By, Shrikant Pratyush
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शहर नहीं मुंगेर है ये, सभ्यताओं की निरंतर बहती धारा का प्रवाह है ये

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महाभारत के सभापर्व और दिग्विजय पर्व में भी इस शहर का उल्लेख मिलता है, जब बाहुबली भीम ने अंग के राजा कर्ण को पराजित किया तो उसके पश्चात उसकी लड़ाई मोदगिरी मे मौदगल्य के साथ हुई। उस समय का मोदगिरी हीं आज का मुंगेर है।

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शहर नहीं मुंगेर है ये, सभ्यताओं की निरंतर बहती धारा का प्रवाह है ये

सिटी पोस्ट लाइव : ये कहानी है गंगा किनारे बसे एक ऐसे शहर की जिसने आर्यों के आगमन से भी पहले जीना सीख लिया था। महाभारत काल की बात करें या फिर मौर्य काल की यह शहर हर दौर में भारतवर्ष के निमार्ण का साक्षी बना रहा। इतिहासकार कभी इसे मोदगिरी के रूप में ग्रंथों में इसका वर्णन करते हैं तो कभी गुप्तागार के रूप में, लेकिन आज यह ऐतिहासिक शहर जाना जाता है मुंगेर के नाम से। महाभारत के सभापर्व और दिग्विजय पर्व में भी इस शहर का उल्लेख मिलता है, जब बाहुबली भीम ने अंग के राजा कर्ण को पराजित किया तो उसके पश्चात उसकी लड़ाई मोदगिरी मे मौदगल्य के साथ हुई। उस समय का मोदगिरी हीं आज का मुंगेर है। यहां चंद्रगुप्त काल का एक शिलालेख भी यहां के प्राचीन कष्टहरनी घाट के तट पर मिला है, जिसमें इस शहर को गुप्तागार के रूप में बताया गया है।

वाल्मिकी द्वारा रचित रामायण के आदि कांड में भी इस शहर के एक प्राचीन घाट कष्टहरनी का जिक्र यह बताते हुए मिलता है कि तारकावध के पश्चात राम और लक्ष्मण ने कुछ समय के लिए यहां विश्राम किया था और उस प्रवास के दौरान उनका सारा कष्ट दूर हो गया तभी से इस घाट का नाम कष्टहरनी पड़ गया। सार यही है कि रामायण हो या महाभारत, मगध राजवंश हो या मुगल और खिलजी वंश, तुगलक हों या तुर्क ऐसा कोई कालखंड नहीं है जब मुंगेर की धरती पर इतिहास के पंजो ने अपनी छाप नहीं छोड़ी। वेनसांग अपने ऐतिहासिक लेखों में शहर को फल और फूलों की खेती में समृद्ध पाते हैं। सरल जलवायु वाले इस शहर को ईमानदार लोगों के लिए अनुकूल बताते हैं। हम अगर इतिहास और इस शहर की ऐतिहासिकता का जिक्र करें तो उसपर एक किताब अलग से लिखी जा सकती है।

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कालांतर में मुंगेर बंगाल के आखिरी नवाब मीर कासिम की राजधानी भी बनी। यहां मीर कासिम ने गंगा नदी के किनारे एक भव्य किले का निर्माण कराया, जो 1934 में आए भूकंप में पूरी तरह से क्षतिग्र्रस्त हो गया था। लेकिन इसका अवशेष अभी भी शेष है। इस किले के बारे में एक मान्यता यह भी है कि यह किला महाभारत काल में जरासंध के द्वारा बनवाया गया था। बहरहाल अब तो बस किले की कुछ चंद दीवारें और दरवाजे हीं शेष रह गयी हैं, जो कि इस शहर को और यहां के लोगों को लगातार अपने इतिहास और प्राचीनता का एहसास करवाती रहती हैं। इस किले के अलावा पीर शाह नुफा का गुंबद भी है जो कि बुद्धिस्ट वास्तुकला का एक अनुपम उदाहरण है। कुछ अन्य ऐतिहासिक धरोहरों की बात करें तो उसमें से शाह-सुजा का महल भी एक है। हांलाकि अब इसको मुंगेर मंडल कारा में परिवर्तित कर दिया गया है। जेलर के ऑफिस के पश्चिम में तुर्की शैली में बना एक बड़ा सा स्नानागार है |

महल के बाहर एक बड़ा से कुआं है जो एक गेट के माध्यम से गंगा नदी से जुड़ा हुआ है। सरकार की ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति उदासीनता का हीं उदाहरण है शाह-सूजा का महल। इस ऐतिहासिक महत्व वाले स्थल को जेल बनाकर सरकार ने ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति अपनी समझ को हीं दर्शाया है। यहां के अन्य पर्यटक स्थलों में मुख्य रूप से सीताकुंड, चंडी स्थान, ऋषिकुंड, भीमबांध, मछली तालाब आदि महत्वपूर्ण हैं। उद्योगों की बात करें तो एक समय ऐसा भी था कि इस क्षेत्र को बंगाल के बर्मिघम के रूप में जाना जाता था। यह बात बिहार-बंगाल विभाजन से पहले की थी। (औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप इंग्लैंड का एक शहर बर्मिंघम अपने यहां लगे उद्योगों के लिए काफी मशहूर था) यहां पर ऐतिहासिक बंदूक कारखाने के साथ हीं अंग्रेजों द्वारा 1862 ई.0 में स्थापित किया गया एशिया का सबसे बड़ा जमालपुर रेलवे वर्कशाप भी इस शहर के औद्योगिक रूप से मजबूत होने की कहानी आज भी बयां करती है।

वर्तमान में यहां आईटीसी की दो फैक्ट्रीयां क्रमशः तम्बाकू और डेयरी प्रोडक्ट्स का उत्पादन भली भांति कर रही हैं। अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र पर मुंगेर अपने योग विद्यालय के लिए भी जाना जाता है। गंगा के किनारे बना योग विद्यालय यहां कि सांस्कृतिक धरोहर तो हैं हीं इसके साथ हीं विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केन्द्र भी है। यहां की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। खेती पर निर्भरता के बावजूद पर कैपिटा इनकम के मामले में मुंगेर पटना के बाद दूसरे नंबर पर है। वर्तमान में यह शहर अवैध हथियारों के निर्माण के लिए खासा चर्चा में रहा है। हाल हीं में एके-47 जैसे हथियार यहां मिलने की बात चर्चा में आयी जिससे यहां रहने वाले लोगों और स्वयं इस शहर की ऐतिहासिक प्रतिष्ठा भी धूमिल हुई है। उत्तरायण गंगा के किनारे हजारों सालों से खड़े शहर ने अनवरत बहते गंगा के साथ कई सभ्यताओ को अपनी आँचल में पनपते देखा है, उजड़ते देखा है कई संस्कृतियों को बनते, बिगड़ते देखा है और आज भी यह अड़ा है और खड़ा है अपनी समृद्ध इतिहास को अपनी गोद में लिए.

अनुराग मधुर की रिपोर्ट

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