By, Shrikant Pratyush
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शिवसेना और जेडीयू के लिए BJP के साथ रहना या उसे छोड़ना दोनों नहीं है आसान

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शिवसेना और जेडीयू के लिए BJP के साथ रहना या उसे छोड़ना दोनों नहीं है आसान

सिटी पोस्ट लाइव : दो सहयोगी दल जेडीयू और शिवसेना भारतीय जनता पार्टी के गले की हड्डी बने हुए हैं. ये दोनों पार्टियाँ कई मुद्दों पर बीजेपी से अलग राग अलाप रही हैं. सबके जेहन में यहीं सवाल है कि क्या विधान सभा चुनाव से पहले ये दोनों पार्टियाँ बीजेपी से अलग हो जायेगीं. लेकिन राजनीतिक पंडितों का मानना है कि फिरहाल इन दोनों दलों के पास बीजेपी के साथ बने रहने के अलावा और कोई दूसरा रास्ता नहीं है. उनके पास  कुछ ज्यादा विकल्प नहीं  हैं. महाराष्ट्र में इसी साल तो बिहार में 2020 में चुनाव होना है. पिछली बार के विधानसभा चुनाव में जेडीयू और शिवसेना, बीजेपी से अलग चुनाव मैदान में उतरे थे लेकिन इस बार दोनों दलों के लिए  बीजेपी से अलग होकर चुनाव लड़ना आसान नहीं होगा.महाराष्ट्र में शिवसेना 2014 विधानसभा चुनाव के तुरंत बाद बीजेपी सरकार में शामिल हो गई थी. वहीं बिहार में जेडीयू आरजेडी को छोड़कर  बीजेपी के साथ आ गया था. बीजेपी के सबसे पुराने सहयोगी दलों में शामिल शिवसेना और जेडीयू दोनों ने ही पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी से अलग होकर चुनाव लड़ा.जेडीयू आरजेडी के साथ तो शिवसेना अकेले.

 इसमे शक की कोई गुंजाइश नहीं कि बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू अध्यक्ष नीतीश कुमार बीजेपी के घोषणापत्र से कोई इत्तेफाक नहीं रखते. बीजेपी के धरा 370 के अजेंडे,राम मंदिर और ट्रिपल तलाक के अजेंडे की वजह से वो बेहद असहज महसुश करते हैं. इसी वजह से टकराव टालने के लिए उन्होंने अपना मेंफेसटो टाक जारी नहीं किया. इन्हीं मुद्दों की वजह से नीतीश कुमार 2020 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी का साथ छोड़ सकते हैं. लेकिन ये सबकुछ बहुत आसान नहीं होगा नीतीश कुमार के लिए .पिछले चुनावों के आंकड़े बता रहे हैं कि शिवसेना की तरह ही जेडीयू के पास भी बीजेपी से अलग जाने का कोई विकल्प नहीं है.लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मिली प्रचंड जीत के बाद समीकरण काफी बदल गए हैं.

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2010 का बिहार विधानसभा चुनाव जेडीयू और बीजेपी ने साथ में लड़ा था. इस चुनाव में 243 में से जेडीयू को 115 और बीजेपी को 91 सीटों पर जीत मिली थी. इस चुनाव में जेडीयू का वोट शेयर 22.58 प्रतिशत था वहीं बीजेपी को 16.49 प्रतिशत वोट मिले थे. 2013 में बीजेपी से अलग होने के बाद जेडीयू 2014 के लोकसभा चुनाव में अकेले मैदान में उतरी. इस दौरान जेडीयू के वोट शेयर में 6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और यह आंकड़ा 22.58 से 16.04 प्रतिशत पर आ गया और 40 लोकसभा सीट में से जेडीयू को सिर्फ दो सीटों पर जीत मिल पाई. वहीं बीजेपी के वोट शेयर में 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई और पार्टी 22 सीट जीतने में कामयाब रही.

2015 विधानसभा चुनाव में जेडीयू महागठबंधन में शामिल हो गई, जिसमें आरजेडी और कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियां भी थीं. वहीं दूसरी तरफ बीजेपी, राम विलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा की छोटी पार्टियों के साथ चुनाव लड़ी. इस चुनाव में जेडीयू को 71 सीट मिली थी. वहीं बीजेपी को मात्र 53 सीट से संतोष करना पड़ा. वोट शेयर की बात करें तो बीजेपी को 24.5 प्रतिशत और जेडीयू को 16.83 प्रतिशत वोट मिले थे. जाहिर है कि जेडीयू का वोट शेयर बीजेपी के मुकाबले काफी कम था.इस साल हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी के साथ जेडीयू चुनाव  मैदान में उतरा और इसका लाभ जेडीयू को न सिर्फ सीट के मामले में मिला बल्कि पार्टी के वोट शेयर भी बढ़ें. जेडीयू 17 में से 16 सीट जीतने में कामयाब रहा. वहीं वोट प्रतिशत 21.82 पर जा पहुंचा. वहीं बीजेपी को इस बार 24 प्रतिशत वोट मिले.  बीजेपी राज्य में सबसे ज्यादा वोट शेयर वाली पार्टी बन गई है और उसे छोड़कर अकेले या फिर आरजेडी के साथ चुनाव लड़ना नीतीश कुमार के लिए खतरे से खाली नहीं है..

2009 का महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव बीजेपी और शिवसेना साथ में लड़ी. 288 में से बीजेपी को 46 तो शिवसेना को 44 सीटों पर जीत मिली थी. वहीं दोनों दलों का वोट प्रतिशत क्रमशः 14 और 16 था. लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने सबसे ज्यादा 28 प्रतिशत वोट हासिल किए और 48 में से 23 सीटें जीतने में कामयाब रही. जबकि शिवसेना को 21 प्रतिशत वोट मिले और पार्टी 18 सीट जीती.तमाम विरोधों के बाद भी 2019 लोकसभा चुनाव दोनों दल साथ में लड़े

लोकसभा चुनाव के बाद शिवसेना और बीजेपी ने अलग रास्ते अपना लिए. 2014 के विधानसभा चुनाव में 288 में से बीजेपी को 122 सीटों पर जीत मिली और पार्टी का वोट शेयर 23 प्रतिशत रहा. वहीं शिवसेना को 63 सीटों पर जीत मिली और पार्टी को 19 प्रतिशत वोट मिले. बाद में शिवसेना राज्य सरकार में बीजेपी के साथ शामिल हो गई और कई मौकों पर विरोध करने के बाद भी 2019 का लोकसभा चुनाव दोनों दल साथ में लड़े. नतीजे दोनों दलों के लिए 2014 चुनाव जैसे ही थे लेकिन बीजेपी के साथ आई शिवसेना के वोट शेयर में वृद्धि दर्ज की गई.जाहिर है जब जब बीजेपी के साथ जेडीयू और शिव सेना चुनाव लड़ी ,उन्हें सीट और वोट प्रषित दोनों का लाभ मिला. ऐसे में बीजेपी को छोड़कर नए साथी की तलाश या फिर अकेले चुनाव मैदान में उतरने का प्रयोग  दोनों दलों के लिए महंगा सौदा साबित हो सकता है.

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