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JP की तरह विपक्ष को गोलबंद कर पायेगें नीतीश कुमार?

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सिटी पोस्ट लाइव :नीतीश कुमार लगातार विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं से मिलकर उन्हें भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए तैयार कर रहे हैं.दिल्ली दौरा के दौरान नीतीश कुमार ने कांग्रेस नेताओं के साथ साथ CPI नेता सीताराम येचुरी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से मुलाकात की. नीतीश कुमार बार-बार दूसरे राज्यों के विपक्षी दलों को भी साथ आने का आग्रह कर रहे हैं. लेकिन हर दल किसी न किसी बिंदू पर बिदक जा रहे हैं. ऐसे में इस विपक्षी एकता में कई ऐसे रोड़े हैं जो नीतीश कुमार के लिए बाधक बन सकते हैं.

नीतीश कुमार की पार्टी JDU, लालू यादव की पार्टी RJD के अलावा शिवसेना (उद्धव गुट) कांग्रेस के साथ है. तमिलनाडु की DMK और झारखंड में सत्ताधारी (JMM) झारखंड मुक्ति मोर्चा भी कांग्रेस के सहयोगी हैं. जम्मू कश्मीर के फारूख अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस, महबूबा मुफ्ती की पीडीपी और कमल हसन की मक्कल नीधि मय्यम (एमएनएम) भी विपक्षी एकता के साथ है. इनके अलावा दलित पैंथर्स, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी), फॉर्वर्ड ब्लॉक और सीपीआई भी विपक्षी एकता के साथ बिना शर्तों के शामिल हो सकते हैं.

ये सभी दल BJP के खिलाफ चुनाव लड़ने में दिलचस्पी रख रहे हैं. BJP को सत्ता से हटाने के लिए वह अपने आप को अपने क्षेत्र में मजबूत भी कर रहे हैं. इसलिए विपक्षी एकता के फॉर्मूले को यह सहर्ष स्वीकार कर रहे हैं. अपने-अपने क्षेत्र में छोटे स्तर पर ही सही, लेकिन यह पार्टियां काफी मजबूत हैं. कहीं ना कहीं यह सभी BJP के खिलाफ चुनाव लड़कर हारी हुई पार्टियां हैं या फिर लगातार BJP के साथ संघर्ष कर रही हैं. ऐसे में यह सारी पार्टियां विपक्षी एकता को मजबूत करने में बिना शर्त नीतीश कुमार के साथ आ सकती हैं.

2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा की तैयारियां पहले ही शुरू हो चुकी है, लेकिन भावी रणनीति विपक्ष की स्थिति पर निर्भर करेगी. भाजपा रणनीतिकारों का मानना है कि इसमें सबसे अहम भूमिका क्षेत्रीय दलों की होगी, जिनके साथ BJP भी संपर्क बनाए हुए है. विपक्षी एकता को एक बड़ा खतरा भाजपा का छोटे-छोटे दलों और उनके नेताओं को अपने पाले में किया जाना है. बिहार में ही BJP ने चिराग पासवान को साथ मिलाकर रखा है. उपेंद्र कुशवाहा को पिछले दिनों अपने पाले में लाने में कामयाबी हासिल की है. मुकेश सहनी पर भी भाजपा की विशेष निगाह बनी हुई है. नॉर्थ ईस्ट के राज्यों के स्थानीय दलों और नेताओं को भी अपने पाले में हाल के दिनों में किया है. ये छोटे-छोटे दल और नेता भाजपा के वोट प्रतिशत को बढ़ा सकते हैं. ऐसे में छोटे दल विपक्षी एकता को बड़ा झटका दे सकते हैं.

नीतीश कुमार के लिए उनकी पिछली राजनीति में लिए गए कुछ निर्णय विपक्षी एकता में सबसे बड़ी बाधा बन सकते हैं. दरअसल, नीतीश कुमार ने 2013 से लेकर अब तक दो बार BJP से समझौता किया है और दो बार RJD से। ऐसे में नीतीश कुमार की यह प्रवृत्ति कि वह सत्ता के लिए अपना पाला बदल सकते हैं. इस वजह से जो विपक्षी पार्टियां हैं वह नीतीश के पिछले निर्णय के ऊपर अपना विचार कर सकती है. नीतीश कुमार को यह विश्वास दिलाने में मुश्किल होगी कि वह अब तटस्थ रहेंगे.

