By, Shrikant Pratyush
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क्या सुप्रीम कोर्ट के आम्रपाली पर फैसले से हाउसिंग सेक्टर में डालेगी जान?

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आम्रपाली डेवलपर्स के हाउसिंग प्रोजेक्ट में सालों पहले अपना फ़्लैट लेने के वावजूद अबतक रजिस्ट्री नहीं करवा पा रहे ग्राहको के लिए सुप्रीम कोर्ट से राहत की ख़बर है. सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण से फ़्लैट खरीदारों को आवंटन के लिए पंजीकरण शुरू करने के लिए कहा है.

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क्या सुप्रीम कोर्ट के आम्रपाली पर फैसले से हाउसिंग सेक्टर में डालेगी जान?

सिटी पोस्ट लाइव :आम्रपाली डेवलपर्स के हाउसिंग प्रोजेक्ट में सालों पहले अपना फ़्लैट लेने के वावजूद अबतक रजिस्ट्री नहीं करवा पा रहे ग्राहको के लिए सुप्रीम कोर्ट से राहत की ख़बर आई है. सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इस संबंध में नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण से फ़्लैट खरीदारों को आवंटन के लिए पंजीकरण शुरू करने के लिए कहा है. सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के अधिकारियों को चेतावनी दी है कि अगर उन्होंने फ़्लैट का पज़ेशन देने में देरी की तो उन्हें जेल भी जाना पड़ सकता है. सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद अब अलग अलग प्रोजेक्टों में फंसे लोगों को उम्मीद जगी है कि उन्हें अपने सपनों का आशियाना मिल सकेगा.

गौरतलब है कि हजारों आम्रपाली के ऐसे ग्राहक हैं जिन्होंने सालों पहले फ्लैट बुक किया लेकिन आजतक फ्लैट नहीं मिला. जिनको फ्लैट मिला भी तो आजतक रजिस्ट्री नहीं हो पाया. रजिस्ट्री नहीं हो पाने की वजह से लोग अपना फ्लैट बेंच भी नहीं पा रहे हैं.लोगों की सबसे बड़ी परेशानी ये है कि फ्लैट का निबंधन नहीं होने की वजह से उन्हें फ्लैट मोर्गेज लोन भी नहीं मिल पा रहा.

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जिनको फ्लैट नहीं मिला है फ्लैट का पैसा पूरा चूकाने के वावजूद उन्हें किराए के मकान में रहना पड़ रहा है. एक तरह बैंक को फ्लैट का किश्त चुकाना पड़ रहा है तो दूसरी तरफ उन्हें किराया भी देना पड़ रहा है. इस तरह से हजारों आम्रपाली के ग्राहक संकट में वर्षों से फंसे हुए हैं. अपने फै़सले से तबाह हो चुके  सैकड़ों परिवार के पास प्रोजेक्ट के अधूरे हिस्से में एक अपार्टमेंट किराए पर लेने और अपनी क़िस्मत को कोसने के सिवाय और कोई चारा नहीं बचा है.

ऐसे हज़ारों परिवार हैं जो सालों से बहुत अधिक मानसिक तनाव, अवसाद और धोखा खाने के अहसास लिए जी रहे हैं.हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने उन हज़ारों फ्लैट ख़रीदारों को राहत दी है जिनके फ्लैट धोखाधड़ी और पैसे की हेराफेरी के कारण इस डेवलपर ने सालों से नहीं दिए हैं.आम्रपाली के कार्यकारी निदेशकों पर आरोप है कि उन्होंने होम बायर्स के 500 मिलियन डॉलर (क़रीब 3,500 करोड़ रुपये) का फंड दूसरी कंपनियों में डाल दिया और बैंक लोन को निजी हित में इस्तेमाल किया.सुप्रीम कोर्ट ने कई बैंकों को भी इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया कि उन्होंने कंपनी को लोन देने के बाद उसकी निगरानी नहीं की.इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारी विकास प्राधिकरणों को भी आड़े हाथों लिया.

कोर्ट ने कहा, “प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई) और विदेशी विनिमय प्रबंधन एक्ट (फे़मा) के नियमों का उल्लंघन कर घर ख़रीदारों के पैसे की हेराफेरी की गई.”अदालत ने सरकारी निर्माण कंपनी नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कार्पोरेशन लिमिटेड (एनबीसीसी) को आम्रपाली प्रोजेक्ट को पूरा करने की ज़िम्मेदारी सौंपी.इसके बाद ये भी चर्चा चल पड़ी है कि एक और डेलवपर यूनिटेक का काम भी एनबीबीसी के पास आए.आम्रपाली के हज़ारों घर खरीदारों को राहत देने के अलावा इस फै़सले का भारत के हाउसिंग सेक्टर पर व्यापक असर पड़ने वाला है.

