By, Shrikant Pratyush
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राज्यपाल-सुप्रीम कोर्ट से टकराव की स्थिति में कर्नाटक सरकार,रचेगा नया इतिहास

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राज्यपाल वजुभाई वाला ने विधानसभा के स्पीकर रमेश कुमार को मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी सरकार के विश्वास मत की प्रक्रिया शुक्रवार दोपहर 1.30 बजे तक पूरा कर लेने का निर्देश दे दिया है. सरकार संकट में है क्योंकि बाग़ी विधायक सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद व्हिप की अनिवार्यता से स्वतंत्रता हो गए हैं.

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राज्यपाल-सुप्रीम कोर्ट से टकराव की स्थिति में कर्नाटक सरकार,रचेगा नया इतिहास

सिटी पोस्ट लाइव :कर्नाटक  एक नया  इतिहास रचने की राह पर है.यहाँ की सरकार राज्यपाल वजुभाई वाला और सुप्रीम कोर्ट दोनों के फैसलों से परेशान है. जनता दल-सेक्यूलर और कांग्रेस की गठबंधन सरकार दोनों से टकराव की स्थिति में है. राज्यपाल वजुभाई वाला ने विधानसभा के स्पीकर रमेश कुमार को मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी सरकार के विश्वास मत की प्रक्रिया शुक्रवार दोपहर 1.30 बजे तक पूरा कर लेने का निर्देश दे दिया है. सरकार की चुनौती इसलिए ज्यादा बढ़ गई है क्योंकि बाग़ी विधायक सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद व्हिप की अनिवार्यता से स्वतंत्रता हो गए हैं.यानी सरकार के लिए राज्यपाल तो संकट पैदा कर ही रहे हैं साथ ही व्हिप की अनिवार्यता से बागी विधायकों को स्वतन्त्र कर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की मुसीबत बढ़ा दी है.

सबकी नज़रें राज्यपाल वजुभाई वाला पर टिकी हैं कि वो एसआर बोम्मई मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के अनुसार विश्वासमत पर वोटिंग के लिए क्या क़दम उठाते हैं.लेकिन, कर्नाटक के इस मामले के साथ ही उस युग का अंत हो जाएगा जिसमें ज़्यादातर सरकारें राजभवन या राज्यपाल के कमरे में चुनी जाती थीं.सुप्रीम कोर्ट के साथ इस टकराव ने कर्नाटक को एक मिसाल क़ायम करने का मौक़ा दिया है.

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क़ानूनी गलियारों में इस सवाल पर बहस हो रही है कि क्या सुप्रीम कोर्ट ने विधायिका के विशेष क्षेत्र में हस्तक्षेप करके अपनी सीमा का उल्लंघन किया है ?सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकीलों का कहना है कि ”संविधान में शक्तियों के विभाजन पर बहुत सावधानी बरती गई है. विधायिका और संसद अपने क्षेत्र में काम करते हैं और न्यायपालिका अपने क्षेत्र में. आमतौर पर दोनों के बीच टकराव नहीं होता. ब्रिटिश संसद के समय से बने क़ानून के मुताबिक़ अदालत विधायिका के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करती.लेकिन कर्नाटक मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से न्यायपालिका और विधायिका के बीच टकराव की नौबत पैदा हो गई है.’

सुप्रीम कोर्ट ने बाग़ी विधायकों की याचिका पर सुनवाई करते हुए अंतरिम आदेश दिया था जिसके मुताबिक़ स्पीकर को विधायकों के इस्तीफ़े स्वीकार करने या न करने या उन्हें अयोग्य क़रार देने का अधिकार है.हालांकि, ‘संतुलन’ बनाने का प्रयास करते हुए कोर्ट ने 15 बाग़ी विधायकों विधानसभा की प्रक्रिया से अनुपस्थित रहने की स्वतंत्रता दे दी.इसका मतलब ये है कि राजनीतिक पार्टियां सदन में अनिवार्य मौजूदगी के लिए जो व्हिप जारी करती हैं वो अप्रभावी हो जाएगा. जाहिर है सरकार सदन में विश्वास मत हासिल नहीं कर पायेगी. गठबंधन सरकार के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश पर इसीलिए आपत्ति ज़ाहिर की है.

कांग्रेस नेता सिद्दारमैया ने सदन में इस फ़ैसले पर कहा था कि ‘सुप्रीम कोर्ट के आदेश से एक राजनीतिक पार्टी के रूप में हमारे अधिकारों का हनन होरहा है.लेकिन विरोधी पक्ष का कहना है कि सरकार का यह तर्क हास्यास्पद है. सत्ताधारी दल के नेताओं को सिर्फ़ अपने अधिकारों की चिंता है.  इस्तीफ़ा देने वाले विधायक का अधिकार उन्हें दिखाई नहीं दे रहा. एक बार इस्तीफ़ा देने के बाद व्हिप जारी नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट राजनीतिक पार्टियों और विधायक दोनों के अधिकारों के बारे में जानता है, जिनके इस्तीफ़े में स्पीकर ने अनावश्यक रूप से देरी की है.”

राज्यपाल और सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से  सभी राजनीतिक दलों के सामने अस्तित्व के संकट का सवाल पिअदा हो गया है. बीजेपी कांग्रेस को ख़त्म करने की कोशिश कर रही है और दूसरी तरफ जेडीएस और कांग्रेस बीजेपी का मुक़ाबला करने की कोशिश कर रहे हैं. अकादमी से जुड़े किसी शख़्स के लिए इससे ज़्यादा दिलचस्प कुछ और नहीं हो सकता.इस संकट से अगर कर्नाटक सरकार निबट लेती है या फिर फेल हो जाती है ,दोनों ही परिस्थितियों में न्य इतिहास रचा जाएगा.

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