By, Shrikant Pratyush
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लोक सभा चुनाव में ज्यादा नहीं हैं पुराने दावेदार, दमदार उम्मीदवारी के चयन की है चुनौती

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लोक सभा चुनाव में ज्यादा नहीं हैं पुराने दावेदार, दमदार उम्मीदवारी के चयन की है चुनौती

सिटी पोस्ट लाइव : इसबार बिहार में पिछले लोक सभा चुनाव की तरह त्रिकोणात्मक संघर्ष नहीं है. इसबार लड़ाई सीधे NDA और महागठबंधन के बीच है. पिछलीबार संघर्ष त्रिकोणात्मक था और सीटें भी लड़ने के लिए ज्यादा थीं.लेकिन इसबार दो पक्षों के बीच सीधी लड़ाई है.सीटें कम हैं यानी सिर्फ 40 हैं. आप सोंच रहे होगें कि तब तो सीटों के लिए मारामारी मचेगी. लेकिन ऐसा नहीं है. सीट कम है तो दावेदार भी कम हैं.इस लोक सभा चुनाव में पुराने दावेदार कम हैं. सबसे ख़ास बात ये है कि सभी दलों के 2014 वाले उम्मीदवार इधर-उधर हो गए हैं.ऐसे में कम सीटों के बावजूद पार्टी के वफादार लोगों को टिकट मिलने की गुंजाइश बनी हुई है.

सबसे पहले बात करते हैं BJP की. यहां पिछले चुनाव में हार चुके उम्मीदवार इत्मीनान में हैं.वो जानते हैं कि इसबार उन्हें टिकेट नहीं मिलना है.BJP के 22 सांसद है. बेगूसराय के सांसद भोला सिंह का निधन हो चूका है. शत्रुघ्न सिन्हा (पटना साहिब) और कीर्ति झा आजाद (दरभंगा) खुद ब खुद अलग अलग राह अपना चुके हैं. मधुबनी के सांसद हुकुमदेव नारायण यादव ने ज्यादा उम्र होने की वजह से पहले ही राजनीति से सन्यास लेने का एलान कर चुके हैं.यानी चार सीट तो खुद खाली हो चुकी है. इसबार BJP 17 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. ऐसे में केवल एक संसद का ही टिकेट कटना है. गिरिराज सिंह अपनी सीट LJP के खाते में जाने की वजह से चुनाव लड़ने से मन कर सकते हैं. चर्चा है कि पार्टी इसबार उन्हें हिंदुत्व के सबसे बड़े चेहरा के रूप में प्रोजेक्ट करने की फिराक में है.पार्टी उन्हें राज्य सभा से भेंज कर उन्हें पुरे देश में हिन्दुओं की गोलबंदी के काम में लगा सकती है. जाहिर है दावेदारी को लेकर BJP में ज्यादा मारामारी नहीं मचनेवाली.

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पिछले चुनाव में 27 सीटों पर चुनाव लड़नेवाली RJD इसबार सिर्फ 17 सीटों पर चुनाव लड़नेवाली है.सबसे ख़ास बात ये है कि इनमें से नौ दावेदार अपने आप कम हो चुके हैं. पश्चिम चंपारण के उम्मीदवार रहे रघुनाथ झा और शिवहर के अनवारूल हक गुजर चुके हैं. मधेपुरा के सांसद पप्पू यादव अपनी पार्टी बना चुके हैं. मुंगेर के प्रगति मेहता और आरा के उम्मीदवार रहे श्रीभगवान सिंह कुशवाहा JDU में जा चुके हैं. महाराजगंज के प्रभुनाथ सिंह और नवादा के राजबल्लभ यादव सजायाफ्ता होने के चलते चुनाव नहीं लड़ सकते.पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी सारण से लड़ी थीं. अभी वो विधान परिषद की सदस्य हैं. चुनाव लडऩे की दिलचस्पी भी नहीं है. पाटलिपुत्र की उम्मीदवार रहीं मीसा भारती राज्यसभा की सदस्य हैं.हालांकि वो चुनाव लड़ने के मूड में हैं.पाटलिपुत्र सीट से भाई बिरेन्द्र की दावेदारी को लेकर घमशान मचा हुआ है. लेकिन फिर भी ये कहा जा सकता है कि महागठबंधन में RJD को 17 सीटें भी मिलती हैं, तो ज्यादा परेशानी नहीं होगी.

सूत्रों के अनुसार इसबार लोक सभा चुनाव में कांग्रेस को 7-8 से ज्यादा सीटें नहीं मिलनेवाली है. लेकिन उसके लिए राहत की बात ये है कि  2014 के उसके 12 में से आठ उम्मीदवार अपना दावा ठोकने के लिए मौजूद नहीं हैं. किशनगंज के सांसद मौलाना असरारूल हक का निधन हो गया है. मुजफ्फरपुर के डॉ. अखिलेश प्रसाद सिंह राज्यसभा के सदस्य हैं. नालंदा के आशीष रंजन सिन्हा और पटना साहिब के उम्मीदवार रहे कुणाल सिंह राजनीतिक परिदृश्य से ओझल हो चुके हैं.कांग्रेस में नए शामिल हुए तारिक अनवर के लिए सीट का संकट नहीं है. वे पिछली बार भी कांग्रेस-राजद की मदद से एनसीपी उम्मीदवार की हैसियत से चुनाव जीते थे.

JDU को भी कोई ख़ास परेशानी नहीं है. पिछलीबार लोक सभा चुनाव में JDU के केवल दो ही उम्मीदवार चुनाव जीते थे. इसबार BJP के साथ गठबंधन में उसके हिस्से 17 सीटें आई हैं. जाहिर है हारे हुए उम्मीदवार मजबूती के साथ दावेदारी नहीं कर पायेगें .ऐसे में ज्यादा नए लोगों को JDU उम्मीदवार बना सकती है.दुसरे दलों के निराश दमदार नेता JDU के टिकेट पर चुनाव लड़ने के लिए भागदौड़ ज्यादा कर सकते हैं.

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