By, Shrikant Pratyush
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“विशेष” : बेहतर पुलिसिंग नए डीजीपी के लिए बड़ी चुनौती, सभी जिलों के एसपी पर कसने होंगे नकेल

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बिहार के नए डीजीपी के रूप में 1987 बैच के आईपीएस अधिकारी गुप्तेश्वर पांडेय को तैनात किया गया है। इनके पीछे के कार्यों का सपाट मूल्यांकन करें, तो गुप्तेश्वर पांडेय एक शालीन, मृदु, शौम्य और शांत स्वभाव के व्यक्तित्व के स्वामी रहे हैं लेकिन पुलिसिंग और आईपीसी की धाराओं के मामले में बेहद शख्त रहे हैं।

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“विशेष” : बेहतर पुलिसिंग नए डीजीपी के लिए बड़ी चुनौती, सभी जिलों के एसपी पर कसने होंगे नकेल

सिटी पोस्ट लाइव “विशेष” : बिहार के नए डीजीपी की आखिरकार घोषणा हो गयी। चुनावी मौसम में हर तरह के नफा-नुकसान पर केंद्र और बिहार सरकार की भी पारदर्शी और शख्त नजर टिकी हुई थी। बिहार के नए डीजीपी के रूप में 1987 बैच के आईपीएस अधिकारी गुप्तेश्वर पांडेय को तैनात किया गया है। इनके पीछे के कार्यों का सपाट मूल्यांकन करें, तो गुप्तेश्वर पांडेय एक शालीन, मृदु, शौम्य और शांत स्वभाव के व्यक्तित्व के स्वामी रहे हैं लेकिन पुलिसिंग और आईपीसी की धाराओं के मामले में बेहद शख्त रहे हैं। अपने कार्यकाल में इन्होंने अपने दामन पर कोई बड़ा दाग नहीं लगने दिया है। सरकार ने बहुत सोच-समझकर इन्हें यह जिम्मेवारी सौंपी है। खासकर के बिहार में शराबबंदी कानून के लागू होने के बाद भी बिहार में अवैद्य शराब की बिक्री से परेशान सूबे के मुखिया ने इन्हें शराबबंदी की सफलता के लिए विभिन्य जिलों में एक तरीके से ब्रांड एम्बेसडर बनाकर भेजा।

हिंदी,संस्कृत और अंग्रेजी भाषा के प्रखर और प्रभावी विद्वान के तौर पर ख्यातिलब्ध गुप्तेश्वर पांडेय ने लोगों के बीच जाकर शराब से होने वाले सामयिक और भविष्य के भारी नुकसान को लेकर बड़े नायाब अंदाज में बातें साझा की। लोगों ने उन्हें गम्भीरता से सुना और उसके कुछ असर भी हुए। गुप्तेश्वर पांडेय ने इस मुहिम और अभियान के दौरान सिद्दत से महसूस किया कि शराब कारोबार में शराब माफियाओं के साथ-साथ पुलिस वाले और उत्पाद विभाग के कर्मी भी भी लगे हुए हैं। अपने जनसंवाद कार्यक्रम के दौरान ही उन्होंने कईबार इस बात का जिक्र भी किया था कि जो पुलिस वाले शराब कारोबार में संलिप्त पाए जाएंगे, उन्हें अन्य कारोबारियों से दुगुनी सजा का प्रावधान सरकार को करना चाहिए। अब वे सूबे के शीर्षस्थ पुलिस अधिकारी बन चुके हैं ।अब इस ओर इनकी कारवाई कितनी सटीक और कारगर होती है,इसे आगे देखना होगा।

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इसमें कहीं से कोई शक-शुब्बा नहीं है कि बिहार अभी अपराध के मामले में अव्वल राज्य बना हुआ है। बिहार के सभी जिलों में एक तरह से अपराधियों की समानांतर सरकार चल रही है। पिस्तौल रोज धुआं उगल रहा है ।चाकू और धारदार हथियार रोज लहू बहा रहे हैं। हत्या, लूट, छिनतई, राहजनी और बलात्कार की घटना रोजमर्रा की मामूली घटना बनकर रह गयी है। पुलिस पर से आम जनता का भरोसा पूरी तरह से उठ गया है। आम लोगों की जिंदगी और उनके काम-काज अपराधियों की रहमोकरम पर हैं। बेहद कठिन और दुरूह समय में गुप्तेश्वर पांडेय को डीजीपी की जिम्मेवारी मिली है।

