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बिहार की 17 सीट पर 15 साल का जातीय समीकरण.

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सिटी पोस्ट लाइव : बिहार में भले राजनीतिक दल अपना चुनावी मुद्दा कुछ भी बताये लेकिन सबको भरोसा जातीय समीकरण पर ही है. बिहार में लोकसभा चुनाव में भी जातीय समीकरण ने अहम् भूमिका निभाई है.NDA ने भी हमेशा जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर ही बिहार में चुनाव लड़ा है और उसे उसका फायदा भी मिला है.इसबार भी चुनाव से पहले बीजेपी ने बिहार में अपने सभी बिखरे सहयोगियों JDU, LJPR, HAM और RLM को साथ जोड़कर जातीय समीकरण मजबूत कर लिया था.नक्षत्र न्यूज़ के एग्जिट पोल के अनुसार भी बिहार में NDA को इसबार भी 29 से 33 सीटें मिल सकती हैं. तमाम कोशिश के वावजूद इंडिया गठबंधन के खाते में 7 से 11 सीटें ही जाती हुई दिखाई दे रही हैं.

इसबार लालू यादव भी राजनीतिकरूप से काफी सक्रीय नजर आये जिस वजह से चुनाव काफी दिलचस्प हो गया था.पिछले लोक सभा चुनाव में तो RJD का खता भी नहीं खुला था लेकिन इसबार आधी दर्जन सीटें उसकी झोली में जा सकती हैं. बिहार में साल 2014 में भाजपा नेतृ्त्व वाले NDA ने 40 में से 31 सीट जीती थीं, जबकि 2019 में उसकी सीट बढ़कर 39 हो गई थीं. NDA की इस जीत का कारण उसकी सोशल इंजीनियरिंग यानी छोटे क्षेत्रीय दलों को जोड़कर जातीय समीकरण अपने पक्ष में कर लेना था. बिहार में जातीय समीकरण कितने हावी हैं, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि साल 2009 से 40 में से 17 सीट पर पार्टी कोई भी जीती हो, लेकिन जीतने वाला उम्मीदवार एक ही जाति का रहा है. इसका मतलब है कि जिस सीट पर 2009 में जिस जाति का उम्मीदवार जीता था, साल 2014 और फिर 2019 में भी उसी जाति का उम्मीदवार जीता है.

बिहार की 40 में से जातीय दबदबे वाली 17 सीट में 8 सीटें सवर्ण जातियों कायस्थ, राजपूत, भूमिहार और ब्राह्मणों के खाते में लगातार जाती रही हैं. पिछले तीनों चुनाव में महाराजगंज, वैशाली, औरंगाबाद और आरा लोकसभा सीटों पर राजपूत उम्मीदवार को ही जीत मिली है. महाराजगंज सीट पर 2009 में उमाशंकर सिंह (RJD) और 2014 व 2019 में जनार्दन सिंह सिगरीवाल (BJP) को जीत मिली थी. सिगरीवाल हैट्रिक बनाने के लिए इस बार भी मैदान में हैं.वैशाली सीट पर 2009 में रघुवंश प्रसाद सिंह (RJD), 2014 में रमाकिशोर सिंह (BJP) और 2019 में भाजपा के समर्थन से वीणा देवी (LJP) ने जीत हासिल की थी. वीणा देवी इस बार भी LJPR के टिकट पर उतरी हैं.आरा सीट पर 2009 में मीना सिंह (JDU) और 2014 व 2019 में ब्यूरोक्रेट से राजनेता बने IAS RK Singh को भाजपा के टिकट पर जीत मिली है. आरके सिंह हैट्रिक बनाने के लिए इस बार भी मैदान में हैं.

बिहार का चित्तौड़गढ़ कहलाने वाली औरंगाबाद सीट पर हमेशा ही राजपूत समुदाय का दबदबा रहा है. यहां से बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व राजपूतों के दिग्गज नेता रहे सत्येंद्र नारायण सिंह 1952, 1971, 1977, 1980 और 1984 में जीतकर लोकसभा पहुंचे थे. लोकसभा चुनाव 1999 में सत्येंद्र नारायण सिन्हा की पुत्रवधू श्यामा सिन्हा और 2004 में दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर निखिल कुमार इस सीट पर जीते. साल 2009 से यह सीट सुशील सिंह जीतते आ रहे हैं.

पिछले 3 दशक से नवादा और मुंगेर लोकसभा सीटों पर भूमिहार समुदाय का दबदबा रहा है. 2009 में यहा भाजपा के टिकट पर भोला सिंह जीते थे तो 2014 में गिरिराज सिंह ने यहां से जीत हासिल की. साल 2019 में यह सीट राम विलास पासवान की LJP को दी गई तो उन्होंने चंदन सिंह को उतारा, जिन्होंने जीत हासिल की. इस बार NDA ने इस सीट पर भाजपा के भूमिहार नेता विवेक ठाकुर पर दांव खेला है.मुंगेर सीट पर 2009 में JDU के उपाध्यक्ष रहे ललन सिंह ने जीत हासिल की थी तो 2014 में LJP की वीणा देवी ने यहां NDA के टिकट पर उतरकर जीत का सेहरा अपने सिर बांधा. 2019 में फिर से ललन सिंह यहां से विजयी हुए थे. इस बार भी ललन सिंह NDA कैंडीडेट के तौर पर मैदान में मौजूद हैं.

