By, Shrikant Pratyush
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एकसाथ लालू-नीतीश को साधने के चक्कर में फंस गए तेजस्वी यादव?

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एकसाथ लालू-नीतीश को साधने के चक्कर में फंस गए तेजस्वी यादव?

सिटी पोस्ट लाइव : लालू यादव ने जेल जाने से पहले अपनी राजनीतिक विरासत अपने छोटे बेटे तेजस्वी को जब सौंपी तो सबके जेहन में ये सवाल उठ रहा था कि क्या तेजस्वी लालू यादव की राजनीति को आगे बढ़ा पायेगें? लेकिन जिस तरह से नीतीश कुमार के साथ तेजस्वी यादव ने सरकार चलाई और जब नीतीश कुमार अलग हो गए तो उनके ऊपर लगातार निशाना साधा ,उससे लगा कि तेजस्वी को अपना राजनीतिक वारिश बनाने का लालू यादव का निर्णय बिलकुल सही था. तेजस्वी कम समय में एक तेज तर्रार युवा नेता के रूप में उभरे. सभी बीजेपी विरोधी राजनीतिक दलों ने लालू यादव की जगह उन्हें सहजता के साथ स्वीकार भी कर लिया.

लेकिन लालू यादव और नीतीश कुमार दोनों को एकसाथ साधने की कोशिश में तेजस्वी यादव फंस गए. वो न तो पूरी तरह से लालू यादव बन पाए और ना ही नीतीश कुमार . 29 साल के तेजस्वी अपने पिता से अलग छवि बनाने की कोशिश करते तो दिखे लेकिन लालू यादव की राजनीति से अलग लाइन लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाए. बिहार के सीएम नीतीश कुमार को अपना राजनीतिक गुरु मानने और उन्हीं की राजनीति को फॉलो करने का दावा करनेवाले तेजस्वी यादव आगे चलकर नीतीश कुमार पर ही निशाना साधने लगे.

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लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद तेजस्वी यादव जिस तरह से सीन से पूरी तरह गायब हुए हैं, उनके राजनीतिक अनुभव और समझदारी को लेकर सवाल उठने लगा है. सवाल विरोधी कम महागठबंधन के नेता ज्यादा उठा रहे हैं.अब ये सवाल भी उठने लगा है कि कहीं तेजस्वी  एक साथ दो ध्रुवों की राजनीति को साधने के चक्कर में फंस तो नहीं गए.सवाल ये भी कि क्या पिता के प्रभाव और नीतीश को फॉलो करने में चक्कर में तेजस्वी यादव अपने लिए कोई अलग राह नहीं बना पाए.  युवा और तेजतर्रार तेजस्वी अपने पिता और चाचा नीतीश को एक साथ साधने के चक्कर में कहीं उलझ कर तो नहीं रह गए ?तेजस्वी यादव अपने पिता के अंदाज में ही लोगों के साथ जुड़ने की कोशिश करते तो दिखे लेकिन वो लालू यादव वाला फील नहीं दे पाए.वैसे भी लालू यादव कोई एक दिन में तो बन नहीं सकता फिर तेजस्वी के लिए लालू यादव इतने कम समय में बन पाना कहाँ से संभव था.

तेजस्वी यादव ने बकौल बिहार सरकार के पथ निर्माण मंत्री नीतीश कुमार के विकास पुरुष की छवि बनाने की कोशिश करते दिखे. उन्होंने बतौर मंत्री बहुत ही बेहतर परफॉर्म भी किया . वर्ष 2016 में दीघा-सोनपुर पुल को जोड़ने वाली सड़क निर्माण को समय सीमा में पूरा करवाकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि कम उम्र और कम अनुभव के वावजूद वो बहुत कुछ कर सकते हैं.अगर नीतीश कुमार के साथ और कुछ दिनों तक काम करने का मौका मिलता तो तेजस्वी अपनी अलग छवि बना सकते थे. ये सन्देश दे सकते थे कि नीतीश कुमार जैसा ही वो बिहार को आगे बढ़ा सकते हैं.लेकिन नीतीश कुमार के अलग हो जाने के बाद उनकी राजनीतिक शैली में जो अचानक बदलाव हुआ और जिस तरह से उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु नीतीश कुमार को ही टारगेट करना शुरू कर दिया,उसका नुकसान उन्हें उठाना पड़ा.

दरअसल लालू यादव की अनुपस्थिति में तेजस्वी स्वयं में आरजेडी की छवि थे और लोग आरजेडी में बदलाव की उम्मीद कर रहे थे. लेकिन तेजस्वी ने जब सवर्ण आरक्षण का विरोध किया तो वह 1990 के दशक वाली राजनीति की ओर मुड़ते दिखे. हालांकि उनकी इस राजनीति का विरोध महागठबंधन में भी हुआ और उनकी पार्टी में भी.आरजेडी के उपाध्यक्ष और सीनियर नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने सवर्ण आरक्षण पर आरजेडी का वह घोषणा पत्र सामने ले आए, जिसमें पार्टी ने इसका समर्थन किया था. वहीं महागठबंधन में शामिल कांग्रेस, हम और आरएलएसपी ने सवर्ण आरक्षण का समर्थन कर दिया. जाहिर है लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा हुई और तेजस्वी की लालू के दौर की राजनीतिक चाल में सब घालमेल हो गया.

नीतीश की छवि जहां गुड गवर्नेंस और सर्वसमाज को लेकर चलने की है, वहीं लालू यादव माय समीकरण के साथ पिछड़ों की राजनीति करने के लिए जाने जाते हैं. हालांकि बाद के दौर में उन्होंने गैर यादव पिछड़ी जातियों का विश्वास खो दिया था, और उनकी पूरी राजनीति मुस्लिम-यादव के इर्द-गिर्द रह गई थी. थोड़ा लालू और थोड़ा नीतीश जैसा बनने की चाह में तेजस्वी यादव न तो लालू यादव बन पाए और ना ही नीतीश कुमार . वह न तो लालू को छोड़ पाए और न ही लालू को पूरी तरह साध पाए. नीतीश कुमार और लालू यादव को  एक साथ साधने के चक्कर में तेजस्वी अपनी खुद की अलग पहचान नहीं बना पाए.

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