डीजीपी की सबसे बड़ी चुनौती

नवागत डीजीपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे सभी जिलों के एसपी की कार्यशैली को ठीक करें। जिले के थाने बिकते हैं ।बोली लगाकर कोई एसआई थानेदार बनता है। ओपी और सहायक थाने भी बिकते हैं ।हमारे सूत्र के मुताबिक 25 हजार से 5 लाख महीने की रेट पर थाने बिकते हैं। एक जिले में कम से कम पांच थाने जरूर ऐसे होते हैं, जहां उगाही के सभी तौर-तरीके और इंतजाम मौजूद रहते हैं। इन थानों की मोटी मासिक रकम तय की जाती है। खासकर के किसी जिले के सदर थाना की बोली सबसे अधिक लगती है। अब जानिए थानेदार कैसे उगाही करते हैं? किसी कांड को अंकित करने के नाम पर थानेदार रकम लेते हैं। कांड में धारदार और मजबूत आईपीसी की धारा लगाने के लिए वसूली होती है।

संदिग्ध के नाम पर गिरफ्तार कर उसे छोड़ने में मोटी रकम की वसूली होती है ।नशे के कारोबारियों से हफ्ता और महीना मिलता है। जमीन कारोबारियों से सांठगांठ कर लाखों की उगाही होती है। वाहन पकड़-धकड़ में कमाई होती है। डायरी कमजोर करने के नाम पर पैसे वसूले जाते हैं। एक थानेदार की बाहरी कमाई के कई रास्ते होते हैं। इसी कमाई के दायरे में किसी कांड के अनुसंधानकर्ता आते हैं। अब इंस्पेक्टर, एसडीपीओ,डीएसपी और एसपी का खेल जानिए। ये हाकिम कांड में दफा हटाने, कुछ आरोपी के नाम हटाने, कुछ दफा अलग से लगाने, कुछ अप्राथमिकी अभियुक्त बनाने के नाम पर और केस को ट्रू और फॉल्स करने के नाम पर मोटी कमाई करते हैं।

उससे ऊपर के अधिकारी नए सिरे से जांच करवाने के नाम पर उगाही करते हैं ।यह खेल लंबे समय से चल रहा है। उगाही के ये सारे तरीके अब संस्कृति और मूल अधिकार का शक्ल ले चुके हैं। पुलिस का सूचना तंत्र बेहद कमजोर है। एक थाना के अपराधी जेल से छूटते हैं,तो इसकी जानकारी दूसरे थाने को नहीं होती है। थाने में अपराधी थानाध्यक्ष के बगल में बैठते हैं और अपने अनुसार मुखबिरी कर अपने प्रतिद्वन्दी अपराधियों की गिरफ्तारी करवाते हैं, जिससे पुलिस खूब वाहवाही लूटती है। थाने में पत्रकार नाम के प्राणी मुख्य दलाल की भूमिका में रहते हैं। ये छुटभैये पत्रकार बेहतर पत्रकार को भी पुलिस की आंखों की किरकिरी बनवा डालते हैं।

कुल मिलाकर नए डीजीपी को बड़ी चुनौती मिली है। अपराधमुक्त और सुंदर बिहार बनाने के लिए डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय को पहले अपने कनीय अधिकारियों पर ही नकेल कसने की जरूरत है। यह बेहद कठिन काम है ।सड़े हुए पुलिस सिस्टम में खाकी से बदबू आ रही है। खाकी को चमकदार बनाने और उसमें हनक लाने के लिए नए डीजीपी को एक जंग का आगाज करना होगा। पुलिस के छोटे से लेकर बड़े अधिकारी जिले के अच्छे लोगों के संपर्क में रहना ही नहीं चाहते हैं।

उन्हें बस अपने फायदे के लोगों से मतलब है। पुलिस के अधिकारी ओजस्वी, प्रभावशाली और समाजसेवियों से नजरें चुराते हैं और उनकी सोहबत से भागते हैं। “पीपुल्स फेंडली पुलिस” महज जुमला बनकर रह गया है। नए डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय से राज्य की जनता को बहुतों आस और उम्मीदें हैं। आगे यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि गुप्तेश्वर पांडेय अपनी कार्यशैली से खाकी पर से जनता का खोया भरोसा फिर से कैसे कायम करवा पाते हैं और जनता के दिलों में खुद को कैसे पैवस्त करा पाते हैं। वैसे डगर बेहद कठिन है पनघट की।

पीटीएन न्यूज मीडिया ग्रुप से सीनियर एडिटर मुकेश कुमार सिंह की “विशेष” रिपोर्ट

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