By, Shrikant Pratyush
News 24X7 Hour

बिहार में भीषण सूखे के आसार, किसानों के बीच मचने वाला है हाहाकार

Above Post Content

- sponsored -

बिहार इस साल भयंकर सूखे की चपेट में आ सकता है.सोमवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सदन में बिहार में सूखे की आशंका जताते हुए कहा कि अभी से सरकार सूखे से निबटने की तैयारी में जुट गई है.

Below Featured Image

-sponsored-

बिहार में भीषण सूखे के आसार, किसानों के बीच मचने वाला है हाहाकार

सिटी पोस्ट लाइव : बिहार इस साल भयंकर सूखे की चपेट में आ सकता है. सोमवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सदन में बिहार में सूखे की आशंका जताते हुए कहा कि अभी से सरकार सूखे से निबटने की तैयारी में जुट गई है. प्रदेश में सामान्य से अभी 33 प्रतिशत कम बारिश हुई है. जाहिर हैं हालात चिंताजनक हैं.बिहार के किसानों को खरीफ की खेती के लिए तीन नक्षत्र रोहिणी, आर्द्रा और हथिया का इंतजार रहता है. अमूमन इन नक्षत्रों में किसानों को पानी की अधिक जरूरत पड़ती है और दो दशक पहले तक प्रकृति इन किसानों के साथ देती रही, लेकिन अब अक्सर देखा गया है कि अगर इन नक्षत्रों में बारिश नहीं हुई तो राज्य के कई इलाके में सूखे की नौबत उत्पन्न हो जाती है. इस वर्ष भी सूखे जैसे हालात दिखने शुरू हो गए हैं क्योंकि इस बार बिहार में अब तक सामान्य से 33 प्रतिशत कम बारिश हुई है.

मौसम विभाग द्वारा 30 जून तक जारी विस्तृत आंकड़े बताते हैं कि बिहार में 154.8 एमएम बारिश की जगह 91.6 एमएम बारिश हुई है.सामान्य से 41 प्रतिशत कम वारिश सूखे का संकेत है.. पटना में 114.8 एमएम बारिश होनी चाहिए थी पर हुई मात्र 42.5 एमएम यानी 63 फीसदी कम. इसी तरह शेखपुरा में 93 प्रतिशत, औरंगाबाद में 90 प्रतिशत, मुंगेर में 84 प्रतिशत और रोहतास में 83 फीसदी बारिश कम हुई. जबकि सुपौल और पश्चिमी चंपारण में क्रमश: 7 और 44 प्रतिशत सामान्य से अधिक बारिश हुई है.

Also Read
Inside Post 3rd Paragraph

-sponsored-

वर्ष 2018 में बिहार के पटना, मुजफ्फरपुर, नालंदा, भोजपुर, बक्सर, कैमूर, गया, जहानाबाद, नवादा, औरंगाबाद,  सारण,  सिवान, गोपालगंज, बांका, भागलपुर, जमुई, शेखपुरा,  वैशाली, दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, मुंगेर और सहरसा जिले को सूखा ग्रस्त घोषित किया गया था.

बिहार में पानी की बर्बादी के साथ उसके संरक्षण के उपायों पर जोर नहीं देने के कारण ऐसा हुआ है. गौरतलब है कि बिहार का समाज पोखरों और कुओं के जरिए यह काम पारंपरिक रूप से करता ही रहा है, लेकिन आधुनिक होती दुनिया में इसके महत्व को लोग दरकिनार करते चले गए. नतीजा जल संरक्षण के पारंपरिक उपाय खत्म होते चले गए.

स्वतंत्रता के पश्चात जब जल संसाधन का प्रबंधन सरकार ने अपने हाथ में ले लिया तो पूरा सिस्टम गड़बड़ा गया. बड़ी और मझोली सिंचाई परियोजनाएं और स्टेट बोरिंग को सिंचाई का आधार मान लिया गया. तालाब और कुएं बेकार माने जाने लगे. समाज ने भी इन्हें बेकार मानकर भरना शुरू कर दिया, जिसकी वजह से स्थितियां गड़बड़ाने लगीं. पानी संरक्षण तो हो नहीं रहा उल्टा मोटर के जरिये भूगर्भ जल का दोहन जल संसाधन को गहराई से नुकसान पहुंचा रहा है.

बिहार देश के उन गिने चुने राज्यों में है जहाँ वन क्षेत्र बहुत कम है. सबसे कम वन क्षेत्र वाले 10 राज्यों की फेहरिस्त बनाई जाये, तो बिहार उनमें शामिल होगा.फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इण्डिया के रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार का भौगोलिक क्षेत्रफल करीब 94163 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है. इनमें से 7.74 प्रतिशत हिस्से यानी 7288 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में ही वन है.

एक महत्वपूर्ण पहलू ये है कि बिहार और नेपाल से जुड़े हुए इलाके में पर्यावरणीय परिवर्तन हुआ है. 1990 से 2005 के बीच नेपाल में 24.5 फीसदी वन क्षेत्र कम हो गया, जो 11,81,000 हेक्टेयर के बराबर था. वहीं, उत्तर बिहार में बाढ़ को लेकर तटबंध की जो व्यवस्था स्वीकार की गई और सिंचाई का काम भूजल के दोहन से शुरू हुआ, उससे नेपाल के इलाकों में भी भूजल स्तर काफी तेजी से गिर रहा है. इस इलाके में बारिश की मात्रा में 20 से 30 प्रतिशत की गिरावट दर्ज होने के साथ भू-जल का स्तर भी औसतन 4 से 5 मीटर तक नीचे गया है.जाहिर है बिहार के किसानों को सूखे से निबटने के लिए अभी से कमर कास लेना होगा क्योंकि केवल सरकार के भरोसे सूखे से निबटाना असंभव है.

-sponsered-

-sponsored-

Comments are closed.