By, Shrikant Pratyush
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कोविशील्ड का एक डोज है काफी, जानिये क्या कह रहे हैं एक्सपर्ट?

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क्या कोविशील्ड की एक डोज ही लगाने का विचार बेकार है या फिर इसमें कोई दम है. ध्यान रहे कि ऑक्सफर्ड की वैक्सीन ही भारत में कोविशील्ड के नाम से जानी जाती है. पोलार्ड ने यह स्वीकार किया कि शुरुआत में कोविशील्ड को सिंगल डोज वैक्सीन के तौर पर ही देखा गया था.

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सिटी पोस्ट लाइव : क्या कोविशील्ड की एक डोज ही लगाने का विचार बेकार है या फिर इसमें कोई दम है. ध्यान रहे कि ऑक्सफर्ड की वैक्सीन ही भारत में कोविशील्ड के नाम से जानी जाती है. पोलार्ड ने यह स्वीकार किया कि शुरुआत में कोविशील्ड को सिंगल डोज वैक्सीन के तौर पर ही देखा गया था. उन्होंने कहा, “दरअसल, पहले पहल जल्दी से एक-एक डोज देकर ज्यादा से ज्यादा लोगों की जान बचाने की योजना बनी थी, लेकिन यूके में लॉकडाउन की सफलता से हमें ट्रायल डेटा पर गौर करने का वक्त मिल गया. हमने देखा कि जिन लोगों को वैक्सीन की दो डोज लगाई गई, वो कोविड-19 महामारी के खिलाफ एक डोज वैक्सीन लेने वालों के मुकाबले ज्यादा इम्यून हो गए.

कोविशील्ड के क्लीनिकल ट्रायल में पता चला कि इसकी एक डोज भी काफी कारगर है और जनवरी के बाद हुए टीकाकरण के उपलब्ध आंकड़ों से भी इसकी पुष्टि होती है. इससे स्पष्ट होता है कि कोविशील्ड की सिंगल डोज से भी उच्चस्तरीय सुरक्षा मिलती है क्योंकि एक डोज लेने के बाद संक्रमित हो गए व्यक्ति को अस्पताल में भर्ती होने की नौबत नहीं आ रही है.वैक्सीन की एक डोज दिए जाने के विचार के पीछे एक और बड़ा कारण कोविशील्ड जैसी वैक्सीन ‘वायरल वेक्टर’ (Viral Vector Vaccine) भी एक डोज में ही पर्याप्त इम्यूनिटी दे रही है. जेऐंडजे और स्पूतनिक लाइट जैसी वन शॉट वैक्सीन भी कोविशील्ड की तरह ही हैं. हालांकि, पोलार्ड का कहना है कि mRNA प्लैटफॉर्म से तैयार हुई वैक्सीन की दो डोज यूके में तीन महीन के अंतराल पर लगाई जा रही है और वो भी संक्रमितों को अस्पताल में भर्ती होने से बचाने में सक्षम साबित हुई है.

बहरहाल, यह मान भी लें कि कोविशील्ड का एक ही शॉट पर्याप्त इम्यूनिटी पैदा कर देता है तो सवाल यह उठता है कि महामारी के खिलाफ मिली यह सुरक्षा कितने दिनों तक टिकाऊ होती है? उदाहरण के तौर पर, चीनी कंपनी कैनसिनो की वायरल वेक्टर वैक्सीन क्लीनिकल ट्रायल में 65.7% इफेक्टिव पाई गई तो इसका एक शॉट लगाने को ही मंजूरी मिल गई. मैक्सिको से आई एक हालिया रिपोर्ट में पता चला कि वायरल वेक्टर वैक्सीन के एक शॉट से तैयार हुई इम्यूनिटी छह महीने के बाद बहुत तेजी से कम होने लगती है, इस कारण दूसरा शॉट लगाने का जरूरत महसूस की जा रही है. मैक्सिको में 14% टीकाकरण इसी वैक्सीन से किया गया.
इसी तरह, स्पूतनिक वैक्सीन बनाने वाली रूस की कंपनी के डायरेक्टर एलेक्जेंडर गिंट्सबर्ग ने जनवरी में कहा कि स्पूतनिक वी की एक डोज से कोविड के खिलाफ 3-4 महीने तक सुरक्षा मिलेगी। स्पूतनिक वी भी स्पूतनिक लाइट की तरह ही है। हालांकि, जेऐंडजे ने अपनी सिंगल डोज पॉलिसी को लेकर कभी कोई आशंका प्रकट नहीं की.

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पोलार्ड का कहना है कि वैसे तो कोविशील्ड की एक डोज से तैयार हुई इम्यूनिटी कितनी अवधि तक टिकती है, इसका कोई स्पष्ट आंकड़ा तो नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि तीन महीने तक तो इम्यूनिटी बरकरार रहती है। उन्होंने कहा कि इसका मतलब यह कतई नहीं है कि तीन महीने के बाद इम्यूनिटी नहीं रहती.यूके के हालिया आंकड़े बताते हैं कि भारत में पाए जाने वाले कोरोना वायरस के डेल्टा वेरियेंट (B.1.617.2) के खिलाफ कोविशील्ड की एक डोज 33% ही इफेक्टिव है. पोलार्ड का कहना है कि अगर एफिकेसी रेट कम भी हो, लेकिन वैक्सीन लेने वाले लोगों को संक्रमण के बाद अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं पड़ती है तो फिर सब ठीक है. लेकिन, अगर एक शॉट लेने वाले लोगों के संक्रमण के बाद अस्पताल जाने की नौबत बढ़ जाती है तो फिर यह चिंता का विषय है.

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