By, Shrikant Pratyush
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पत्रकारों की तरफदारी करने वाले कई संगठन मात्र एक तुक्का, हासिये पर हैं पत्रकार

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आखिर पत्रकारों पर कबतक होते रहेंगे जुल्म, पत्रकारिता का असल सबक लें पत्रकार, झाड़-फानूस से नहीं बनते पत्रकार

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पत्रकारों की तरफदारी करने वाले कई संगठन मात्र एक तुक्का, हासिये पर हैं पत्रकार

सिटी पोस्ट लाइव : एक दौड़ था जब पत्रकारों को सूरवीर, क्रांतिवीर, समाज सुधारक, वृति सुधारक, सच्चा देशप्रेमी, वृहत्तर ज्ञानी, सच के सिपहसालार, प्रणेता, पुरोधा, कुशल नेतृत्व के संवाहक, विभिन्न सःस्थितियों का आईना और आम से खास लोगों के कवच जैसे तमगे से नवाजा जाता था। प्रेमचन्द्र, गणेश शंकर विद्यार्थी, रामवृक्ष वेणीपुरी सहित कई और हस्तियां आधुनिक पत्रकारिता के शिरमौर्य थे। बाद के समय में कई और नाम आये जिसमें निखिल चक्रवर्ती, अरुण सौरी, अरुण सूरी, जे.राम जैसे पत्रकार भी शामिल थे। लेकिन बदलते परिवेश में पत्रकारिता का दायरा बढ़ा जिससे पत्रकारिता के मायने भी बदलते गए।पत्रकारिता का साँचा और मूल कसौटी जस की तस रह गयी लेकिन पत्रकारिता अपना नया अर्थ स्पन्दित करने लगा। पहले बौद्धिक संवेदनाओं का स्खनन करने वाले लोग ही पत्रकारिता के क्षेत्र में आते थे जिनके भीतर सदैव सच्चाई की आग लगी रहती थी। लेकिन वक्त के थपेड़े और भौतिकवादी जीवन की आपाधापी में आज पत्रकारिता अपने संक्रमण काल से गुजर रहा है।

आज पत्रकारिता में ऐसे लोग आ रहे हैं जिनकी ना कोई मौलिक विरासत रही है और ना ही पत्रकारिता का उनमें असल जलजला है। हमें याद है की कुछ दशक अहले जिस घर का बेटा नालायक हो जाता था, उसके अभिभावक कहते थे “अरे निकम्मा अगर कोई डिग्री नहीं ले सकते, तो कम से कम लॉ कर ले। कचहरी में दो पैसे कमायेगा”। ठीक इसी तर्ज पर आज पत्रकारिता चल पड़ी है।पत्रकारिता के क्षेत्र में ऐसे लोगों का पदार्पण हो रहा है जिन्हें पत्रकारिता का ककहरा भी नहीं आता। वे देखा–देखी इस पेशे में इसलिए आ रहे हैं की उनकी पहचान शासन-प्रशासन के लोगों के अलावे समृद्ध लोगों, माफिया और रसूखदारों से होंगे। इस पहचान की आड़ में पिछले रास्ते से उनका भला होता रहेगा और चौक-चौराहे पर उनकी दबिश बनी रहेगी। हम यह नहीं कहना चाहते की सारे के सारे पत्रकारिता की डिग्री ही लेकर आएं लेकिन उनकी शिक्षा-दीक्षा किसी अच्छे संस्थान से जरूर हुयी होनी चाहिए। व्यवहारिक पत्रकारिता आज लेश मात्र भी देखने को नहीं मिलती है। अनुशासन, मर्यादा और दूसरे को सम्मान देने की परिपाटी तो खत्म होने के कगार पर है।

