By, Shrikant Pratyush
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‘एंटी नेस्ट सिन्ड्रोम’ में चली गई है कांग्रेस, पढ़िए विश्लेषण

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फिर ऐसे में शायद ही कोई कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रिय अध्यक्ष पद की जिम्मेवारी लेने को तैयार हो.सबको पता है कि इस पद से उन्हें कुछ मिलनेवाला नहीं है. इस पद पर जो बैठेगा एक तो उसे गांधी परिवार की कठपुतली की तरह काम करना होगा और सारी पार्टी उसी के ऊपर हमला करेगी.

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‘एंटी नेस्ट सिन्ड्रोम’ में चली गई है कांग्रेस, पढ़िए विश्लेषण

सिटी पोस्ट लाइव : आज कांग्रेस नेत्रित्व-विहीन है. राहुल गांधी अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे चुके हैं और कार्यसमिति के सामने इस्तीफ़ा सौंपने के पचास दिन के बाद भी नए नेतृत्व का चुनाव नहीं हो पाया है.ऐसा लगता है- कांग्रेस मौजूदा राजनीति के संभवत: अपने सबसे बड़े संकट से जूझ रही है.प्रदेश इकाइयों से कांग्रेस के लिए बुरी ख़बरें आ रही हैं. कर्नाटक में वह जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) के साथ अपनी गठबंधन सरकार बचाने के लिए संघर्ष कर रही है. गोवा में उसके दो तिहाई विधायकों ने रातोंरात पाला बदल लिया है और बीजेपी के साथ खड़े हो गए हैं. मध्य प्रदेश में भी मुख्यमंत्री कमलनाथ को अपने विधायकों को एकजुट रखने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है.

सबसे बड़ा सवाल-कांग्रेस की ऐसी हालत का ज़िम्मेदार कौन है?  क्या मोदी और शाह की टीम के कांग्रेसमुक्त भारत बनाने की मुहीम का असर कांग्रेस पर दिख रहा है या फिर ख़ुद मोदी और अमित शाह के ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के सपने को साकार करना चाहती है. ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का सपना नरेंद्र मोदी और अमित शाह नहीं, बल्कि ख़ुद कांग्रेस पार्टी साकार कर रही है. ऐसा लगता है कि उन्होंने ख़ुद इच्छामृत्यु का फ़ैसला कर लिया है.

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अंतिम सवाल का जबाब शायद यहीं है कि कांग्रेस खुद कांग्रेसमुक्त भारत की राह पर जा रही है. कांग्रेस के मुंबई और कर्नाटक संकट पर एक नजर डालेगें तो पता चल जाएगा कांग्रेस किस राह पर जा रही है. राहुल गांधी इस्तीफ़ा देकर अमेठी पहुँच गए जबकि उन्हें मुंबई जाकर वहां कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार के बगल में खड़ा होना चाहिए था.उन्हें  अपने तीन मुख्यमंत्रियों के साथ मुंबई जाकर अपनी पार्टी इकाई के पदाधिकारियों को एक एक तगड़ा संदेश देना चाहिए था.लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया.

मध्य प्रदेश में ये हाल है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ ने एक-एक मंत्री को दस-दस विधायकों पर नज़र रखने की ज़िम्मेदारी दी है ताकि वे टूटे नहीं. ऐसे भला सरकार चलती है.ये हाल तब है, जब हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र में इसी साल चुनाव होने हैं. यहां सीधे भाजपा और कांग्रेस की टक्कर है. एक ज़माने में कांग्रेस की हाईकमान बड़ी शक्तिशाली समझी जाती है जो अब लगता है कि बिल्कुल ख़त्म ही हो गई है.राहुल गांधी शायद ये भूल गए हैं कि राजनीति सड़कों पर होती है, सोशल मीडिया पर नहीं.

दरअसल,  कांग्रेस ऐसी पार्टी है जिसके केंद्र में वंशवाद है. वहां अब तक ये व्यवस्था थी कि शीर्ष पद गांधी परिवार के साथ रहेगा और बाक़ी सब उनके नीचे होंगे. और गांधी परिवार उन्हें चुनाव जिताएगा. अब गांधी परिवार चुनाव जिता नहीं पा रहा.अब जो भी नया अध्यक्ष बनेगा, उसे ताक़त के दूसरे केंद्र गांधी परिवार से भी डील करना होगा. कांग्रेस जिस तरह की पार्टी है, वे लोग सब गांधी परिवार की तरफ़ जाएंगे. दरबारी परंपरा इस देश में कांग्रेस के साथ आई है.फिर ऐसे में शायद ही कोई पार्टी की जिम्मेवारी लेने को तैयार हो.सबको पता है कि इस पद से उन्हें कुछ मिलनेवाला नहीं है. इस पद पर जो बैठेगा  एक तो उसे गांधी परिवार की कठपुतली की तरह काम करना होगा और सारी पार्टी उसी के ऊपर हमला करेगी.

