By, Shrikant Pratyush
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बिहार में नीतीश कुमार और मोदी में कौन है एक दूसरे का बड़ा मददगार

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चेहरे  को लेकर महागठबंधन और एनडीए (NDA) दोनों के भीतर घमाशन मचा हुआ है. महागठबंधन के नेताओं को तेजस्वी यादव का फेस पसंद नहीं तो बीजेपी को नीतीश कुमार के चहरे से ज्यादा नरेन्द्र मोदी के चहरे पर ज्यादा भरोसा है.

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बिहार में नीतीश कुमार और मोदी में कौन है एक दूसरे का बड़ा मददगार

सिटी पोस्ट लाइव : चेहरे  को लेकर महागठबंधन और एनडीए (NDA) दोनों के भीतर घमाशन मचा हुआ है. महागठबंधन के नेताओं को तेजस्वी यादव का फेस पसंद नहीं तो बीजेपी को नीतीश कुमार के चहरे से ज्यादा नरेन्द्र मोदी के चहरे पर ज्यादा भरोसा है. आगामी विधानसभा चुनाव में एनडीए का चेहरा सीएम नीतीश (CM Nitish) रहेंगे या पीएम नरेंद्र मोदी (PM Nrendra Modi) इसको लेकर घमशान जारी है.

बीजेपी को लगता है कि जैसे देश भर में मोदी के नाम पर लोक सभा चुनाव में वोट मिला उसी तरह से विधान सभा चुनाव में भी उन्हीं का चेहरा कमाल दिखाएगा. जहाँ तक जेडीयू का सवाल है, भले वह बीजेपी के साथ है लेकिन नरेन्द्र मोदी का चेहरा उसे शुरू से नापसंद है.लेकिन हकीकत क्या है. किसका चेहरा NDA का चेहरा चमका पायेगा नरेन्द्र मोदी का या फिर नीतीश कुमार का?  ऐसे तो बता पाना मुश्किल है.

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अगर सच्चाई जानने के लिए लोक सभा और विधान सभा के  वोटिंग पैटर्न और इससे संबंधित आंकड़ों पर गौर फरमाया जाए तो एक हदतक अंदाजा मिल जाता है कि बिहार के चुनाव में किसका चेहरा कितना करिश्मा दिखा पायेगा.वर्ष 2005 के फरवरी और अक्टूबर विधानसभा चुनाव जेडीयू और बीजेपी ने साथ लड़ा था. फरवरी में हुए चुनाव में जेडीयू ने 138 सीटों पर चुनाव लड़ा और उसके खाते में 14.6 प्रतिशत वोट आए और 55 सीटें जीतीं. वहीं बीजेपी  103 सीटों पर चुनाव लड़ी. 11 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 37 सीटें जीतने में कामयाब रही. अक्टूबर 2005 में जेडीयू ने फिर 138 सीटों पर चुनाव लड़ा और इस बार वोट उसका प्रतिशत बढ़कर 20.5 प्रतिशत हो गया, जबकि बीजेपी 15.6 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल नहीं कर पाई.

वर्ष 2010 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू 141 सीटों पर चुनाव लड़ा और 22.6 प्रतिशत वोट के साथ 115 सीटें जीतने में कामयाब रहा. इस बार बीजेपी  102 सीटों पर ही चुनाव लड़ी और 16.5 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 91 सीटें जीतने में कामयाब हो गई.वर्ष 2015 का चुनाव बीजेपी और जेडीयू ने अलग-अलग लड़ा. जेडीयू आरजेडी के साथ हो गई. लेकिन, यहां उनके लिए वोट प्रतिशत के साथ ही सीटों का भी जबरदस्त नुकसान हुआ. 101 सीटों पर ही चुनाव लड़ी और 22.6 प्रतिशत वोट शेयर से घटकर  16.8 प्रतिशत वोट पर जा पहुंचा. सीटों की संख्या भी 115 से घटकर महज 71 रह गई.

बीजेपी 157 सीटों पर चुनाव लड़ी और 24.4 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 53 सीटों पर जीत हासिल करने में सफल रही.साफ है कि बीजेपी का वोट प्रतिशत 16.5 प्रतिशत से बढ़कर 24.4 प्रतिशत तक पहुंच गया. लोकसभा चुनाव बीजेपी-जेडीयू ने 2009 में साथ लड़ा. जेडीयू ने 25 सीटों पर चुनाव लड़ी और 24 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 20 सीटें जीतने में कामयाब रही. वहीं बीजेपी ने 15 सीटों पर लड़ाई लड़ी और 13.9 प्रतिशत वोट पाकर 12 सीट जीतने में सफल रही.वर्ष 2014 में बीजेपी-जेडीयू ने अलग-अलग चुनाव लड़ा तो जेडीयू को यहां नुकसान हुआ और 31 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद 15.8 प्रतिशत वोट शेयर के साथ महज 2 सीटें ही जीत सकी. जबकि बीजेपी ने इस चुनाव में 29 सीटों पर चुनाव लड़कर 29.9 वोट शेयर अपने खाते में ले गई.

2019 के लोकसभा चुनाव में ये दोनों ही पार्टियां एक बार फिर साथ आ गईं. यहां दोनों ने 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ा और साथ आने का सीधा लाभ जेडीयू को मिला. जेडीयू का वोट शेयर पिछले चुनाव के 15.8 प्रतिशत वोट शेयर के मुकाबले बढ़कर 21.8 प्रतिशतहो गया.पिछले चुनाव में दो की जगह इसबार उसे 16 सीटें जीतने में कामयाबी मिली. बीजेपी का वोट प्रतिशत 29.9 प्रतिशत से घटकर 23.6 रह गया. बावजूद इसके वह 17 में से 17 सीटें जीतने में कामयाब रही.

इन आंकड़ों से तो ये बात साफ़ है कि कि जब-जब बीजेपी और जेडीयू ने साथ मिल कर चुनाव लड़ा जेडीयू के वोट प्रतिशत में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई.  दोनों अलग-अलग लादे तो जेडीयू के वो प्रतिशत में गिरावट आई और बीजेपी का वोट प्रतिशत बढ़ गया.जाहिर है इसी गणित के आधार पर अब बीजेपी जेडीयू को ये अहसास कराना चाहती है कि उसके साथ रहने में ज्यादा फायदा जेडीयू का है.और इसबार बीजेपी पूर्वोत्तर के राज्य उत्तर प्रदेश और झारखण्ड में अपनी सरकार बनाने के बाद बिहार में भी अपनी सरकार किसी कीमत पर चाहती है.

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