By, Shrikant Pratyush
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आधुनिक नारी का संक्रमण काल : नारी लड़ रही है अस्तित्व की लड़ाई

आधुनिक नारी के संस्कार में आई है भारी गिरावट

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हमने अपने अध्ययन और ज्ञान संग्रहण से यह महसूसा है कि समकालीन पुरातन व्यवस्था के भीतर और उसके बाद के कालखंड में भी नारियां रिश्ते के जेठ जी, देवर, स्वसुर और अन्य रिश्तेदारों के काम ज्वाला की शिकार होती थीं।

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आधुनिक नारी का संक्रमण काल : नारी लड़ रही है अस्तित्व की लड़ाई

सिटी पोस्ट लाइव : हिंदुस्तानी आधुनिक नारी, पुरातन नारी के अस्तित्व को ना केवल कटघरे में खड़े कर रही है बल्कि अपने मूल औचित्य, ओज और संस्कार को भी गंवा रही है। विश्व भर में भारतीय नारी की समृद्ध नैसर्गिक पूंजी सबसे अर्थवान और ओजस्वी रही है। आज के आधुनिकीकरण,वैज्ञानिक चमत्कार और भौतिकवादी दृष्टिगत वस्तुओं के प्रेम ने नारी के गिरावट की पटकथा लिखी है। विश्व में भारतीय नारी की गरिमा विभिन्य रिश्तों में स्खलित  पुरुष को अत्यधिक ऊर्जावान बनाने की औषधि रही है। लेकिन कृत्रिम झंझावत और मकड़जाल में नारी का शौर्य उनकी सजावट और अमर्यादित चाह में कमतर हुआ है।यह एक बड़ा सच है की विज्ञान जब पूरी तरह से हावी होगा, तो नैतिकता और आध्यात्मिक महत्ता का पतन होगा। खासकर नारी का वास्तविक धर्म, उनके चट्टानी और निर्मल संस्कार का वृहत्तर स्खनन है।

विकास और अधिकार के नाम पर आधुनिक नारी आज घर से बाहर निकलकर लोलुपता की गिरफ्त में आ चुकी हैं, जो उनके वास्तविक और मूल्यसंचित जीवन को कतरा-कतरा काटकर कदविहीन कर रहा है। कम उम्र की लड़कियां स्वच्छंद होकर तमाम वर्जनाओं का सर कलम कर रही हैं। देह के स्वाद में पारम्परिक नारी की अनमोल गाथा सिर्फ किताबी रह गयी हैं। घर से बाहर लड़कियां क्या कर रहीं हैं, इसका अवलोकन ना तो परिजन कर रहे हैं और ना ही गुरुजन। पहले के जमाने में समाज सुधारक और नैतिक गुणों से संपन्न महान लोगों का हस्तक्षेप नारी कृत्यों पर रहा करता था। आज के तथाकथित समाज सुधारक, गुणी लोग और गुरुजन खुद बच्चियों का उपभोग कर रहे हैं।

आधी आबादी जैसे शब्द और महिलाओं के हित की लड़ाई, महिलाओं के कमजोर पक्ष का आईना है। आदिकाल से नारी पूज्या रही है। हम वैदिक काल की गार्गी, मैत्रेयी, घोपा, लोपामुद्रा, माधान्त्री, शास्वती, गोधा, विश्वावाला, अपाला, ईला और कात्यायनी की बात करते हैं जिनके ज्ञान और आचरण की पूंजी एक अनूठी सभ्यता और संस्कृति के जिंदा इश्तेहार रहे हैं। उस काल में और उसके बाद भी थोक में ऐसी नारियां रही हैं, जिनकी वृतियाँ नारी महत्ता के सबल सारथी रही हैं। पुरातन काल में नारी की मर्यादा, उन्हें देवी स्वीकारने को मजबूर करती रही हैं। लेकिन तटस्थ पड़ताल करें तो, उस वक्त भी नारी को पूज्या बताकर भोग्या की तरह उनका इस्तेमाल होता था। नारियों का उस जमाने में घर के भीतर नैतिक और दैहिक शोषण होता था।

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हमने अपने अध्ययन और ज्ञान संग्रहण से यह महसूसा है कि समकालीन पुरातन व्यवस्था के भीतर और उसके बाद के कालखंड में भी नारियां रिश्ते के जेठ जी, देवर, स्वसुर और अन्य रिश्तेदारों के काम ज्वाला की शिकार होती थीं। उस समय में अगर कोई मामला उजागर होता था, तब सामाजिक स्तर पर उसके समाधान कर लिए जाते थे। उस समय संचार तंत्र और प्रचार तंत्र नहीं था। आज के आधुनिक काल में इंसान चाँद पर पहुँच चुका है। आधुनिक दौर में,नारी देह महज पुरुषों के खेलने और उन्हें ऊर्जावान बनाने का एक बड़ा साधन बन गया है। जबकि नारी और पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं। लेकिन आज की नारी बेहद लचीली और समझौतावादी हो गयी हैं। माली जरूरत और भौतिक वस्तुओं की चाह में वह आत्मसमर्पण कर रही हैं।