पहली बार भारत की शीर्ष अदालत निवेशकों की मेहनत की कमाई को बचाने के लिए आगे आई है. ऐसा सरकार को करना चाहिए था. दूसरा, फै़सले में बिल्कुल साफ़ लिखा है कि ये पूरे देश में अधूरे पड़े सभी हाउसिंग प्रोजेक्ट पर लागू होगा.”एक अनुमान के मुताबिक भारत में क़रीब 50 लाख फ्लैट का निर्माण अधूरा है.यही नहीं, पिछले पांच सालों में क़रीब डेढ़ लाख रिहाइशी फ्लैट अधर में लटक गए हैं और ख़रीदार खुद को फंसा हुआ पा रहे हैं.इन 50 लाख अधूरे घरों में ढाई लाख एमएमआर यानी मुंबई मेट्रोपोलिटन रीजन में हैं, जिसमें पुणे भी शामिल है.

जबकि दिल्ली और एनसीआर में ऐसे 1 लाख 75 हज़ार अधूरे पड़े घर हैं, दक्षिण भारत में बेंगलुरु 25,000 अधूरे घरों के साथ शीर्ष पर है और इसके बाद चेन्नई और हैदराबाद का नंबर आता है.भारतीय रीयल इस्टेट बाज़ार में एक दशक तक ज़बरदस्त उछाल रहा और माना जाता है कि ये सिलसिला 2014 तक चला.

इस सेक्टर में मंदी का दौर तब दिखा जब कई अग्रणी डेवलपर और प्रॉपर्टी बाज़ार के बादशाह भी इसकी जद में आए.जब सरकार इस सेक्टर में काले धन को रोकने के लिए गंभीर हुई, नतीजे के तौर पर इसका असर रीयल इस्टेट के कई बड़े धुरंधरों पर पड़ा. हालांकि अचानक बहुत तेज़ी से आई इस गिरावट के कई कारण थे.शुरुआती उछाल के पीछे आसान लोन और गिरती ब्याज़ दरें प्रमुख कारणों में से एक थीं. लेकिन यही उन हज़ारों लोगों के लिए घातक भी साबित हुआ, जो रुके हुए और विवादित प्रोजेक्ट में फंस गए थे.

इसके अलावा, कृषि भूमि को बेचकर जल्दी से राजस्व बढ़ाने की राज्य सरकारों की हड़बड़ी भी मांग और आपूर्ति के बीच आए असंतुलन के प्रमुख कारणों में से एक रही है.जैसे ही हाउसिंग सेक्टर में क़ीमतों में भारी गिरावट आई, रुके हुए प्रोजेक्टों की संख्या भी बढ़ती गई.तो सबसे बड़ा सवाल- क्या सालों की निराशा के बाद, सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप फिर से चीजों को पटरी पर ला पाएगा?

लेकिन अदालत से अपने पक्ष में फै़सला आने के बावजूद आम्रपाली और अन्य प्रोजेक्ट में फंसे घर खरीदारों में समय सीमा को लेकर संशय हैं.अदालत ने एनबीसीसी को प्रोजेक्ट पूरा करने का आदेश दिया है लेकिन अगला सवाल है कि फंड कहां से आएगा.चूंकि एनबीसीसी के पास अपना कोई कोष नहीं है, इसलिए वो आम्रपाली की ज़मीनों की नीलामी, बिना बिके घरों को बेचने और घर ख़रीदारों से बकाया पैसे लेने पर निर्भर है.ये भी साफ़ है कि हो सकता है कि एनबीसीसी का विकल्प आम्रपाली के मामले में कारगर हो लेकिन इसके जिम्मे कुछ और प्रोजेक्ट आएगा तो उसके लिए भी मुश्किल बढ़ेगी.

गौरतलब है कि अपने देश के लोग  किराए पर रहने की बजाय घर खरीदने में विश्वास रखते हैं.इसीलिए ताज्जुब है कि इतनी मंदी के बाद भी रीयल इस्टेट अभी भी आकर्षक बना हुआ है और 2030 तक इसके एक ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है.लेकिन जिस तरह से बिल्डरों ने ग्राहकों के साथ धोखा किया है, उनके साथ वादाखिलाफी की है, लोग फिर से घर में निवेश करने की हिम्मत आसानी से नहीं जुटा पायेगें.

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