अभी जो कुछ कांग्रेस के अंदर हुआ है, वो बहुत ही विचलित करने वाला है.अचानक राहुल गांधी ने जिस तरह से कांग्रेस को छोड़ा है कांग्रेस का ‘सेंट्रिफ्यूगल फोर्स’ ख़त्म हो गया है.राहुल के साथ कांग्रेस भी कोमा में चली गई है.कांग्रेस का नेतृत्व जो उसका केंद्रीय बल था, वो आज नदारद है. इसका असर उसकी प्रांतीय इकाइयों पर दिख रहा है. ख़ासकर उन प्रांतों में जहां कांग्रेस कमज़ोर हैं और जहां नेताओं की नीयत भी ख़राब हैं, वहां टूट-फूट हो रही है.

 कर्नाटक में जो हो रहा है और उससे पहले तेलंगाना में जो हुआ, वो परेशान करने वाली स्थिति है.जहां तक मोदी और अमित शाह के कांग्रेस मुक्त भारत के सपना का सवाल है, उसे खुद कांग्रेस पूरी करती नजर आ रही है. ये नारा भले बीजेपी का हो लेकिन इसके लिए बीजेपी को जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता. कांग्रेस ‘एंटी नेस्ट सिन्ड्रोम’ में चली गई है. 134 बरस की कांग्रेस पार्टी अपने एकलौते युवराज राहुल गांधी के मैदान छोड़ जाने से डिप्रेशन के दौर से गुज़र रही है. उसे समझ नहीं आ रहा है कि फ़ैसला कैसे ले.

कायदे से राहुल गांधी को मैदान छोड़ने से पहले अपने अंतरिम उत्तराधिकारी के चुनाव की प्रक्रिया शुरू करानी चाहिए थी. उस अंतरिम नेता के तत्वाधान में कार्यसमिति या नए अध्यक्ष के चुनाव कराकर और अपने तमाम नेताओं को बुलाकर अपनी बात रखनी चाहिए थी.उन्हें ये कहना चाहिए था कि अध्यक्ष पद पर न रहते हुए भी वो पार्टी में सक्रिय रहेंगे. इससे कार्यकर्ता का हौसला बना रहता, उसे लगता कि यह नेतृत्व परिवर्तन हो रहा है लेकिन पार्टी विघटित नहीं हो रही.लेकिन जिस तरह से ट्विटर के जरिये इस्तीफा देकर वो गायब हो गए, पार्टी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है.

अगर राहुल गांधी इस तरह से मैदान छोड़कर नहीं भागे होते उर उन्होंने  कांग्रेस कार्यसमिति के साथ एक सामूहिक नेतृत्व के स्वरूप में हार की जिम्मेवारी स्वीकार की होती तो स्थिति आज अलग होती.उन्हें कांग्रेस कार्यसमिति का नये सिरे से चुनाव कराना चाहिए था और वहां अबतक बैठे  साठ-सत्तर नयालक लोगों को हटाकर एक से दो दर्जन वैसे संजीदा, विवेकशील नेताओं को बैठना चाहिए था जिनका पार्टी में सम्मान हो. इस नए सामूहिक नेतृत्व में गांधी परिवार की भी भूमिका अहम् होनी चाहिए थी.

इसमे शक की कोई गुंजाइश नहीं कि गांधी परिवार कांग्रेस के लिए बोझ भी है और बड़ी ताक़त भी है.बोझ इसलिए कि कांग्रेस पर वंशवाद का आरोप लगता है . लेकिन हमें ये समझना चाहिए कि गांधी परिवार लोकतांत्रिक वंशवाद का उदाहरण भी  है. वो चुनाव लड़कर आते हैं, चुनाव में हारते और जीतते हैं.लोकतांत्रिक वंशवाद के ऐसे उदाहरण पूरे दक्षिण एशिया और पूरी दुनिया में हैं. आने वाले वक़्त में गांधी परिवार की कांग्रेस में एक भूमिका होगी और वह भूमिका फ़ैसले लेने की सामूहिकता तक सीमित नहीं होगी बल्कि वो पार्टी के भीतर ताक़त का एक समांतर केंद्र बनी रहेगी.

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