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Execlusive: चिराग पासवान की पार्टी LJP के टूट की इनसाइड स्टोरी.

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सिटी पोस्ट लाइव :एलजेपी का एक मतलब बाहुबलियों की पार्टी भी है.रामविलास पासवान बेहद लिबरल लीडर थे. उनके अंदर जात-पात का कोई भेदभाव नहीं था.अमीर-गरीब,साधू-संत जो भी उनके शरण में आया ,उन्होंने सबके माथे पर हाथ रख दिया.उनके इसी स्वभाव की वजह से बिहार के ज्यादातर बाहुबलियों को राजनीति में आने और एक मुकाम पाने का मौका मिला. सूरजभान सिंह, रामा सिंह, मुन्ना शुक्ला, राजन तिवारी, सुनील पांडेय, हुलास पांडे, ललन सिंह जैसे तमाम बिहार के बाहुबलियों को उनकी पार्टी ने ही ब्रेक दिया.एलजेपी बिहार की एकलौती ऐसी पार्टी थी जिसमे बिहार के टॉप 5 अपराधिक छवि के नेता थे.

लेकिन जैसे ही पार्टी की कमान चिराग पासवान के हाथ में आई, तस्वीर बदल गई.चिराग पासवान ने बाहुबलियों को भाव देना बंद कर दिया.जिन बाहुबली नेताओं की पार्टी में खास पूछ थी, वो उपेक्षित और अपमानित महुष करने लगे.चिराग पासवान न तो उनकी सुनते और ना ही अपने पास फटकने देते.इसी का नतीजा था कि रामविलास के बेहद खास रामा सिंह को पार्टी छोड़नी पडी. सूरजभान सिंह जिनकी सलाह से पार्टी में सबकुछ होता था, उन्हें भी चिराग पासवान ने एक बाहुबली के रूप में ही देखा.चिराग (Chirag Paswan) ने पार्टी की कमाल संभालने के बाद सबसे पहले पार्टी की सूरत बदलनी चाही. चिराग का मानना है कि बिहार की राजनीति अब बदल चुकी है. लोग बाहुबलियों से ऊब चुके हैं, लिहाजा उन्होंने सीधे तौर पर दागी और बाहुबलियों से किनारा करना शुरू कर दिया. हालांकि बाहुबलियों के परिवार से उनको कोई परहेज नहीं था. यानी गुड़ खाए और गुल्गुल्ला से परहेज़.

इसमें से कई पार्टी में इतने ताकवर थे कि उनका विरोध राम विलास पासवान भी नहीं कर पाते थे. इसकी वजह ये थी कि अपने धनबल और बाहुबल से वो पार्टी का दिल जीत चुके थे. चुनाव में कभी दूसरे के लिये वोट मैनेज करने वाले ये बाहुबली राजनीति में आकर खुद के लिए वोट बटोरने लगे.सूरजभान सिंह चुनाव नहीं लड़ सकते तो उनके भाई चंदन सिंह को नवादा से टिकट दिया. बाहुबली राजन तिवारी से दूरी बनाई लेकिन उनके भाई राजू तिवारी को पास रखा. विधानसभा चुनाव में RJD के बाहुबली रीतलाल यादव भी टिकट के लिए चिराग के पास पहुंचे थे. चिराग ने साफ कहा कि आपको नहीं, आपके परिवार में किसी को टिकट दे सकते हैं.
चिराग पासवान (Chirag Paswan) का मानना है कि अभी उनके पास 40 से 50 साल तक राजनीति करने की उम्र बची है. पिता रामविलास पासवान (Ram Vilas Paswan) ने जो राजनीति की, वो बिहार में उस वक़्त की मांग थी. अब देश की और बिहार की राजनीति भी बदल चुकी है. इस लिए उन्होंने नया बिहार, युवा बिहार और बिहार फर्स्ट बिहारी फर्स्ट का नया नारा दिया. यानी बिहारी प्राइड को फिर से उभारना. इसलिए उन्होंने युवा नेताओं को तरजीह देनी शुरू की. ऐसे लोग जो मैदान में अपना खून पसीना बहा सकें.चिराग (Chirag Paswan) की इस सोच का कभी पासवान ने भी विरोध नहीं किया.उन्होंने चिराग पासवान को अपने हिसाब से पार्टी चलाने की पूरी छूट दे दी.

वर्ष 2014 लोकसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद को लेकर जब नरेंद्र मोदी का पार्टी के अंदर और NDA में खासकर नीतीश कुमार का विरोध था. चिराग पासवान पासवान ने न सिर्फ नरेंद्र मोदी का समर्थन किया बल्कि अपने इस फैसले में भी रामविलास पासवान को लेते आए. नतीजा सब के सामने था. चिराग, खुद को नरेंद्र मोदी के हनुमान ऐसे ही नहीं कहते. जानकर भी मानते हैं कि आज चिराग पासवान (Chirag Paswan) के पास ना ही परिवार बचा और ना ही बाहुबलियों की ताकत. चिराग (Chirag Paswan) के लिए आने वाला वक़्त मुश्किल भरा होगा. लुटियन ज़ोन से निकलकर जनता ज़ोन में जाना होगा. पसीना भी कुछ ज़्यादा ही बहाना पड़ेगा क्योंकि इस बार यहां उनके दोस्त कम और दुश्मन ज़्यादा हैं.

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