है। भारत में महिलाओं के संपत्ति अधिकारों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया है, बल्कि उनकी उपेक्षा की गई है। समय के साथ बढ़ती जागरुकता और आधुनिकीकरण ने परिदृश्य को थोड़ा बेहतर बना दिया है। उन्होंने कहा कि एक बेटी को बेटों के रूप में अपने पिता की संपत्ति पर विरासत का समान अधिकार है। उसे अपनी मां की संपत्ति में हिस्सा प्राप्त करने का भी अधिकार है। उन्होंने कहा कि 2005 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के संशोधन के बाद लिंग के बीच भेदभाव हटा दिया गया है। बेटियों को कई तरह के अधिकार दिये गये हैं। उसे भी बेटों की तरह दायित्व निभाना होगा। उन्होंने कहा कि महिला चाहे वह बेटी हो या पत्नी, वह पुरुष के समान अधिकार पाने की हकदार है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 के मुताबिक लड़की चाहे कुंवारी हो या शादीशुदा, वह पिता की संपत्ति में हिस्सेदार मानी जाएगी। उसे पिता की संपत्ति का प्रबंधक भी बनाया जा सकता है। इस संशोधन का लाभ तभी मिलेगा जब उनके पिता का निधन 9 सितंबर 2005 के बाद हुआ हो। इसके अलावा बेटी सह भागीदार तभी बन सकती है जब पिता और बेटी दोनों 9 सितंबर 2005 को जीवित हों। इस मौके पर ट्रेनर अधिवक्ता एसके दत्ता ने कंज्यूमर पोर्टेक्सन एक्ट पर विस्तार से प्रकाश डाला। ट्रेनर अधिवक्ता सचिन्द्र कुमार पांडेय ने प्रोफेशनल इथिक्स फ़ॉर लॉयर पर चर्चा की। ट्रेनर अधिवक्ता जितेंद्र कुमार उपाध्याय और सुनील कुमार मिश्रा ने कानूनी बारीकियों पर चर्चा की। इस मौके पर अधिवक्ता संजय कुमार पांडेय, प्रमोद गुप्ता, रामनारायण सिंह, प्रदीप कुमार सिंह, संतोष कुमार तिवारी, आनंद शंकर, मनवर जमा खां, मदन तिवारी, मंधारी दुबे, वीरेंद्र मिश्रा, त्रिपुरारी तिवारी, रामचंद्र सिंह, अनिल पांडेय, शंकर कुमार, योगेन्द्र प्रसाद सिंह समेत दर्जनों पैनल अधिवक्ता उपस्थित थे। 

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