By, Shrikant Pratyush
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बिहार के कई थानों में नहीं है हाजत, मानवाधिकार कार्यकर्ता ने आयोग को लिखा पत्र

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बिहार के शहरी और ग्रामीण क्षेत्र के कितने थानों में हाजत नहीं है और उनमें कितनों में आरोपितों को हाथों की बजाय पैरों में हथकड़ी लगाई जाती है इस बारे में मानवाधिकार कार्यकर्ता विशाल रंजन दफ्तुआर ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, नई दिल्ली को पत्र लिखा है।

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बिहार के कई थानों में नहीं है हाजत, मानवाधिकार कार्यकर्ता ने आयोग को लिखा पत्र

सिटी पोस्ट लाइवः बिहार के शहरी और ग्रामीण क्षेत्र के कितने थानों में हाजत नहीं है और उनमें कितनों में आरोपितों को हाथों की बजाय पैरों में हथकड़ी लगाई जाती है इस बारे में मानवाधिकार कार्यकर्ता विशाल रंजन दफ्तुआर ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, नई दिल्ली को पत्र लिखा है।उन्होंने आयोग के अध्यक्ष को भेजे गये पत्र में लिखा है कि एक आम आदमी जो दोषी सिद्ध न हुआ हो उसको हथकड़ी लगा देना वो भी पैरों में,दरअसल मानवाधिकार हनन का एक गंभीर मामला है। इंसान के सम्मान पूर्वक जीने का प्राकृतिक सोपान है मानवाधिकार ! किसी थाना में किसी सिविलियन को पैरों में हथकड़ी लगाकर आरोपियों को अपमानजनक परिस्थितियों से गुजारना उनको जिन्दगी भर का एक गंभीर मानसिक अवसाद का दंश दे देता है?

दरअसल एक सामान्य नागरिक की मनोदशा को मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने की जरूरत है।हथकड़ी हाथ के लिये है और बेड़ीपैर के लिये है। दफ्तुआर ने लिखा है कि राज्य स्तर पर पुलिसकर्मियों को मानवाधिकारों का व्यापक ज्ञान देने की जरूरत है ताकि पुलिस को पब्लिक फ्रेंडली बनाया जा सके। गया जैसे अंतरराष्ट्रीय और धार्मिक महत्व के शहर का विष्णु पद थाना का बिना हाजत के होना राज्य सरकार की व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाता है। गौरतलब है कि पूर्व में एनजीटी के बिहार में बालू रोक मामले में इनके पत्र को सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस जस्टिस टीएस ठाकुर ने जनहित याचिका में बदल दिया था।

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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी मधेपुरा और गया पुलिस पिटाई मामले में संज्ञान लेते हुये बिहार के चीफ सेक्रेटरी और डीजीपी को सम्मन जारी कर चुका है। इस बारे में उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी आज सूचित किया है।सीएम के स्तर पर तत्काल उनके ईमेल को होम सेक्रेटरी और डीजीपी को भेज दिया गया है.

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