By, Shrikant Pratyush
News 24X7 Hour

RSS की जासूसी के क्या हैं राजनीतिक मायने, BJP के साथ कबतक रहेगें नीतीश

- sponsored -

-sponsored-

RSS की जासूसी के क्या हैं राजनीतिक मायने, BJP के साथ कबतक रहेगें नीतीश

सिटी पोस्ट लाइव :बिहार में आरएसएस सहित 19 हिंदूवादी संगठनों और उनके सदस्यों से संबंधित सूचनाएं एकत्रित करने के लिए बिहार विशेष शाखा की चिट्ठी पर सियासी घमासान मचा हुआ है.राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह सीएम नीतीश के आदेश से जारी किया गया था, क्योंकि गृह विभाग उनके जिम्मे है. हालांकि, बुधवार की शाम विशेष शाखा के एडीजी जेएस गंगवार ने सफाई देते हुए कहा इस मामले में पुलिस मुख्यालय, गृह विभाग और सरकार की न तो कोई भूमिका है न कोई आदेश-निर्देश दिया गया था. इसके बाद देर शाम सीएम नीतीश कुमार ने इस मामले को गंभीरता से लिया और डीजीपी, गृह सचिव, एडीजी (सीआईडी) को तलब किया. मुख्यमंत्री ने अफसरों से पूरे मामले की जानकारी ली. उनको समुचित कार्रवाई करने को कहा.

दरअसल आनन-फानन में पुलिस की प्रेस कॉन्फ्रेंस और सीएम नीतीश का जांच के लिए निर्देश दिया जाना इस बात को साबित करता है कि इस प्रकरण ने जेडीयू-बीजेपी गठबंधन के बीच नई खींचतान शुरू कर दी है. बीजेपी इस पर सरकार से जवाब मांग रही है और जेडीयू के नेता मुद्दे से पल्ला झाड़ रहे हैं. वहीं कांग्रेस और आरजेडी ने इस मसले पर नीतीश कुमार का साथ दिया है. जाहिर है नीतीश को कांग्रेस-आरजेडी के समर्थन को एक राजनीतिक संकेत माना जा रहा है.

Also Read

-sponsored-

हालांकि इसका बिहार की राजनीति पर दूरगामी असर क्या होगा, यह अभी भविष्य के गर्भ में है, लेकिन प्रदेश में इसको लेकर कयासों का बाजार गर्म है. सवाल ये कि क्या नीतीश कुमार कोई ऐसा कदम उठा सकते हैं जिससे बीजेपी-जेडीयू गठबंधन की सरकार पर कोई खतरा होगा या फिर ये महज राजनीतिक चर्चा का विषय भर है, जिसके चटखारे लिए जा रहे हैं.

राजनीतिक जानकारों की मानें तो सत्ता के इस खेल में जेडीयू-बीजेपी के बीच दूर-दूर, पास-पास वाली राजनीति जारी है. आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों की जानकारी जुटाना कोई छोटा निर्णय नहीं है. जरूर इसमें आला अधिकारियों और नेताओं की सहमति रही होगी तभी इतने बड़े स्तर पर सूचनाएं एकत्रित करने को कहा गया.लेकिन राजानीतिक पंडितों का मानना है कि फिरहाल नीतीश कुमार को जो संदेश देना था वो दे चुके हैं.बिहार की गठबंधन राजनीति पर फिलहाल इसका असर नहीं पड़ने वाला है. नीतीश कुमार कोई बड़ा निर्णय  अगले साल मार्च में विधान सभा सत्र के बाद ही लेगें. आरजेडी और कांग्रेस को बेसब्री से  नीतीश कुमार का इंतज़ार है. लेकिन जेडीयू की राजनीति को फिलहाल भाजपा का साथ ही सूट कर रही है.

इसे कुछ राजनीतिक पंडित दबाव की राजनीति के रूप में भी देख रहे हैं. मोदी सरकार- 2 में नीतीश कुमार को ज्यादा अहमियत नहीं मिल रही है. उन्हें लगता है कि इतनी बड़ी जीत का उन्हें भी श्रेय मिलना चाहिए जबकि बीजेपी इसके लिए तैयार नहीं है. केन्द्रीय कैबिनेट में जेडीयू को और कृषि विभाग की मुख्यमंत्रियों की समिति में नीतीश कुमार को जगह नहीं दिया जाना सामान्य बात नहीं है.फिलहाल सरकार को तो कोई खतरा नहीं दिख रहा है.क्योंकि वर्तमान में  किसी भी राजनीतिक दल में सरकार बनाने की कूवत नहीं है. हालांकि इतना अनुमान लगाया जा सकता है कि 2020 में होने वाले विधानसभा चुनाव से चार-छह महीने पहले कुछ हलचल जरूर दिख सकती है.

नीतीश कुमार की खासियत कहिये या फिर कमी, उन्हें कोई डिक्टेट नहीं कर सकता है. ऐसे में नीतीश कुमार का आरजेडी के साथ दोबारा जाना मुश्किल है. वहीं नीतीश के लिए फिलहाल बीजेपी से अलग होना भी आत्मघाती कदम होगा.लेकिन बीजेपी के साथ इस तरह से सरकार चलाते रहना भी नीतीश कुमार के स्वभाव से मेल नहीं खाता है.बीजेपी के लिए नीतीश कुमार तो नीतीश कुमार के लिए बीजेपी मज़बूरी बनी हुई है. इसी मज़बूरी की वजह से सरकार अभी चलती रहेगी जबतक कि राष्ट्रिय राजनीति करने की नीतीश कुमार की महत्वकांक्षा फिर से एकबार जोर न मारे.

लेकिन आने वाले समय में कई मौके आएंगे जब संसद में आने वाले समान नागरिक संहिता, धारा 370 और 35 ए जैसे मुद्दों पर दोनों ही दलों को अग्निपरीक्षा के दौर से गुजरना होगा.ऐसे में बीजेपी और नीतीश की जेडीयू, दोनों ही सैद्धांतिक आधार पर अलग होने की भी तैयारी जारी रखे हुए है. आरएसएस और उससे जुड़े संस्थाओं की जानकारी जुटाना अल्पसंख्यकों के वोट पाने का एक बड़ा हथियार साबित हो सकता है, लेकिन यह आने वाले समय की राजनीति के लिए है न कि अभी के लिए.तो इस खबर का लब्बोलुवाब यहीं है कि बीजेपी और जेडीयू दोनों की अपने बूते सरकार बनाने की तैयारी तो चल रही है लेकिन अगले साल मार्च तक यह गठबंधन हर हालत में जारी रहेगा.

-sponsered-

-sponsored-

Comments are closed.