By, Shrikant Pratyush
News 24X7 Hour

क्यों ज़्यादा ख़तरनाक है कोरोना वायरस,क्या है इससे बचने का उपाय?

;

- sponsored -

-sponsored-

-sponsored-

क्यों ज़्यादा ख़तरनाक है कोरोना वायरस,क्या है इससे बचने का उपाय?

सिटी पोस्ट लाइव :जॉन होपकिंस यूनिवर्सिटी ने कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए कुछ अहम जानकारियाँ साझा की है. कोरोना वायरस के बारे में अहम जानकारियां हैं और इससे बचने के उपाय भी हैं. साथ ही यह भी बताया गया है कि क्या नहीं करना चाहिए.कोविड 19 के वायरस पर यूनिवर्सिटी की ताज़ा रिसर्च के अनुसार कोविड 19 के लक्षण और फ्लू (इंफ्लूएंज़ा) के लक्षण लगभग एक समान दिखते हैं लेकिन दोनों से लड़ने की शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता एक समान नहीं है. हालांकि दोनों की तुलना करने का एक कारण ये भी है कि कोरोना दिसंबर से फैलना शुरु हुआ था जो फ्लू के फैलने का भी वक्त होता है.

लेकिन इंफ्लूएंज़ा अमूमन हर साल सर्दी के दिनों में होता है और अधिकतर लोगों शरीर कुछ हद तक इससे लड़ना सीख भी जाता है और उसकी रोग प्रतिरोधक शक्ति इससे निपटने के लिए एक तरह से तैयार होती है.लेकिन कोविड 19 का मामला इससे अलग है. चूंकि ये नया वायरस है फिलहाल किसी भी इंसान के शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति इससे निपटने के लिए तैयार नहीं हैं.

Also Read
[pro_ad_display_adzone id="49171"]

-sponsored-

यूनिवर्सिटी के अनुसार मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का इस वायरस के लिए तैयार न होना वायरस को अधिक ख़तरनाक बना देता है. यही कारण है कि सरकारों को इस वायरस को बढ़ने से रोकने के लिए कड़े कदम उठाने पड़ रहे हैं.वायरस के जीनोम पर शोध कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि एक तरफ़ जहां इंफ्लूएंज़ा का वायरस खुद को बदल लेता है यानी म्यूटेट कर लेता है, वहीं अब तक इस तरह के सबूत नहीं मिले हैं जिनसे पता चलता हो कि कोरोना वायरस भी खुद को बदल लेता हो.वायरस का कहर कितना घातक होगा ये इस बात पर भी निर्भर करता है कि वो कितनी जल्दी म्यूटेट करता है.

जॉन होपकिंस यूनिवर्सिटी में वैज्ञानिक इस वायरस के टीके पर भी काम कर रहे हैं और उनका कहना है कि अभी इसमें देढ़ साल या उससे अधिक का वक्त लग सकता है. इस वायरस का टीका बना रहे वैज्ञानिकों से सामने फिलहाल ये सबसे बड़ी चुनौती है.इस मुश्किल से निपटने के लिए वैज्ञानिक वायरस के कुछ ख़ास प्रोटीन पर काम कर रहे हैं ताकि अगर वायरस म्यूटेट कर भी जाता है तो टीका नाकाम न हो.

दूसरे वायरस की तरह कोरोना वायरस भी कोई जिंदा जीव नहीं है, लेकिन एक प्रोटीन मॉलीक्यूल (आरएनए) है. इसका आकार आंख की एक आईलैश की चौड़ाई के एक हज़ारवें हिस्से जितना है.जब यह आंख या नाक के रास्ते शरीर में पहुंचता है तो जहां जमा होता है वहीं के सेल (कोशिका) में जेनेटिक कोड को बदल देता है. इसके बाद वो इन्हें आक्रामक और मल्टीप्लायर सेल्स में तब्दील कर देता है.

शरीर के भीतर जाने के बाद ये वायरस इंसान के लिए सांस लेने में तकलीफ़ पैदा कर सकता है. इसका पहला हमला गले के आसपास की कोशिकाओं पर होता है. इसके बाद ये सांस की नली और फेफड़ों पर हमला करता है. यहां ये एक तरह की “कोरोना वायरस फैक्ट्रियां” बनाता है. यानी यहां अपनी संख्या बढ़ाता है.नए कोरोना वायरस बाक़ी कोशिकाओं पर हमले में लग जाते हैं. शुरुआती दौर में आप बीमार महसूस नहीं करते. हालांकि कुछ लोगों में संक्रमण के शुरुआती वक़्त से ही लक्षण दिखाई देने लगते हैं.

वैज्ञानिक बताते हैं कि इस वायरस का इन्क्यूबेशन पीरियड करीब 14 दिनों का है. लेकिन ये भी लोगों में अलग-अलग हो सकता है. औसतन ये पाँच दिन का होता है.माना जा रहा है कोरोना वायरस के लिए टीका बनाने के जो काम चल रहा है उसमें उन लोगों की मदद ली जा सकती है जो कोविड 19 से ठीक हो गए हैं.

शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति किसी भी बैक्टीरिया या वायरस से लड़ने के लिए शरीर में एंटीबॉडिज़ बनाती है और इन्हीं के सहारे अब कोरोना का टीका बनाने में भी मदद ली जा सकती है.औषधि विज्ञान में एक कॉन्सेप्ट होता है “पैसिव इम्यूनिटी का”. इस कॉन्सेप्ट के अनुसार ये माना जाता है कि जो व्यक्ति एक बार कोरोना वायरस के संक्रमण के बाद ठीक हुआ है उसके शरीर में इससे निपटने के लिए एंटीबॉडिज़ तैयार हुई होंगी.वेज्ञानिक मानते हैं कि संक्रमण के ठीक हुए व्यक्ति के शरीर के ख़ून के प्लाज़्मा से इससे बारे में अधिक जानकारी मिल सकती है और इससे दूसरों की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाने में मदद मिलेगी. इसी कॉन्सेप्ट के आधार पर पहले पोलियो और खसरे जैसी बीमारियों के टीके बनाए गए हैं.

जॉन होपकिंस यूनिवर्सिटी का कहना है कि फिलहाल इस वायरस को फैलने से रोकने के लिए एकमात्र उपाय है आइसोलेशन.जिन्हें भी सर्दी ख़ांसी, बुखार और सांस लेने में तकलीफ जैसे लक्षण हैं वो खुद को दूसरों से दूर करें और जितना हो सके सार्वजनिक जगहों पर न जाएं. जिस दिन से लक्षण दिखना ख़त्म हों उसके बाद भी सात दिन तक अलग ही रहें.बीमारों की मदद करने वाले उनसे कम से कम 6 फीट की दूरी बनाए रखें, उन्हें न छूंए और बार-बार हाथ धोएं. बीमार और उनकी मदद करने वाले दोनों मास्क पहनें.साथ ही जहां जहां पर थूक के कण गिरने की संभावना है, जैसे मेज, कुर्सी, बर्तन उन जगहों को ग्लव्स पहन कर ही छूएं और उन जगहों को बार-बार साफ करें. साथ ही कपड़े गर्म पानी में धोएं.

-sponsered-

;

-sponsored-

Comments are closed.