By, Shrikant Pratyush
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सियासत के लिए शिक्षा का सहारा क्यों लेना चाहते हैं उपेन्द्र कुशवाहा?

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इस ऐलान के वक्त सबसे खास बात यह रही कि अमित शाह ने अपने सहयोगियों में नीतीश कुमार का नाम लिया, रामविलास पासवान का नाम लिया लेकिन उपेन्द्र कुशवाहा का नाम शाह की जुबान पर नहीं आया।

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सियासत के लिए शिक्षा का सहारा क्यों लेना चाहते हैं उपेन्द्र कुशवाहा?

सिटी पोस्ट लाइव : लंबे वक्त से बिहार के राजनीतिक तापमान को गर्म रखने वाले उपेन्द्र कुशवाहा की नाराजगी को बीजेपी कितनी तवज्जो देती है, यह तभी साफ हो गया था जब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बिहार के सीएम सह जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार को दिल्ली बुलाया और यह एलान कर दिया कि बिहार में बीजेपी और जेडीयू बराबर बराबर सीटों पर चुनाव लड़ेगी। इस ऐलान के वक्त सबसे खास बात यह रही कि अमित शाह ने अपने सहयोगियों में नीतीश कुमार का नाम लिया, रामविलास पासवान का नाम लिया लेकिन उपेन्द्र कुशवाहा का नाम शाह की जुबान पर नहीं आया।

जाहिर है बीजेपी ने भी उपेन्द्र कुशवाहा को उनको उनकी राजनीतिक हैसियत का अहसास करा दिया। सीट शेयरिंग पर किसी भी बातचीत के लिए बीजेपी को 30 नवंबर तक का अल्टीमेटम देने वाले उपेन्द्र कुशवाहा के अल्टीमेटम को भी बीजेपी ने कितनी गंभीरता से लिया यह भी जगजाहिर है। एनडीए में रहकर नीतीश कुमार पर निशाना साधने वाले उपेन्द्र कुशवाहा न सिर्फ जेडीयू के निशाने पर आ गये बल्कि प्रदेश बीजेपी के कद्दावर नेता और बिहार के डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी ने उनपर  हमले शुरू कर दिये। अब चुकी अल्टीमेटम का वक्त खत्म हो चुका है तो सबकी निगाहें इस बात पर टिकी है कि अब उपेन्द्र कुशवाहा का अगला कदम क्या होगा? दरअसल उपेन्द्र कुशवाहा किसी आक्रामक फैसले लेने की स्थिति में खड़े दिखायी नहीं देते।

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यही वजह है कि अल्टीमेटम खत्म होने बाद भी बिहार में ‘कुशवाहा’ क्लाईमेक्स जारी है। वो तमाम कयास फिलहाल खारिज हो गये हैं जो यह  लगाये जा रहे थे कि अल्टीमेटम खत्म होते हीं उपेन्द्र कुशवाहा एनडीए छोड़ देंगे। अब उपेन्द्र कुशवाहा ने नया दांव चल दिया है। शिक्षा के सहारे अब अपनी सियासी राह को आसान करने में जुटे उपेन्द्र कुशवाहा की मांग है कि शिक्षा में सुधार को लेकर उनके जो 25 सूत्री मांग है उसे बीजेपी हस्तक्षेप कर बिहार सरकार से मनवा दें। बिहार के सियासी गलियारों में उपेन्द्र कुशवाहा के एनडीए छोड़ने का सवाल जितना बड़ा है उससे बड़ा सवाल अब यह हो गया है कि आखिर उपेन्द्र कुशवाहा ने शिक्षा को हीं अपना नया राजनीतिक ढाल क्यों बनाया?

दरअसल शिक्षा बिहार की दुखती रग है। शिक्षा के क्षेत्र में बेहतरी और बदहाली के बीच जो फासला वो खाई आज तक नहीं पाटी जा सकी है। सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद भी अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। बेहतर शिक्षा बिहार की बड़ी जरूरत है, वायदों और हकीकत के बीच बड़े फासले को लेकर सरकार को राजनीतिक रूप से भी घेरना आसान है। दशकों बाद  आज भी बिहार के सरकारी स्कूलों के हालात बहुत नहीं बदले हैं। अगर स्थिति बदली होती है तो टाॅपर घोटाले सामने नहीं आते। बिहार के नियोजित शिक्षक सुप्रीम कोर्ट में बिहार सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। समान काम समान वेतन की उनकी मांग पर पटना हाईकोर्ट पहले ही मुहर लगा चुकी है।

जाहिर है बिहार के लिए अब भी शिक्षा की बेहतरी बड़ी जरूरत है और बदइंतजामी से उपजे मुद्दे सियासत की बड़ी खुराक। हांलाकि शिक्षा के सहारे सियासत की राह भी उपेन्द्र कुशवाहा के लिए आसान नहीं लगती। फिर भी उपेन्द्र कुशवाहा अगर शिक्षा को मुद्दा बनाकर अपनी राजनीतिक राह आसान करना चाहते हैं तो उसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि शिक्षा पर सरकार को घेरना ज्यादा आसान है क्योंकि बिहार में शिक्षा से जुड़ी बदहाली और बदइंतजामी को दूर करना सरकार के लिए अब भी बड़ी चुनौती है। उपेन्द्र कुशवाहा कुछ महीनों पहले से हीं शिक्षा को लेकर सरकार को घेरते रहे हैं। हांलाकि उपेन्द्र कुशवाहा के अल्टीमेटम को गंभीरता से नहीं लेने वाली बीजेपी उपेन्द्र कुशवाहा के शिक्षा सुधार के 25 सूत्री मांग को कितनी गंभीरता से लेगी यह देखना बड़ा दिलचस्प होगा।

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