By, Shrikant Pratyush
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विशेष दर्जा : दानी प्रभु और याचक प्रजा बनाए रखने की स्ट्रैटजी

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विशेष दर्जा : दानी प्रभु और याचक प्रजा बनाए रखने की स्ट्रैटजी

सिटी पोस्ट लाइव : बिहार को विशेष दर्जा’दिए जाने  की मांग मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बड़े ही रोचक अंदाज में किया. सूत्रों के अनुसार इस कैम्पेन की रुपरेखा चुनावी रणनीतिकार प्राशांत  किशोर ने की थी. इस कैम्पेन के तहत नीतीश कुमार के नेतृत्व में उनकी पार्टी जेडीयू ने प्रधानमंत्री को सौंपने के लिए करीब सवा करोड़ लोगों के हस्ताक्षर का अभियान चलाया. उस वक्त इस मुद्दे पर अथॉरिटी होने का दावा करने वाले प्रशासक और विशेषज्ञ, सब इतने व्यस्त दिखते थे मानो सफलता करीब है.ऐसा लगने लगा था कि बस, जैसे ही दिल्ली पहुंचकर प्रधानमंत्री को सवा करोड़ हस्ताक्षर युक्त ज्ञापन देगें, बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिल जाएगा!लेकिन आज तक भी बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग के औचित्य से संबंधित एक भी ‘विमर्श’ ऐसा नहीं है, जो कम-से-कम, पार्टी-राजनीति में सक्रिय लोगों (नेता एवं कार्यकर्ता) को बिहार के पिछड़ेपन के परिप्रेक्ष्य में मूल ‘सवाल’ को समझने की प्रेरणा दे. सरकार की ओर से न ऐसा कोई दृष्टि-पत्र जारी हुआ और न कोई ‘आधारपाठ’ आम जनता के बीच आया.

नीतीश-राज की पारी शुरू होने के पहले के 35-40 सालों में भी बिहार को विशेष दर्जा देने की मांग कई बार उठी थी – क्षेत्रीय पार्टियों की खंडित राजनीति के पॉलिटिकल मूव का महज एक मोहरा बनकर.और, यह मांग पॉलिटिकल मोहरा बनकर पिटती रही.आज भी मांग रूपी इस मोहरे का चेहरा और चरित्रा वैसा ही है. इसमें प्यादा से फर्जी बनने और टेढ़ो-मेढ़ो चलने जैसी शक्ति नहीं आयी है. हालांकि गठबंधन की पार्टी-राजनीति के स्तर पर पहले भी यही कोशिश की जा रही थी और आज भी की जा रही है.

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वैसे, नीतीश कुमार के नेतृत्व में इस मोहरे की पहले दफे की चाल से एक मैसेज को हवा मिली थी. वह यह कि बिहार के ‘विकास’ के लिए बिहारवासियों में ‘बिहारीपन’ का जोड़ (एकता) पैदा हो. पिछड़ा बिहार अपनी शक्ति के साथ अपनी उन कमजोरियों को भी पहचाने जो उसे जुझारू होकर भी ‘याचक’ बने रहने को विवश करती हैं.लेकिन प्रथम पांच साल के बाद से श्री नीतीश कुमार ने सत्ता पर काबिज रहने के लिए जो राजनीतिक कलाबाजी दिखाई, उससे स्पष्ट हुआ कि विशेष दर्जे की मांग ‘दाता’ प्रभु और ‘पाता’ प्रजा के पुराने राजनीतिक संबंध – शासक-शासित संबंध की टूटती-बिखरती राजनीतिक रस्सी को सलामत रखने की ‘स्ट्रैटजी’ भर है.

तमाम सरकारें पिछड़े बिहार के विकास के नाम पर खुद को ‘दाता’ साबित करने की राजनीति करती आयी थीं और चाहती थीं कि बिहार भी अंग्रेजों के जमाने से बनी पिछड़े राज्यों की कतार में ‘याचक’ की मुद्रा में खड़ा रहे. विशेष राज्य के दर्जा की मांग को नीतीश कुमार ने प्रभु राजनीति का ऐसा प्यादा मोहरा बनाने की कोशिश की, जिसको हाथ में लेकर खुद ‘याचक’ प्रजा इसके फर्जी चाल के लिए नीतीश कुमार के ‘दाता’ बने रहने की सत्ता-राजनीति की सलामती की दुआ करे.

पिछले चुनाव (2015 – बिहार विधानसभा चुनाव) के वक्त नीतीश-लालू गठबंधन के खिलाफ आग उगलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने बिहार के विकास के नाम पर करोड़ों के विशेष पैकेज की घोषणा की थी और अपनी सरकार और अपनी पार्टी को सबसे बड़े ‘दाता’ के रूप पेश किया था. तब पिछड़े बिहार के इतिहास का यह पन्ना अनायास खुल गया कि बिहार ने आजादी की पिछले 50-60 साल में केंद्र की सत्ता के समक्ष अपनी आर्थिक ‘मांग’ पेश की, लेकिन इसके लिए कभी केंद्र के समक्ष याचक बनकर खड़ा होना मंजूर नहीं किया, और इसीलिए वह आज तक आर्थिक ‘पिछड़ेपन’ की पीड़ा भोगता आ रहा है. केंद्र की पूर्ववर्ती ‘इंदिरावादी’ सरकार हो या वर्तमान ‘मोदीवादी’ सरकार, बिहार के ‘जुझारू’ होने की आजाद फितरत इसे देश के प्रभु गुलाम मानसिकता का ‘गुरूर’ कहते हैं को तोड़ने के लिए उसे ‘याचक’ बनने को विवश करती हैं.

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