By, Shrikant Pratyush
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उत्तर-प्रदेश में खतरे में पत्रकार और पत्रकारिता, पत्रकारों के साथ अपराधी जैसा बर्ताव

योगी सरकार को सबसे ज़्यादा ख़तरा पत्रकारों से ही है?

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“उत्तर प्रदेश में पत्रकारों पर शामत आई हुई है. प्रशासन उनके खिलाफ धड़ाधड़ मुक़दमे दर्ज करा रहा है. हाल के दिनों में पत्रकारों पर दर्ज हो रहे मुक़दमों और उनकी हो रही गिरफ़्तारी से तो यहीं लगता है कि या तो पत्रकार सरकार के खिलाफ लिखना छोड़ देगें या फिर जेल उनसे ही भर जाएगा.मिर्ज़ापुर में मिड डे मील में कथित धांधली की ख़बर दिखाने वाले पत्रकार के ख़िलाफ़ दर्ज मुक़दमे का मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि एक और पत्रकार निशाने पर आ गया है.

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उत्तर-प्रदेश में खतरे में पत्रकार और पत्रकारिता, पत्रकारों के साथ अपराधी जैसा बर्ताव

सिटी पोस्ट लाइव : राजीव गांधी ने तो पत्रकारों के खिलाफ मानहानी का मुक़दमा दर्ज कर उनकी आवाज को दबाने की कोशिश की थी लेकिन उत्तर प्रदेश की योगी सरकार तो सरकार की छावी खराब करने के लिए पत्रकारों के खिलाफ अपराधिक मुक़दमा दर्ज करने लगी है. यानी जो पत्रकार व्यवस्था की खामियों को उजागर करेगा तो सरकार व्यवस्था को दुरुस्त करने की बजाय पत्रकार को ही दुरुस्त कर देगी. उसके खिलाफ सरकार की छावी ख़राब करने का मुक़दमा दायर कर उसे जेल भेंज देगी.

“उत्तर प्रदेश में पत्रकारों पर शामत आई हुई है. प्रशासन उनके खिलाफ धड़ाधड़ मुक़दमे दर्ज करा रहा है. हाल के दिनों में पत्रकारों पर दर्ज हो रहे मुक़दमों और उनकी हो रही गिरफ़्तारी से तो यहीं लगता है कि या तो पत्रकार सरकार के खिलाफ लिखना छोड़ देगें या फिर जेल उनसे ही भर जाएगा.मिर्ज़ापुर में मिड डे मील में कथित धांधली की ख़बर दिखाने वाले पत्रकार के ख़िलाफ़ दर्ज मुक़दमे का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि बिजनौर में फ़र्ज़ी ख़बर दिखाने का आरोप लगाकर पांच पत्रकारों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करा दी गई.आज़मगढ़ में एक पत्रकार की ख़बरों से परेशान प्रशासन ने उन पर धन उगाही का आरोप लगाकर एफ़आईआर दर्ज कराई और फिर गिरफ़्तार कर लिया.

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गौरतलब है कि हाल ही में नोएडा में कुछ पत्रकारों को गिरफ़्तार करके उनके ख़िलाफ़ गैंगस्टर ऐक्ट लगा दिया गया था.बिजनौर में जिन पत्रकारों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है उन लोगों ने उस ख़बर को रिपोर्ट किया था, जिसमें एक गांव में वाल्मीकि परिवार के लोगों को सार्वजनिक नल से पानी भरने के लिए रोका गया था.वाल्मीकि परिवार के लोगों ने पलायन के मक़सद से अपने घरों के बाहर ‘मकान बिकाऊ है’ लिख दिया था. बिजनौर के कुछ पत्रकार इस ख़बर को कवर करने गए लेकिन प्रशासन का आरोप है कि ऐसा ख़ुद इन पत्रकारों ने किया.मामले में अभियुक्त बनाए गए एक पत्रकार ने मीडिया से बातचीत में कहा कि इस ख़बर पर जब प्रशासन की किरकिरी होने लगी तो उसने हम लोगों पर फ़र्ज़ी मुक़दमों में एफ़आईआर लिखा दी.

