By, Shrikant Pratyush
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क्या ‘नेता मुक्त’ कांगेस के बाद क्षेत्रीय दलों के समाप्त होने की है बारी?

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क्या ‘नेता मुक्त’ कांगेस के बाद क्षेत्रीय दलों के समाप्त होने की है बारी?

सिटी पोस्ट लाइव : 2014 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस-मुक्त भारत और कांग्रेस-मुक्त संसद का दावा करनेवाले बीजेपी के नेता अमित शाह ने 2019 के चुनाव में कांग्रेस को नेता-मुक्त जरुर बना दिया है. आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी सबसे ताकतवर राजनीतिक जोड़ी मानी जा रही है. आज ये दोनों देश की राजनीति के सबसे कद्दावर खिलाड़ी बन चुके हैं. उन्होंने बीजेपी की विशाल सियासी मशीनरी और अथाह दौलत की बदौलत विपक्ष को राजनीति के खेल से ही बाहर कर दिया है और कांग्रेस को नेतामुक्त बना दिया है.

कांग्रेस आज कोमा में पड़ी दिखाई दे रही है.लोकसभा चुनाव में हार के बाद ख़राब प्रदर्शन की ज़िम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया. क्योंकि उनकी अगुवाई में कांग्रेस पार्टी लगातार दूसरा आम चुनाव हार गई.राहुल के इस्तीफ़े के 40 दिन बाद भी कांग्रेस में जुम्बिश नहीं हो रही है  और अब  देश में विपक्ष की राजनीति के ख़ात्मे का दूसरा संकेत कर्नाटक से आ रहा है.. लगता है कि कर्नाटक की मौजूदा सरकार जल्द ही इतिहास बनने वाली है. वहीं, मध्य प्रदेश की मामूली बहुमत वाली कमलनाथ सरकार के भी ज्यादा दिन तक सलामत रहने की गुंजाइश बहुत कम है.यूं तो कमलनाथ हमारे देश की राजनीति के माहिर खिलाड़ियों में से एक हैं. लेकिन फिर भी ऐसा नहीं लगता कि वो जयादा दिनों तक अपनी सरकार बचा पायेगें. राजस्थान में हालत ऐसे ही हैं. बहुमत का अंतर कम है और यहाँ भी मौका मिलते ही बीजेपी बड़ा खेल कर सकती है.

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आज देश की राजनीति में बीजेपी का आत्मविश्वास देखते ही बनता है. बिहार में भी विपक्ष पस्त दिख रहा है.लोकसभा चुनाव में प्रमुख विपक्षी दल आरजेडी, अपने युवा नेता तेजस्वी यादव की अगुवाई में एक भी सीट नहीं जीत सका.इस ऐतिहासिक हार के बाद लापता हुए तेजस्वी यादव अभी हाल ही में प्रकट हुए हैं. ख़ुद लालू यादव जेल में हैं और बीजेपी पूरे राज्य की राजनीति पर हावी होती जा रही है.ऐसे में लालू प्रसाद यादव की दमदार राजनीति का ज़माना ख़त्म होता दिख रहा है.आज की तारीख़ में बीजेपी बिहार में  नीतीश कुमार के छोटे भाई से बड़े भाई की भूमिका में आ चुकी है. बीजेपी लगातार नीतीश को उनकी औक़ात दिखाने की कोशिश कर रही है.एनडीए सरकार के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही मोदी और शाह की जोड़ी ने जदयू को केवल एक मंत्रिपद का प्रस्ताव दिया था. नीतीश कुमार ने उसे ठुकरा दिया लेकिन फिर भी बीजेपी बेपरवाह दिख रही है.

 उत्तर प्रदेश में करारी हार के बाद ताक़तवर क्षेत्रीय दलों समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन दूसरी बार टूट चूका है.लोकसभा चुनाव के लिए हुआ दोनों दलों का ‘ऐतिहासिक गठबंधन’ बीजेपी को 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में रोक नहीं सका. अभी ऐसा लग रहा है कि बीजेपी का उत्तर प्रदेश की राजनीति में जो दबदबा है, वो लंबे समय तक क़ायम रहनेवाला है.बीएसपी सुप्रीमो मायावती, बीजेपी के साथ तालमेल के लिए तैयार हैं. वहीं, अखिलेश यादव अपनी हार और गठबंधन टूटने के ज़ख़्म ही सहला रहे हैं.

मंडल के दौर की राजनीति में अहम रही समाजवादी पार्टी और बीएसपी का असर अब बहुत सीमित रह गया है. कभी अन्य पिछड़े वर्ग की नुमाइंदगी करने वाली इन पार्टियों में से समाजवादी पार्टी अब केवल यादवों की पार्टी रह गई है. तो, बीएसपी का कोर वोट बैंक अब केवल जाटव (मायावती की अपनी जाति) बचे हैं.यहीं हाल बिहार में आरजेडी का है.आरजेडी का ‘माय’ समीकरण लोक सभा चुनाव में ध्वस्त हो चूका है.अगले तीन महीनों में तीन अहम राज्यों, महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं.

कांग्रेस इन राज्यों में भी बीजेपी से मुक़ाबले कमजोर दिख रही है क्योंकि राहुल गांधी के इस्तीफ़े के बाद पार्टी के भीतर अंतर्कलह और बढ़ गई है. पुरानी पीढ़ी और युवा नेताओं जैसे ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा और सचिन पायलट के बीच जंग अब खुलकर सामने आ गई है. हो सकता है कि कांग्रेस में फूट ही पड़ जाए.पश्चिमी यूपी में हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस्तीफ़ा दे दिया. वहीं, मिलिंद देवड़ा ने मुंबई में हार पर इस्तीफ़ा दे दिया.दोनों ही नेता राहुल गांधी के समर्थन में खड़े दिखाई देते हैं. इन नेताओं के निशाने पर असल में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ और राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत हैं. गहलोत तो अपने राज्य राजस्थान में पार्टी को 25 में से एक भी सीट नहीं जिता सके. कमलनाथ भी सिर्फ़ अपने बेटे को जिता पाए.

सवाल उठता है कि क्या देश में एकबार फिर से एक ही राजनीतिक पार्टी का दबदबा कायम होगा, क्षेत्रीय दलों की दूकान बंद हो जायेगी जैसा कि इंदिरा गांधी के जमाने में कभी हुआ था.फिर्हाल जबाब में ‘हाँ’ ही दीखता है.

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