दरभंगा सीट पर ब्राह्मण वोटर्स भारी रहे हैं. साल 2009 और 2014 में पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद ने यहां ब्राह्मण उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल की तो साल 2019 में भाजपा नेता गोपालजी ठाकुर यहां जीतने वाले ब्राह्मण नेता रहे. NDA ने इस बार भी गोपालजी ठाकुर पर ही दांव खेला है.पटना साहिब लोकसभा सीट पर कायस्थों का दबदबा रहा है. यहां 2009 और 2014 में बॉलीवुड अभिनेता से राजनेता बने शत्रु्घ्न सिन्हा ने भाजपा के टिकट पर जीत हासिल की थी तो 2019 में पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद इस सीट पर विजेता बने थे. रविशंकर प्रसाद इस बार भी चुनावी मैदान में हैं.

बिहार में साल 2009 से एक ही जाति के दबदबे वाली 17 सीटों में तीन सीटों मधेपुरा, मधुबनी और पाटलिपुत्र पर यादव समुदाय का उम्मीदवार ही जीतता रहा है. यादव समुदाय को हालिया जातीय जनगणना में बिहार का सबसे बड़ा ओबीसी ग्रुप माना गया है. बिहार की जनसंख्या में यादवों की करीब 14% हिस्सेदारी पाई गई है. मधेपुरा सीट पर 2009 में JDU के शरद यादव जीते थे तो 2014 में बाहुबली पप्पू यादव ने RJD के टिकट पर जीत हासिल की थी. हालांकि बाद में पप्पू JDU में ही चले गए थे. साल 2019 में JDU के दिनेशचंद्र यादव ने यहां से जीत हासिल की थी. मधुबनी सीट पर 2009 और 2014 में भाजपा के हुकुमदेव नारायण यादव ने जीत हासिल की थी तो 2019 में उनके बेटे अशोक यादव भाजपा के ही टिकट पर जीते थे. इस बार भी भाजपा ने अशोक पर ही दांव खेला है. पाटलिपुत्र सीट सबसे ज्यादा चर्चित सीट रही है, जिस पर रंजन यादव ने JDU के टिकट पर 2009 में लालू प्रसाद यादव जैसे दिग्गज नेता को मात दी थी. साल 2014 और 2019 में लगातार दो बार इस सीट पर भाजपा के रामकृपाल यादव ने लालू की सबसे बड़ी बेटी मीसा भारती को हराया है.

नालंदा लोकसभा सीट कुर्मी समुदाय के प्रभाव के कारण कुर्मिस्तान कहलाती है. यहां से 2004 में बिहार के मौजूदा CM Nitish Kumar जीते थे, जबकि JDU के ही कौशलेंद्र कुमार 2009 से लगातार तीन बार यहां जीत चुके हैं और फिर से मैदान में हैं.काराकत सीट पर कुशवाहा समुदाय (कोरी समुदाय) का दबदबा रहा है. 2009 और 2019 में इस सीट पर JDU के महाबती सिंह जीते थे, तो 2014 में राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने जीत हासिल की थी. कुशवाहा इस बार भी मैदान में हैं.पश्चिमी चंपारण सीट पर साल 2009 से भाजपा के संजय जायवाल जीतते रहे हैं, जो वैश्य समुदाय की उपजाति जायसवाल से आते हैं. जायसवाल इस सीट पर लगातार चौथी बार मैदान में हैं.

मुजफ्फरपुर सीट पर EBC (अति पिछड़ा वर्ग) वर्ग की मल्लाह जाति (निषाद) का दबदबा 2009 से बना हुआ है. JDU के टिकट पर 2009 में जयनारायण निषाद यहां जीते तो 2014 व 2019 में भाजपा के टिकट पर जयनारायण के बेटे अजय निषाद ने जीत हासिल की है. इस बार अजय भाजपा छोड़कर कांग्रेस के टिकट पर मैदान में हैं. भाजपा ने राजभूषण निषाद को उतारा है.समस्तीपुर सीट SC वर्ग के लिए रिजर्व है, जिस पर 2009 में JDU के महेश्वर हजारी तो 2014 में LJP के रामचंद्र पासवान ने जीत हासिल की. 2019 में रामचंद्र पासवान के निधन के बाद उनके बेटे प्रिंस राज को यहां जीत मिली थी. इस बाद LJP ने NDA कोटे से यहां JDU के मंत्री अशोक कुमार चौधरी की बेटी शांभवी चौधरी को उतारा है.

गया सीट भी SC रिजर्व है, जहां मांझी जाति के नेता 2009 से जीतते रहे हैं. लोकसभा चुनाव 2009 और 2014 में भाजपा नेता हरी मांझी यहां से जीते थे तो 2019 में इस पर JDU उम्मीदवार विजय कुमार मांझी का कब्जा हुआ था. इस बार यहां चुनाव रोमांचक है, क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री और मांझी समुदाय के बड़े नेता जीतन राम मांझी इस सीट पर NDA के कोटे से अपनी पार्टी हिंदुस्तान अवामी मोर्चा (HAM) के टिकट पर खड़े हैं.

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