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पत्रकारों पर बढ़ते जुल्म और प्रताड़ना की सब से बड़ी वजह हमारे कुछ तथाकथित पत्रकार साथी भी हैं। कहते हैं”गेहूं के साथ घुन्न भी पीसा जाता है”। “करता कोई है और भरता कोई है”। दूसरे के कृत्य का अंजाम कभी-कभी सधे हुए पत्रकार को भी झेलना पड़ता है। दशकों से पत्रकार हित की लड़ाई लड़ी जा रही है लेकिन उसका बेहतर फलाफल आजतक हासिल नहीं हो पाया है। हम पत्रकार साथी कई खेमों में बंटे हुए हैं। हम बड़े तो हम बड़े की खुशफहमी में हम लगातार नुकसान झेल रहे हैं। हम पत्रकार हित की आवाज बुलंदी से उठायें लेकिन सनद रहे की मदद “पात्र” देखकर की जानी चाहिए। हमेशा अंगुलीमाल “बाल्मीकि” नहीं बन सकता। किसी भी संगठन को अधिक ताकतवर हम तभी बना सकते हैं जब हमें नेतृत्व पर भरोसा हो और खुद के भीतर “मैं बड़ा हूँ” का अहम् ना हो। अच्छे और गुणी लोग अपनी बड़ाई कभी भी ध्वनि विस्तारक यंत्र से नहीं करते हैं। अगर आप अच्छे और सच्चे हैं,तो देर-सवेर लोग जान ही जाएंगे। आईये हमसभी ये संकल्प लें की जिस संगठन से हम जुड़े हैं उसकी मजबूती और पत्रकार हित के लिए हम कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हम उन पत्रकारों के हित के लिए भी लड़ेंगे,जो हमारे संगठन से नहीं जुड़े हैं। एकला चलकर भी पत्रकार ना केवल नयी ईबारत लिख सकता है बल्कि तुरुप का पत्ता और मिल का पत्थर भी साबित हो सकता है।

जाहिर तौर पर देश भर में पत्रकारों पर तरह-तरह के जुल्म ढ़ाए जा रहे हैं। तीन दशक से अधिक का हमारा पत्रकारिता जीवन है।हमने इस कालखण्ड में पत्रकारिता के तरह-तरह के रंग और रूप देखे हैं। आधुनिक पत्रकारिता को फिलवक्त हम हासिये पर देख रहे हैं। पहले पत्रकारिता में ऐसे लोग आते थे जिनके भीतर सेवा और बदलाव का जलजला होता था। हमारी समझ से तब के दिनों में पत्रकार समाजसेवी और समाज सुधारक के तौर पर देखे जाते थे। लेकिन हालिया वर्षों में खोजी पत्रकारिता के नाम पर पीत पत्रकारिता की अपसंस्कृति पुष्पित-पल्लवित हो रही है। पत्रकारिता में ऐसे लोगों की खेप आ चुकी है जिन्हें पत्रकारिता की कोई समझ नहीं है। कंधे पर कैमरा लटकाये और हाथों में मोबाइल लिए पत्रकारिता के इस आधुनिक काल में व्यवहारिक पत्रकारिता के गुड़ कहीं गुम हो चुके हैं। हमें इस बात का भान है की बहुत सारी सःस्थितियों से आपसभी खुद अवगत हैं। पहले पत्रकारों का आचरण एक नजीर हुआ करता था और आज पत्रकार का नाम सुनते ही लोगों की शारीरिक भाषा बदल जाती है। किसी विभाग का चपरासी और एक अदना सा पुलिस विभाग का कॉन्स्टेबल भी पत्रकारों पर आँखें तरेर रहा है।

हमारा मानना है की पत्रकारिता के क्षेत्र में बहुत ऐसे लोग आये और आ रहे हैं, जिन्हें कहीं कोई काम नहीं मिला और मिलता है।साथ ही कई पेशे में रहकर और कई धंधे में रहकर भी लोग पत्रकारिता में इसलिए आ रहे हैं जिससे उनके उद्द्यम् के लिए पत्रकारिता कवच साबित हो। सच्चाई के इस साफ-सुथड़े पेशे में आज दलाली की बू आती रहती है। इस आलेख के जरिये, हम यह कहना चाहते हैं की पत्रकार सुरक्षा कानून लाने में हम अपनी अकूत ऊर्जा को बेहिचक झोंके लेकिन जब कहीं किसी पत्रकार के साथ कोई घटना घटती है, तो हम उनकी मदद अवश्य करें। लेकिन उक्त पत्रकार की विरासत और उनके क्रिया-कलाप की एक बार पड़ताल जरूर करा ली जाए। हम बौद्धिक क्षमता के साथ कदमताल करने के लिए कटिबद्ध हैं। आज पत्रकार के ऐसे संगठन की जरूरत है जिससे देशभर के बड़े पत्रकारों को उससे जोड़ा जाए और संगठन में सिर्फ उत्थान और उद्भव की कोशिश होती रहे।जाहिर तौर पर वह संगठन देश का सर्वोच्च और संस्कारित संगठन साबित हो।

