By, Shrikant Pratyush
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तेजस्वी यादव के गायब रहने की असली वजह क्या है, कबतक होगें सक्रीय?

लालू यादव की आरजेडी को कहां ले जाएंगे तेजस्वी?- नज़रिया

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जिस तरह से  तेजस्वी यादव लोक सभा चुनाव के बाद से लगातार एक महीने तक राजनीतिक परिदृश्य से गायब रहे और अब पटना पहुँचने के वावजूद सदन में नजर नहीं आ रहे, उनके नेत्रित्व को लेकर सवाल उठने लगे हैं.

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तेजस्वी यादव के गायब रहने की असली वजह क्या है, कबतक होगें सक्रीय?

सिटी पोस्ट लाइव : जिस तरह से  तेजस्वी यादव लोक सभा चुनाव के बाद से लगातार एक महीने तक राजनीतिक परिदृश्य से गायब रहे और अब पटना पहुँचने के वावजूद सदन में नजर नहीं आ रहे, उनके नेत्रित्व को लेकर सवाल उठने लगे हैं. इसमे शक की कोई गुंजाइश नहीं कि लालू यादव के बाद तेजस्वी यादव ने पार्टी की कमान बखूबी संभाली थी. ये दिखा था कि लालू यादव की राजनीतिक विरासत को वो आगे बढ़ाएगें. लेकिन लोक सभा चुनाव के बाद अचानक उनकी निष्क्रियता से पार्टी लड़खड़ाती नजर आ रही है.

पार्टी के जिन नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने उन्हें लालू यादव की राजनीतिक विरासत संभालने में सक्षम मान कर अपना नेता क़बूला था, वो निराश हैं और परेशान हैं. महागठबंधन के सहयोगी दल जिन्होंने तेजस्वी को अपना नेता माना था अब असहज मह्सुश करने लगे हैं. तेजस्वी यादव के नेत्रित्व पर जीतन राम मांझी तो सवाल उठा ही चुके हैं उपेन्द्र कुशवाहा और मुकेश सहनी भी परेशान हैं.आरजेडी का यह युवा हीरो लोकसभा चुनाव में अगर मोदी लहर में बह गया तो कोई बात नहीं लेकिन इस तरह से हार के बाद अचानक सियासी परिदृश्य से खुद को ओझल कर लेगा, ऐसा किसी ने  सोचा भी नहीं था. तेजस्वी यादव का  इस तरह रहस्यपूर्ण तरीक़े से महीना भर अज्ञातवास पर रहना, पटना वापस लौटने के बाद बीमारी का बहाना बनाना और पटना में मौजूद रहते हुए भी सदन से अनुपस्थित रहना उनकी नेतृत्व-क्षमता पर कई सवालों को जन्म देता है.

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इस ग़ैरमौजूदगी को ‘रहस्यपूर्ण’ इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि महीना बीत जाने के बाद अब उन्होंने ट्वीट कर के यह ख़ुलासा किया है कि लिगामेंट में चोट का वह इलाज़ करा रहे थे. ताज्जुब है कि इतनी-सी बात को इतने लंबे समय तक उन्होंने सब से छिपाया और फिर भी यह नहीं बताया कि दरअसल वो अभी भी हैं कहाँ या अबतक थे कहाँ! समर्थक और विरोधी दोनों सवाल उठा रहे हैं कि उनकी इस ‘मामूली बीमारी’ का इलाज़ तो पटना में भी हो सकता था.

आरजेडी के प्राय: सभी छोटे-बड़े नेता बार-बार पूछे जा रहे इस सवाल से परेशान रहे हैं कि तेजस्वी कहाँ हैं और अब परेशान इस सवाल से हैं कि पटना में मौजूद होने के बाद सदन में क्यों नजर नहीं आ रहे.?किसी के पास कोई जबाब नहीं है. सभी अपने अपने हिसाब से जबाब दे रहे हैं. रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा था कि हो सकता है क्रिकेट में रुचि के कारण तेजस्वी वर्ल्ड कप मैच देखने लंदन गए हों. राबडी देबी ने कहा कि वो जहाँ भी हैं कुछ ख़ास काम कर रहे हैं.

सवाल इसलिए भी ज्यादा मौंजू हो जाता है क्योंकि जानलेवा दिमाग़ी बुख़ार से मर रहे बच्चों को ले कर शोकाकुल बिहार में हाहाकार मचा हुआ है.लेकिन  राज्य के प्रतिपक्ष का नेता कहीं नज़र नहीं आ रहे हैं.बच्चों की मौत पर राज्य की नीतीश सरकार ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी की केंद्र सरकार भी जिस समय गंभीर सवालों/आलोचनाओं से घिरी थी, उस समय यहाँ का नेता-प्रतिपक्ष अपना दायित्व और ज़रूरी भूमिका निभाने से क्यों चूका?

अब जब तेजस्वी एक महीने बाद पटना लौट गए हैं लेकिन फिर भी सदन में नहीं आ रहे हैं तो अटकलों का बाज़ार गर्म हो गया है. उनके समर्थक और विरोधी दोनों इसकी वजह पारिवारिक कलह मान रहे हैं. सब यहीं ताकल लगा रहे हैं कि तेजप्रताप यादव से तेजस्वी परेशान हैं और उन्हें अब ठिकाने लगाना चाहते हैं. ये खबर भी हवा में है कि तेजस्वी यादव ने फिर से सक्रीय होने के लिए लालू यादव के सामने एक बड़ी शर्त रख दी है. शर्त ये है कि अनुशासनहीनता के आरोप में तेजप्रताप यादव को आगामी विधान सभा चुनाव तक पार्टी से निष्काषित किया जाए. तेजस्वी यादव ने ऐसी कोई शर्त लालू यादव के सामने राखी है या नहीं, कोई नहीं जानता, लालू यादव और तेजस्वी यादव ही सच बता सकते हैं लेकिन सत्तापक्ष के नेता इस अटकल को खबर बना रहे हैं.

सत्ता पक्ष के इस दावे में कितना दम है ,पता नहीं लेकिन आरजेडी के नेताओं के पास भी इस सवाल का कोई जबाब नहीं है कि तेजस्वी यादव सदन से गायब क्यों हैं? इस सवाल से आरजेडी नेता बचने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं.अफवाहें चाहें जो भी उड़े, अटकलें चाहें जो भी लगाईं जाएँ ,सच्चाई तो तेजस्वी यादव ही बता पायेगें कि उनके राजनीतिक निष्क्रियता की असली वजह क्या है.अगर उनके गायब होने की वजह अगर बीमारी ही है तो चिंता की कोई बात नहीं लेकिन अगर इसकी वजह पारिवारिक कलह है तो आरजेडी नेताओं की चिंता वाजिब है. पारिवारिक कलह की वजह से पार्टी सफ़र करे तो यह तेजस्वी यादव राजनीतिक अपरिपक्वता ही कही जायेगी.

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