By, Shrikant Pratyush
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आरक्षण सिर्फ सवर्णों के लिए नहीं बल्कि अनारक्षितों के लिए है, सवर्णों की खुशी है नासमझी और बेमानी

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नोटा का प्रयोग और सवर्णों के विरोध को बीजेपी की हार का सबसे बड़ा कारण बताया जाने लगा। विभिन्य राजनेता और राजनीतिक समीक्षकों ने अपने-अपने तरीके से व्याख्या शुरू कर दी। राजनीतिक जानकारों का कहना था कि तीन प्रदेशों में बीजेपी को मिली हार से सवर्ण को आरक्षण देना पार्टी की विवशता बन गयी थी।

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आरक्षण सिर्फ सवर्णों के लिए नहीं बल्कि अनारक्षितों के लिए है, सवर्णों की खुशी है नासमझी और बेमानी

सिटी पोस्ट लाइव “विशेष विश्लेषण : टेलीविजन पर जैसे ही यह खबर आई कि केंद्र सरकार ने पिछड़े सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण देने का कैबिनेट में फैसला ले लिया है, तत्काल एक अचंभित करने वाला बम फटा और सुकून की दरिया बह निकली। चारों तरफ बिना सोचे-समझे सवर्णों ने मिठाईयां बांटनी शुरू कर दी और जमकर पटाखे भी चलाये। टीवी पर डिबेट शुरू हो गए ।सबसे पहले क्या यह सही हुआ, या गलत इससे डिबेट की शुरुआत हुई। फिर मध्यप्रदेश, राजस्थान में बीजेपी की हार और छत्तीसगढ़ में करारी शिकस्त का समीक्षक हवाला देने लगे। नोटा का प्रयोग और सवर्णों के विरोध को बीजेपी की हार का सबसे बड़ा कारण बताया जाने लगा। विभिन्य राजनेता और राजनीतिक समीक्षकों ने अपने-अपने तरीके से व्याख्या शुरू कर दी। राजनीतिक जानकारों का कहना था कि तीन प्रदेशों में बीजेपी को मिली हार से सवर्ण को आरक्षण देना पार्टी की विवशता बन गयी थी। समवेत चहुंदिश से ये आवाज आने लगी कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी का यह मास्टर स्ट्रोक है।

शुरुआती जानकारी ने हमें भी झांसे में ले लिया और हमने भी सतह पर से ही कई समीक्षा कर डाली। हमें भी लगा था कि विगत कई वर्षों से आर्थिक रूप से हासिये पर लुढ़के सवर्णों के लिए विभिन्य संगठनों के माध्यम से आरक्षण की मांग की जा रही थी। सरकार ने तमाम आंदोलनों को तवज्जो देते हुए यह कदम उठाया है। लेकिन जब हमने इस आरक्षण बिल का पूरा अध्ययन किया, तो हमारे पाँव के नीचे की जमीन ही खिसक गई। असली बात यह है कि सवर्ण आरक्षण के नाम पर उन तमाम जातियों और वर्गों को आरक्षण देने का बिल लाया गया है, जो आजतक आरक्षण से वंचित थे। यानि यह सिर्फ सवर्ण आरक्षण बिल ना होकर अनारक्षित जाति और वर्गों को एकसाथ मिला तोहफा है। यह कहीं से भी सवर्ण आरक्षण नहीं है। खैर धूंध को साफ करते हुए हम यह जरूर कहेंगे कि सरकार ने कुछ तो नई कोशिश की है। संसद के दोनों सदनों में बिल पास होने के बाद भी इसमें कई लोचे हैं। संविधान में संसोधन के बाद भी, इसका लाभ देने और लेने की प्रक्रिया में अभी वक्त लगेंगे।

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सुप्रीम कोर्ट का इस बिल पर क्या रुख होता है, यह देखना भी बेहद जरूरी होगा।लेकिन इस आलेख के माध्यम से हम सवर्ण समाज को आईना दिखाना चाहते हैं और हकीकत से रूबरू कराने चाहते हैं। सरकार को इस बिल का नाम सवर्ण आरक्षण बिल नहीं रखना चाहिए था। सही मायने में, यह अनारक्षित जाति-वर्ग बिल है। भारत के अनारक्षित जाति में ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार, कायस्थ, वैश्य, पटेल, जाट, गुर्जर, मारवाड़ी, मराठा, कापू, लिंगायत, रेड्डी सहित कई अन्य हिन्दू जातियां करीब 35 करोड़, शेख, सैय्यद, पठान सहित पूरे मुस्लिम वर्ग की 50 फीसदी जातियां यानि 8 करोड़,3 करोड़ सिख में से करीब 40 फीसदी, यानि 1.5 करोड़ सिख, कागज पर करीब 4 करोड़ ईसाई, जैन तथा बौद्ध धर्म के भी अनारक्षित वर्ग 2 करोड़ है। यानि कुल मिलाकर 50 करोड़ से ज्यादा अनारक्षित जाति और वर्ग है। यह दस प्रतिशत आरक्षण ऊपर उल्लेखित सभी जातियों और वर्गों के पिछड़ों के लिए है। देशभर में यह हवा बड़ी तेजी से बहने लगी है कि सरकार गरीब सवर्ण के लिए एकाएक बेहद चिंतित हो गयी है। इस खुशफहमी से उबरिये। यह नरेंद्र मोदी का 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले का लॉली पॉप, मास्टर स्ट्रोक और गेम चेंजर बिल है।

पीटीएन न्यूज मीडिया ग्रुप से सीनियर एडिटर मुकेश कुमार सिंह की “विशेष” रिपोर्ट

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