पत्रकार भी इंसान होते हैं। उनके भीतर भी दिल, जज्बात, मानवीय भावना और वृहत्तर सुखों की चाह होती है। उनका भी घर-परिवार और उनकी भी सांसारिक जिम्मेवारियां और फर्ज होते हैं। ऐसा नहीं है की आसमान से टपका कोई खास बन्दा पत्रकार होता है। अपने ही समाज से पत्रकार निकलते हैं। यह बिल्कुल सच और दीगर है की संविधान के तहत पत्रकारों को चौथे स्तम्भ की श्रेणी में रखकर, उन्हें आम से खास बनाया गया है। ऐसे में पत्रकारों के चैतन्य और जागृत सोच के साथ उनके संस्कारित व्यवहार होने जरुरी हैं। हमें समूल की पैमाईश और उच्चतर पैमाने पर उन्हें तौलने की आजादी है। जाहिर तौर पर समाज का हर तबका हमारी निष्ठा के दायरे में आता है। हम पत्रकारों को अपनी श्रेष्ठतम जिम्मेवारी का भान होना जरुरी है। आये दिन पत्रकारों पर होने वाले हमले और उनके साथ हो रहे दुर्व्यवहार पर, आज पूर्वाग्रह से मुक्त होकर,आत्ममंथन जरुरी है। हम अपने तजुर्बे पर ताल ठोंककर कहते हैं की किसी टीवी चैनल का लोगो, किसी अखबार का लेबल, किसी बेब पोर्टल और डिजिटल मीडिया का पहचान पत्र लेकर और कैमरे को कंधे पर लटका भर लेने से पत्रकार नहीं हुआ जा सकता।

पत्रकार होने के लिए सबसे महत्वपूर्ण हमारी बौद्धिक क्षमता, हमारा आचरण और हमारी दूरदर्शी सोच आवश्यक है। हमारी शारीरिक भाषा सर्वप्रथम किसी से हमारा साक्षात्कार कराता है। फिर हम कितनी शालीनता से समाचार संकलन करते हैं, यह मायने रखता है। नेता, मंत्री, सभी विभागों के अधिकारी-कर्मी और अवाम से हम कैसे बात करते हैं, यह भी हमारे व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा है। महज किसी बैनर का तमगा लेकर चाय की चुस्कियां लेना,गुटखे खाना,शराब और अन्य नशे करने के अलावे विभिन्य विभागों के अधिकारियों के साथ उठक-बैठक कर के पत्रकार होना नामुमकिन है। पत्रकार समाज के आईना और प्रहरी हैं। उन्हें पत्रकार की मुकम्मिल आचार-संहिता को समझना चाहिए।

बाईक और चार पहिया वाहन पर प्रेस लिखाकर रौब गांठने से पत्रकारिता के लक्ष्य की प्राप्ति कभी भी सम्भव नहीं है। हमें दुनिया बदलने से पहले खुद को बदलने की जरूरत है। हम पत्रकार हैं हाहाकार और चीत्कार नहीं हैं। मौलिक पत्रकारिता की समझ से परे पत्रकारिता का कोई औचित्य नहीं है। हम अपने अनुभव के आधार पर कहते हैं की ज्यादातर तथाकथित पत्रकार, मुट्ठीभर सच्चे पत्रकार पर भी कालिख पोतने का काम कर रहे हैं। याद कीजिये एक ज़माना था जब सबसे शिक्षित, सभ्रांत और देशप्रेम से ओतप्रोत लोग पत्रकारिता में आते थे और किसी को बजाने का माद्दा रखते थे। आज चौक-चौराहे पर तथाकथित पत्रकारों को बजाया जा रहा है। आखिर में हम यह कहेंगे की “आप भला तो जग भला” और “जैसी करनी वैसी भरनी”। जागो मित्रों जागो ।पत्रकारिता का नया सवेरा लाओ, जिसमें हमारे शौर्य की गाथा की आभा टपक रही हो।

पीटीएन न्यूज मीडिया ग्रुप से सीनियर एडिटर मुकेश कुमार सिंह की “विशेष” रिपोर्ट

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