By, Shrikant Pratyush
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गुजरात के विकास पहिये पर लगा बिहारी ब्रेक, बंद हुए कारखाने और ठप्प है उत्पादन

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28 सितंबर को उत्तर गुजरात के साबरकंठा जिले में 14 महीने की बच्ची से बलात्कार के बाद हिंदी भाषी लोगों पर हमला और फिर उसके बाद वहां से उत्तर भारतीयों का पलायन रुकने का नाम नहीं ले रहा है.

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गुजरात के विकास पहिये पर लगा बिहारी ब्रेक, बंद हुए कारखाने और ठप्प है उत्पादन

सिटी पोस्ट लाइव : अपने देश के नेता जरुरी निर्णय को टालने और लोकप्रिय फैसले लेने के आदी हो चुके हैं. रियल कारवाई करने में पीछे और प्रतीकात्मक कारवाई करने में आगे हैं. 28 सितंबर को उत्तर गुजरात के साबरकंठा जिले में 14 महीने की बच्ची से बलात्कार के बाद हिंदी भाषी लोगों पर हमला और फिर उसके बाद वहां से उत्तर भारतीयों का पलायन रुकने का नाम नहीं ले रहा है. लेकिन वहां के सीएम विजय रूपाणी हालात सामान्य होने के दावे कर रहे हैं. सुरक्षा तो बिहारियों को दे नहीं पाए अब सुरक्षा देने और सबकुछ सामान्य हो जाने के लिए प्रतीकात्मक कारवाई कर रहे हैं.

प्रतीकात्मक कारवाई की इंतहां देखिये.  स्थिति को सामान्य दिखाने के लिए  और  उत्तर भारतीयों में विश्वास जगाने के लिए गुजरात के जिलों में अधिकारी हिंदी भाषी प्रवासी कामगारों को मनाने का नाटक क्र रहे हैं. मुख्य सचिव जे एन सिंह ने प्रभावित जिलों के कलेक्टरों को हिंदी भाषी लोगों के पास जाकर उनमें भरोसा कायम करने के निर्देश दिए हैं.  अरवल्ली जिले के कलेक्टर एन नागराजन और पुलिस अधीक्षक मयूर पाटिल एक प्रवासी कामगार के स्टॉल पर  ‘पानी-पूरी’ खाने पहुँच गए. उन्होंने प्रवासियों के प्रतिनिधियों से मुलाकात की और तस्वीरें सोशल मीडिया में पोस्ट कर सबकुछ ठीक ठीक होने का दावा कर दिया.

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अहमदाबाद, वडोदरा, सूरत और अन्य प्रभावित जिलों के जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान  बड़ी प्रवासी आबादी वाले इलाकों का दौरा कर रहे हैं. प्रवासियों के साथ समय बिता रहे हैं. उन्हें सुरक्षा देने का भरोसा दिला रहे हैं. सबसे ख़ास बात ये है कि आम गुजरातियों के दिल में नफ़रत पैदा करनेवाले नेताओं के खिलाफ कारवाई करने की बजाय गुजरात सरकार के अधिकारी घूम घूमकर हिंदी भाषी लोगों के साथ तस्वीरें खिंचा कर सबकुछ सामान्य होने का भ्रम पैदा क्र रहे हैं.

गुजरात सरकार का कहना है कि उसके अधिकारी हिंदी भाषी प्रवासियों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों के नेताओं के साथ बातचीत कर रहे हैं.उन्हें भरोसा दिला रहे हैं कि वो सुरक्षित हैं गुजरात में. दरअसल, सच्चाई ये है कि विकास की दौड़ में सबसे आगे निकल जानेवाले गुजरात का सबकुछ बिहार और यूपी जैसे सस्ते श्रम के बलबूते है. गुजरात के उद्योग, कल-कारखाने इन्हीं हिंदी भाषी लोगों की मेहनत की वजह से चल रहे हैं. उनके सस्ते श्रम के जरिये आगे बढ़ रहे हैं.

अब जब बिहारी वापस आने लगे हैं, गुजरात सरकार की हवा निकलने लगी है. वहां के कल- कारखानों पर ताले लटकने लगे हैं. वहां के लोगों को निजी सुरक्षा के लिए निजी गार्ड्स नहीं मिल रहे हैं. अब उन्हें इन संसते बिहारी श्रमिकों का मोल समझ में आने लगा है. प्रवासी श्रमिकों के पलायन के चलते राज्य में औद्योगिक इकाइयां बंद हो चुके हैं. त्योहार के इस मौसम के पहले उनके पलायन से  20 प्रतिशत उत्पादन का नुकसान अबतक हो चूका है. साणंद इंडस्ट्रीज असोसिएशन (एसआईए) के अध्यक्ष अजीत शाह ने कहा, ‘उत्तर गुजरात में कार्यरत बिहार और उत्तर प्रदेश के लगभग 12,000 मजदूरों ने अपने घरों को छोड़ दिया है.’साणंद से अकेले पिछले कुछ दिनों में 4,000 प्रवासी श्रमिक राज्य छोड़कर गए हैं.

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