By, Shrikant Pratyush
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आरक्षण का मुद्दा जनकल्याण नहीं, वोट बैंक की राजनीति में हुई तबदील

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आरक्षण का यह मुद्दा जनकल्याण से कही ज्यादा वोट बैंक की राजनीति में तबदील हो चुकी है. राजनीतिक रूप से सक्रिय सभी पार्टी इस मुद्दे पर अलग-अलग प्रतिक्रिया देकर अपना हित साधने में लगी है.

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आरक्षण का मुद्दा जनकल्याण नहीं, वोट बैंक की राजनीति में हुई तबदील

सिटी पोस्ट लाइव : आरक्षण की आवश्यकता या आरक्षण देने का मापदंड जातिगत होना अनिवार्य है या फिर आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की मांग को जायज़ समझा जाये. आरक्षण का यह मुद्दा जनकल्याण से कही ज्यादा वोट बैंक की राजनीति में तबदील हो चुकी है. राजनीतिक रूप से सक्रिय सभी पार्टी इस मुद्दे पर अलग-अलग प्रतिक्रिया देकर अपना हित साधने में लगी है. आज भले हम कहे कि भारत हर क्षेत्र में विकास के नए नए आयाम को छू रहा है लेकिन इसके बाद भी जातिवाद नामक संक्रमण से यह देश अभी भी ग्रसित है. ऐसा नही है कि इस संक्रमण का इलाज नही है, मर्ज है तो इसकी दवा भी है लेकिन जिन हुक्मरानों के पास इस मर्ज की दवा है, वो खुद नही चाहते कि ये देश कभी भी इस संक्रमण से मुक्त हो, भला चाहे भी तो क्यों सत्ता की लोलुपता ने उन्हें इतना स्वार्थी बना दिया है कि देशहित और जनहित की बाते करने के नाम पर सिर्फ और सिर्फ अपना हित साधने में लगे रहते है.

हमारी देश की जनता भी बड़ी समझदार है सब जानते हुए भी बस यही सोच कर चुप रहती है कि देश का मसला है. एक हमारे बोलने से क्या फर्क पड़ने वाला और यह मानसिकता तकरीबन हर किसी की है जिस वजह से इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रिया तो सामने आती है पर आमजन मूकबधिर हो चुके है. आरक्षण का आधार जातिगत है जिस वजह से आर्थिक आधार पर सुदृढ परिवार भी इसका मुनाफ़ा मजे से ले रहे हैं और बहुत से ऐसे परिवार भी हैं जो भले जातिगत आरक्षण के मापदंड पर खड़े न उतरे लेकिन उन्हें दो वक्त की रोटी के लिए आरक्षण की परम आवश्यकता है. सवर्ण आरक्षण की मांग आजकल राजनीतिक गलियारों की सुर्खियां बनी हुई है.

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राजनीतिक पार्टियां लगातार सवर्ण आरक्षण को आर्थिक आधार पर लागू करने की बात कह रही है . मांग हो भी तो क्यों नही चुनाव नजदीक है और हमारे नेता जी को फिर से कुर्सी पर काबिज होना है. ये कोई व्यक्तिगत टिप्पणी नही ये व्यवहारिकता से पूर्ण और कटु सत्य है. चुनाव जब नजदीक आते है नेता जी को अचानक से देश का हित जनकल्याण की बाते समझ आने लगती है .जनाब इतनी ही चिंता है अगर जनता की तो पांच साल के कार्यकाल में चार साल क्या कुंभकर्ण की नींद में थे ? इन चार सालों में आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग को लागू करने की दिशा में आपने क्या भूमिका निभाई है जरा इसका भी रिपोर्ट कार्ड जारी कर दीजिएगा. यह मांग हमारी नही देश की जनता की है. सवाल यह भी है आखिर चुनाव नजदीक आते ही नेता जी की अंतरात्मा एकाएक जाग कैसे जाती है और चुनाव के बाद कुंभकर्ण की नींद कहा लाते है?

नई दिल्ली से मोनालिसा झा की रिपोर्ट

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