By, Shrikant Pratyush
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गणतंत्र दिवस विशेष : 26 जनवरी के लिए जन घोषणा-पत्र

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गणतंत्र दिवस विशेष : 26 जनवरी के लिए जन घोषणा-पत्र

गांधीजी लिखित ‘26 जनवरी के लिए स्वाधीनता का घोषणा-पत्र’ के ड्राफ्ट को कांग्रेस की आधिकारिक घोषणा के रूप में जारी किया गया। उसके साथ कार्यक्रम की प्रक्रिया और तरीकों से संबंधित यह निर्देश भी नत्थी किया गया कि 26 जनवरी का दिन हमारे लिए पूर्ण अनुशासन, संयम, प्रतिष्ठा और सच्ची शक्ति के प्रकटीकरण का दिन होगा। स्वाधीनता का घोषणा-पत्र प्रत्येक शहर और प्रत्येक गांव में उद्घोषित हो। पूरे देश में सब जगह एक ही निश्चित समय पर सभाएं हों। इन सभाओं की उपस्थिति बहुसंख्यक बनाने के लिए कांग्रेस के कार्यकर्ता-नेता घर-घर जाएं और लोगों में पर्चे भी बांटे। गांवों में पुराने रिवाज के अनुसार डुग्गी द्वारा सभा के वक्त का ऐलान किया जाए। जो लोग धार्मिक वृˆत्ति के हैं, वे पूर्ववत् उस दिन का कार्यक्रम भी शौच-स्नान आदि से शुरू करें और अपनी सारी शक्ति देश की समस्या और चुनौती पर विचार करने और उसे हल करने के उपायों में खर्च करें। इसके लिए उस दिन वे अपना सारा समय किसी रचनात्मक कार्यक्रम में लगायें, चाहे वह कताई का हो, ‘अछूतों’ की सेवा का हो, हिंदू-मुसलमानों के मेल-मिलाप का हो, शराबबं‹दी का हो या फिर ये सभी काम हों ; ये नामुमकिन नहीं है। जैसे कि एक हिन्दू किसी ‘अछूत’ को अपने साथ ले, और मुसलमान, पारसी, ईसाई, सिख वगैरा को बुलाकर उनके साथ कुछ निश्चित समय के लिए चरखा-दंगल में शामिल हो, या फिर वे सब मिलकर एक घंटे तक खादी की फेरी लगायें। — यह खादी वे सब मिलकर खरीदें और फिर बेचें, और बाद में एक घंटे के लिए पास की किसी शराब की दुकान पर चले जायें, और शराब विक्रेता को समझायें कि इन गं‹दे उपायों से धन कमाना या जीविका उपार्जन करना कितना बुरा है। वे ऐसी दुकानों पर आने वाले शराबखोरों से भी दो बातें करें हैं और फिर शाम की सभा में हाजिर होकर उस दिन का कार्यक्रम सम्पन्न करें। 26 जनवरी रविवार है और उस दिन झंडा फहराना है। ध्वजारोहण समारोह से भी उस दिन का कार्यक्रम प्रारम्भ किया जा सकता है।

घोषणा-पत्र : हमारा विश्वास है कि अपनी प्रगति के लिए पूरा-पूरा अवसर पाने की दृष्टि से दूसरे देशवासियों की तरह हिं‹दुस्तान के लोगों का स्वाधीनता पाने और अपनी मेहनत का सुख भोगने तथा जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं को प्राŒप्त करने का अटल अधिकार है, हमारा यह भी विश्वास है कि अगर कोई सरकार लोगों को उनके अधिकार से वंचित करती है और उन पर जुल्म करती है, तो लोगों को यह भी अधिकार है कि वे उसे बदल दें या उसे समाप्त कर दें। भारत की अंग्रेज सरकार ने हिं‹दुस्तानियों को न केवल उनकी स्वाधीनता से वंचित कर दिया है, बल्कि उसने जनता के शोषण को ही अपना आधार बनाया है और हिं‹दुस्तान को आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक दृष्टि से तबाह कर दिया है। इसलिए हम मानते हैं कि हिं‹दुस्तान को अवश्य ही ब्रिटेन से सम्ब‹ध तोड़ देना चाहिए और ‘पूर्ण स्वराज’ या पूर्ण-स्वाधीनता हासिल करनी चाहिए।

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आर्थिक दृष्टि से भारत को बरबाद कर दिया गया है। लोगों से जो कर वसूल किया जाता है, वह अनुपात में हमारी आमदनी से कही …ज्यादा है। हमारी औसत आमदनी प्रतिदिन सात पैसा (दो पेंस से भी कम) है, और जो भारी कर हम देते हैं उसका 20 फीसदी किसानों से लगान के रूप में वसूल किया जाता है, और 3 फीसदी नमक-कर से वसूल किया जाता है। इस पिछले कर का भार गरीबों पर ही …ज्यादा पड़ता है।

