By, Shrikant Pratyush
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अभी भी RJD के साथ नीतीश कुमार के जाने की बची हुई है संभावना?

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एक बड़ा सवाल है- क्या उसी तेजस्वी यादव के साथ नीतीश कुमार सरकार चलायेगें जिनके ऊपर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर उन्होंने RJD का साथ छोड़ दिया था? शिवानन्द तिवारी का तो साफ़ मानना है कि ये असली वजह नहीं था, ये तो महज एक बहाना था और फिर से नीतीश कुमार के बीजेपी विरोधी खेमे में आने की संभावना बची हुई है.लेकिन राजनीतिक पंडितों का मानना है कि  नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए तो फिर से आरजेडी के साथ नहीं जायेगें. यह तभी संभव होगा जब वो मोदी को चुनौती देने का मन बना लें.

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अभी भी RJD के साथ नीतीश कुमार के जाने की बची हुई है संभावना?

सिटी पोस्ट लाइव : लोक सभा चुनाव में मिली शानदार सफलता से बीजेपी के नेता इतने उत्साहित हैं कि अब बिहार में अपने नेता को मुख्यमंत्री बनाने की मांग जोरशोर से उठाने लगे हैं. हमेशा नीतीश कुमार के चहरे पर बिहार में चुनाव लड़नेवाली बीजेपी अब अगला विधान सभा चुनाव मोदी के नाम पर लड़ने की बात करने लगी है.इसबार बीजेपी नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर चुनाव मैदान में उतरने की बजाय चुनाव बाद मुख्यमंत्री को लेकर फैसला लिए जाने की बात करने लगी है.

लेकिन ये सबकुछ इतना आसान नहीं है. पिछले लोक सभा और विधान सभा चुनाव में जेडीयू को मिले वोटों के प्रतिशत का हवाला देते हुए JDU के नेताओं का कहना है कि बिहार में नीतीश कुमार से बड़ा चेहरा कोई नहीं. उनके नाम पर कोई समझौता नहीं हो सकता. 2005 से 2012 तक और फिर 2016 से अबतक  बिहार में एनडीए गठबंधन की सरकार चल रही है.बिहार विधानसभा चुनाव के अभी तक के आंकड़े यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि जेडीयू ने बीजेपी को हमेशा कमतर आंका है.लेकिन इसबार मोदी लहर के सहारे बीजेपी बड़ा भाई बनने को बेताब है. यानी अपना मुख्यमंत्री बनाने की योजना बना रही है.

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2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी और जेडीयू को मिले वोट प्रतिशत में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है. 2019 लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 23.58 फीसदी वोट और 17 सीटें मिलीं. यानी एक नंबर की पार्टी बन गई . जनता दल यूनाईटेड 21.81 फीसदी वोट और 16 सीट जीतकर दूसरे नंबर पर रही.सबसे खास बात ये है कि दोनों दलों ने बराबर बराबर सीटों पर चुनाव लड़ा था. जेडीयू का मानना है कि बिहार में गठबंधन को मिली सफलता की वजह नीतीश कुमार हैं जबकि बीजेपी नेताओं का दावा है कि ये करिश्मा मोदी का है.

2014 के लोकसभा चुनाव में भी 29.4 फीसदी वोट लाकर बीजेपी नंबर वन पर थी.लेकिन अकेले चुनाव मैदान में उतरा जेडीयू 15.8 फीसदी वोट ही ला पाया और तीसरे स्थान पर रहा.लेकिन विधानसभा चुनाव में आरजेडी  के साथ गठबंधन करने के बाद नीतीश कुमार 70 सीटें जीतकर बहुमत के साथ सरकार बनाने में कामयाब रहे.हालांकि ये साथ बहुत कम दिनों का रहा. नीतीश कुमार फिर से बीजेपी के साथ आ चुके हैं.

2020 में फिर विधानसभा चुनाव आने वाला है.इसमे शक की कोई गुंजाइश नहीं कि नीतीश कुमार और बीजेपी को हारने का दम महागठबंधन में नहीं है. लेकिन जिस तरह से बीजेपी की महत्वाकांक्षा बड़ी है और वह झारखण्ड के बाद बिहार में अपनी सरकार बनाना चाहती है, उम्मीद कम है कि वह विधान सभा चुनाव में जेडीयू को बराबर सीटें देगी.ज्यादा सीटों पर चुनाव जीतकर अपना मुख्यमंत्री बनाने की रणनीति के तहत बीजेपी ने अभी से नीतीश कुमार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है.लेकिन समस्या ये है कि लोकसभा चुनाव में जेडीयू का प्रदर्शन बीजेपी से इतना भी ख़राब नहीं है कि वो मुख्यमंत्री की कुर्सी बीजेपी के लिए छोड़ने को तैयार हो जाए. जाहिर है मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर घमशान होना तय है.

लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या जेडीयू मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाए रखने के खातिर फिर से आरजेडी के साथ नहीं जा सकता है? राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है. आरजेडी के नेता शिवानन्द तिवारी भी मानते हैं कि बीजेपी से लड़ाई जीतने के लिए नीतीश कुमार बेहद जरुरी हैं.लेकिन एक बड़ा सवाल है- क्या उसी तेजस्वी यादव के साथ नीतीश कुमार सरकार चलायेगें जिनके ऊपर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर उन्होंने RJD का साथ छोड़ दिया था? शिवानन्द तिवारी का तो साफ़ मानना है कि ये असली वजह नहीं था, ये तो महज एक बहाना था और फिर से नीतीश कुमार के बीजेपी विरोधी खेमे में आने की संभावना बची हुई है.लेकिन राजनीतिक पंडितों का मानना है कि  नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए तो फिर से आरजेडी के साथ नहीं जायेगें. यह तभी संभव होगा जब वो मोदी को चुनौती देने का मन बना लें.

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