प्रशासन की इस कार्रवाई का बिजनौर के पत्रकारों ने विरोध किया, राज्य के दूसरे हिस्सों में भी विरोध प्रदर्शन हुए मुक़दमा वापस लेने की मांग की गई. बिजनौर के ज़िलाधिकारी रमाकांत पांडेय का कहना है कि जो होना था हो गया लेकिन पत्रकारों के ख़िलाफ़ अब आगे कोई कार्रवाई नहीं होगी.दरअसल, पत्रकारों के उत्पीड़न की ख़बरें आए दिन आती रहती हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो आनी एनसीआरबी की मानें तो देश में पत्रकारों के साथ हिंसा और उन पर हमलों के मामले में उत्तर प्रदेश पहले नंबर पर है.पिछले पांच-छह साल में पत्रकारों के ख़िलाफ़ हिंसा के क़रीब सत्तर मामले दर्ज हो चुके हैं. हिंसा में की पत्रकारों की मौत भी हो चुकी है.

अहम सवाल ये भी है कि क्या ख़बर लिखने के आरोप में पत्रकारों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर और गिरफ़्तारी जैसी कार्रवाई होनी चाहिए, वो भी इसलिए कि इससे सरकार की छवि ख़राब हो रही है? अगर कारवाई होनी चाहिए तो शायद ही कोई पत्रकार जेल जाने से बचेगा क्योंकि पत्रकार का काम ऐसा है कि किसी न किसी पक्ष को पीड़ा पहुंचेगी ही. सरकार जब अपनी आलोचना करनेवालों के खिलाफ कारवाई शुरू कर दे तो लोकतांत्रिक मूल्यों का नाश ही हो जाएगा. पत्रकारिता ही ख़त्म हो जायेगी.

पत्रकार आम जन तक तमाम ख़बरें पहुंचाते ज़रूर हैं लेकिन वो किसी भी ख़बर के प्राथमिक सूत्र यानी प्राइमरी सोर्स नहीं होते हैं. ख़बरें किसी न किसी सूत्र की मदद से ही उन तक पहुंचती है.हालांकि लोगों को ऐसा लगता है कि पत्रकार ही उसका प्राथमिक सूत्र है. दूसरे, पत्रकार और उनकी ख़बरें हर समय सही ही हों, ये कोई ज़रूरी नहीं है और पत्रकारों को इस संदर्भ में कोई विशेषाधिकार प्राप्त हो, ऐसा भी नहीं है.अगर उनकी ख़बरों या रिपोर्टों में कोई तथ्यात्मक त्रुटि है, उससे किसी को ठेस पहुंच रही है या फिर किसी को कोई आपत्ति है तो उसकी शिकायत के लिए अलग फ़ोरम बने हुए हैं,  वहां शिकायत दर्ज होनी चाहिए न कि सीधे एफ़आईआर और गिरफ़्तारी होनी चाहिए.लेकिन उत्तर प्रदेश में तो सरकार और उसकी पुलिस पत्रकारों के साथ अपराधी की तरह पेश आ रही है., एफ़आईआर कर उसे गिरफ्तार कर जेल भेंज दे रही है.

पिछले साल मानहानि संबंधी मामले की सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि प्रेस के बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी पूरी होनी चाहिए और कुछ ग़लत रिपोर्टिंग होने पर मीडिया को मानहानि के लिए नहीं पकड़ा जाना चाहिए.ये टिप्पणी प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानवलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने एक पत्रकार और मीडिया हाउस के ख़िलाफ़ मानहानि की शिकायत संबंधी एक याचिका की सुनवाई के दौरान की थी.गौरतलब है कि वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई और नेटवर्क 18 के संस्थापक और पूर्व प्रबंध निदेशक राघव बहल के ख़िलाफ़ बिहार के पूर्व मंत्री परवीन अमानुल्लाह की बेटी रहमत फ़ातिमा अमानुल्लाह ने मानहानि का मुक़दमा दायर किया था.

अदालत ने कहा था, “लोकतंत्र में सहनशीलता सीखनी चाहिए. किसी कथित घोटाले की रिपोर्टिंग करते समय उत्साह में कुछ ग़लती हो सकती है. परंतु हमें प्रेस को पूरी तरह से बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी देनी चाहिए.”

लेकिन सरकार पर सुप्रीम कोर्ट की इस टिपण्णी का कोई असर नहीं है.उत्तर प्रदेश में पत्रकारों के ख़िलाफ़ प्रशासन की इन कार्रवाइयों पर जगह-जगह विरोध प्रदर्शन भी हो रहे हैं और पत्रकार सड़कों पर भी उतर रहे हैं लेकिन आश्चर्य की बात ये है कि कई पत्रकार संगठनों के सक्रिय होने के बावजूद राजधानी लखनऊ में अब तक इसके ख़िलाफ़ कोई सड़क पर नहीं उतरा.

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