गांव के उद्योग-धंधे, जैसे कि हाथ-कताई, नष्ट कर दिये गये हैं और इस कारण किसानों को साल में कम-से-कम चार महीने बेकार रहना पड़ता है। हस्तकला कौशल के अभाव में उनकी बुद्धि मंद होती जा रही है। जो हुनर इस तरह नष्ट हो गये, और देशों की भांति, उनके बदले में कोई नया धंधा भी नहीं मिल सका है।

आयात-निर्यात कर और मुद्रा की कुछ ऐसी व्यवस्था की गई है कि उनसे किसानों का बोझ और भी …ज्यादा बढ़ता है। इस देश में ब्रिटेन का तैयार किया गया माल ही …ज्यादा तादाद में आता है। इस माल पर जो आयात कर वसूल किया जाता है, उससे उस माल के प्रति पक्षपात स्पष्ट प्रकट होता है, और इससे जो आमदनी होती है उसका उपयोग जनता के बोझ को हलका करने में नहीं किया जाता, बल्कि वह एक अत्यंत फिजूलखर्ची प्रशासन को बनाये रखने में खर्च होता है। इससे भी अधिक निरंकुशता विनियम की दर को ठहराने में की गई है, जिसके कारण देश से करोड़ों रुपये बाहर खिंचकर चले जाते हैं।

राजनीतिक दृष्टि से हिंदुस्तान की प्रतिष्ठा पहले कभी इतनी नहीं ƒघटी थी, जितनी कि अंग्रेजी शासन में घटी है। एक भी सुधार से जनता के हाथ में सच्ची राजनैतिक शक्ति नहीं आई है। हममें से बड़े-से-बड़े को भी विदेशी सत्ता के सामने झुकना पड़ता है।

विचार व्य€क्त करने की स्वतंत्रता और सम्मेलन करने की स्वतंत्रता के अधिकारों से हमें वंचित रखा गया है। हमारे कई देशभाई निर्वासितों की भांति विदेश में रहने को विवश किये गये हैं। और वे अपने घर वापस नहीं आ सकते। हमारी सारी शासन-क्षमता मार दी गई है। और जनता को पटेल, पटवारी या मुहर्रिरी के छोटे-मोटे काम से ही सं‹तोष कर लेना पड़ता है।

सांस्कृतिक दृष्टि से, शिक्षा की इस प्रणाली ने हमें अपनी संस्कृति से काट दिया है और हमें जो प्रशिक्ष‡ण मिला है उसने हमें उ‹न्हीं जंजीरों से और जोर से लिपटे रहना सिखाया है जो हमें [दासता में] बांधे हैं। [Culturally, the system of education has torn us from our moorings and our training has made us hug the very chains that bind us.]

आŠध्यात्मिक दृष्टि से, अनिवार्य निरस्त्रीकरण (compulsory disarmament) ने हमें नपुंसक बना दिया है। और हमारे प्रतिरोध की भावना को कुचल डालने के घातक इरादे से नियुक्त विदेशी सेना की मौजूदगी ने हमें ऐसा सोचने वाला बना दिया है कि न तो हम अपनी रक्षा कर सकते हैं, न विदेशियों के आक्रमण का सामना कर सकते हैं ; यहां तक कि चोर, डाकू या गुंडों के हमलों से भी हम अपने घरों और परिवारों को बचा सकते हैं। जिस शासन ने हमारे देश पर इन चौतरफा विपत्तियों का बोझ लाद दिया है, उसके अधीन रहना हम ईश्वर और मानव जाति के प्रति अपराध करना समझते हैं।

हम मानते हैं कि स्वाधीनता प्राप्त करने के तरीकों में हिंसा का तरीका सबसे ज्यादा कारगर नहीं है। अत: हम, जहां तक हमसे हो सके, ब्रिटिश सरकार से स्वैच्छिक सहयोग छोड़ देंगे, और सविनय अव™ज्ञा की तैयारी करेंगे, जिसमें ‘कर’ न देना भी शामिल है। हमें पक्का विश्वास है कि अगर हम स्वैच्छिक सहयोग करना छोड़ दें और उˆतेजना का कारण उपस्थित होने पर भी हिंसा न करते हुए ‘कर’ देने से इनकार कर दें तो इस अमानुषिक शासन का अंत निश्चित है। अतएव हम पवित्र प्रतिज्ञा करते हैं कि पूर्ण-स्वराज की स्थापना के लिए कांग्रेस समय-समय पर जो हिदायतें देगी उनका हम पालन करेंगे।

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