जिस देश में नारी की पूजा होती हो, वहाँ की नारियों को अपने व्यक्तित्व और कृतित्व पर आज विवेचन की जरूरत है। नारी की आंतरिक समृद्धि खत्म हो चुकी है। नारी बाहर की वृतियों में उलझकर अपनी महत्ता और अपने शास्वत औचित्य को गंवा रही हैं। हम आज बेहद शर्मनाक दौर से गुजर रहे हैं।किसी ने बड़ा ठीक कहा है की “अब माँ का आँचल नसीब नहीं होता, क्योंकि माँ अब जीन्स और टॉप पहनती है”। नारी के परिधान, उसके कदमताल, उसकी शरीरिक भाषा और उसके शब्द बेहद मायने रखते हैं। “नारी उत्थान के नारे” नारी के कमतर होने का शंखनाद है। शिक्षा एक अलग पहलू है और उत्थान एक अलग पहलू। हम विदेशी नारियों का भी सम्मान करते हैं। लेकिन विदेश में काम क्रीड़ा एक अलग मानक से संचालित है।

वहाँ की संस्कृति में विवाह संस्कार बेमानी है। विदेश में एक नारी के कई पुरुषों से दैहिक सम्बन्ध स्वीकार्य हैं लेकिन भारतीय संस्कृति में यह कतई स्वीकार्य नहीं है। हमारी समझ से भारतीय संस्कृति विश्व में सर्विपरि है। नारियों के लिए वैवाहिक बंधन बेहद सारगर्भित व्यवस्था है। काम वासना के भटकन को रोकने के लिए विवाह संस्था एक संगठित मूर्त रूप देता है। आधुनिक नारी बेहद खुल चुकी हैं। कम उम्र की लड़कियों के परिधान उत्तेजक और काम-वासना को भड़काने का साधन बन गया है। सिनेमा, टेलीविजन, इंटरनेट और मोबाइल जैसी चीजें कम उम्र की लड़कियों को मौलिक संस्कार से च्यूत कर रही हैं। हम नारी के घर से बाहर निकलकर पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने के कतई खिलाफ नहीं हैं। लेकिन हमारा मकसद आधुनिक नारी के संक्रमणकाल से गुजरने के सच से पाठकों को रूबरू कराना है।

ऐसी कामकाजी महिलाएं जो फिल्म, टेलीविजन और मॉडलिंग पेशे से जुड़ी रही हैं,उनकी जिंदगी के पुराने पन्नों को पलटें और ईमानदारी से उसका अवलोकन करें, तो यह साफ हो जाता है कि नाम, शोहरत और धन की खातिर उन्होंने चाहे-अनचाहे यौन संबंध को स्वीकारा और पुरुष की चाहत और उत्कंठा को सीढ़ी बनाया। वैसे यहाँ पर पुरुषों ने नारी को बेहतर जगह देने के लिए नारी के काम स्वीकृति को आवश्यक बना डाला। इस क्षेत्र में यौनाचार एक संस्कृति बनी रही। आधुनिक काल के इस दौर में, नारी जिस क्षेत्र में अपना कैरियर बनाने गयी, वहां उसे पुरुषों से दो-चार होना पड़ा। सरकारी प्रतिष्ठानों में बड़ी से बड़ी नौकरी में नारी को सेक्सुअल समझौते करने पड़े।

छोटी सरकारी नौकरी मसलन क्लर्क, नर्स, शिक्षिका, आंगनबाड़ी केंद्रों की सहायक और सेविका, आशा कार्यकर्ता, सिपाही और अन्य छोटी और मझौली नौकरी में, नारी कभी स्व ईच्छा से तो कभी परिस्थिति की मांग को लेकर अपना देह परोसती रही हैं। प्राइवेट सेक्टर और मीडिया क्षेत्र में भी नारी देह पर नौकरी और सफलता टिकी हुई है। सरकार की नई परिपाटी कॉन्ट्रैक्ट पर विभिन्य पदों पर लड़कियों की बहाली ने काम वासना के वृहत्तर पट खोले हैं। हम नारी की मूल-चूल गिरावट के लिए सिर्फ नारी जात को दोषी नहीं मानते हैं। पुरुष के लिए नारी सबसे बड़ी ऊर्जा का स्रोत्र और ईंधन है। पुरुष अपनी जरूरत पूरी करने के लिए रास्ते तैयार करता है और फिर नारी उसपर चल पड़ती है।

हमारे पास बहुतों आंकड़े तो इस बात के हैं कि नारी ने पुरुष को यौन संबंध बनाने के लिए विवश किया है। भारतीय नारी को आज आत्ममन्थन, आत्मचिंतन और स्वविवेचन की जरूरत है। नारी महान है। नारी जननी है। नारी सृष्टि है। नारी पूज्या है। नारी अराध्या है। नारी देवी है। अब महज इन नारों से काम नहीं चलने वाला है। आधुनिकता और पुरुष से बराबरी के नाम पर नारी आज पटरी से उतरी हुई हैं। उन्हें खुद को पटरी पर लाना होगा और अपने वाजिब शौर्य का परचम लहराना होगा। आखिर में हम पुरुषों का भी हृदय से आह्वान करते हैं कि नारी सम्मान के संरक्षार्थ, वे भी अपनी सोच में सकारात्मक बदलाव लाएं। हम उनके अभिन्न सहचर, सहयोगी और उन्हीं के हिस्से हैं।

पीटीएन न्यूज मीडिया ग्रुप के सीनियर एडिटर मुकेश कुमार सिंह का विशेष आलेख

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