BJP के खिलाफ सभी विपक्षी पार्टियां चुनाव तो लड़ना चाहती है, लेकिन इन सबकी अपनी-अपनी महत्त्वाकांक्षा है. विपक्षी एकता के बारे में सभी विपक्षी दलों की राय एक ही है, लेकिन जब बात इस विपक्ष के नेतृत्व करने वाले की आती है तो तमाम दलों में अनबन की झलक दिख ही जाती है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विपक्ष एक चेहरे पर सहमति बना पाएगी?दरअसल, हर पार्टी की अपनी सियासी ख्वाहिशें है. JDU नीतीश कुमार को पीएम उम्मीदवार बताती है. टीएमसी चाहती है कि ममता बनर्जी विपक्ष की कमान संभाले और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल की विपक्ष के नेतृत्व की चाहत किसी से छिपी नहीं है.

कांग्रेस पार्टी ने नीतीश कुमार को भारत में विपक्षी एकता को एकजुट करने के लिए अधिकृत किया है, लेकिन विपक्षी दलों को एकजुट करना नीतीश कुमार के लिए कठिन काम होगा.आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उड़ीसा, तमिलनाडु, बंगाल, दिल्ली, पंजाब इन सब जगहों पर कांग्रेस की सीधी लड़ाई BJP से है. इन राज्यों में 200 प्लस सीट आती है. इन सीटों पर कांग्रेस को झुकना पड़ेगा. कांग्रेस कहां तक झुकती है? इन सीटों पर डायरेक्ट फाइट होती है और इन क्षेत्रों में क्षेत्रीय दलों को यदि कांग्रेस अपने पक्ष में लाती है तो, कांग्रेस को झुकना पड़ेगा. इन 200 सीटों पर समझौता करना पड़ेगा, जो अब तक कांग्रेस ने नहीं किया है. इस मामले में नीतीश कुमार के लिए कठिन चुनौती है.

दिल्ली और पंजाब में केजरीवाल की सरकार है. पंजाब में कांग्रेस की सीधी लड़ाई भाजपा से होती है. अब वहां केजरीवाल भी आ गए हैं तो केजरीवाल को कितनी सीटें दी जाए और कांग्रेस को कितनी सीटें दी जाए? इसी प्रकार तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, तमिलनाडु, बंगाल भी है. बंगाल की CM ममता बनर्जी को शामिल करना बड़ा कठिन काम है.देश में कुछ ऐसी पार्टियां और नेता हैं जो ना तो विपक्ष की तरफ हैं और ना ही भाजपा की तरफ। वह साइलेंट मोड पर हैं. अभी तक अपना कोई स्टैंड क्लियर नहीं किया. NCP प्रमुख शरद पवार की बात करें तो कभी वह कांग्रेस के पक्ष में जाते नजर आते हैं तो कभी भाजपा के पक्ष में बोलते नजर आते हैं. UP की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने भी अपना दांव नहीं खोला है. उन्होंने ना तो पक्ष में जाने की सहमति दी है और ना ही विपक्ष में रहने की सहमति दी है.

मायावती को विपक्षी एकता में शामिल कराना काफी कठिन लगता है. मायावती दबाव में हैं. उन पर कई केस मुकदमा चल रहा है. कहीं उन्हें लालू प्रसाद यादव की तरह जेल भेज दिया जाए! इसलिए मायावती पूरी तरह से साइलेंट मोड पर हैं. उसी तरह महाराष्ट्र में शरद पवार हैं.शरद पवार को विपक्षी एकता में लाना कठिन काम होगा. उन पर कई मामले चल रहे हैं. उनको डर है कि कहीं CBI के माध्यम से उन्हें जेल ना भेज दिया जाए. ऐसे में नीतीश कुमार के सामने कई चुनौतियां हैं. नीतीश कुमार के लिए यह कहा जा सकता है कि वह एक बेदाग छवि के नेता हैं. 40 वर्षों की राजनीति में अब तक इन पर कोई दाग नहीं है. कोई मुकदमा नहीं है. कोई भ्रष्टाचार का मामला नहीं है. यह इनके लिए एक सकारात्मक पक्ष होगा.

हाल के दिनों में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी के साथ मिलकर एक नई गठबंधन की घोषणा की. इसमें नीतीश कुमार कहीं नहीं दिखे. ना ही कोई चर्चा हुई.अगर बात साउथ की करें तो तेलंगाना के सीएम केसीआर भी शायद विपक्ष के साथ दिखें. समय-समय पर वो अपनी राजनीतिक शक्ति का प्रदर्शन भी करते हैं.तमिलनाडु के CM एमके स्टालिन विपक्ष के साथ तो हैं, लेकिन अभी वो खुलकर कुछ नहीं बोल रहे हैं. अपने जन्मदिन के मौके पर उन्होंने बड़ी पार्टी का आयोजन किया था, लेकिन इसमें नीतीश कुमार नहीं दिखे. हालांकि डिप्टी CM तेजस्वी यादव जरूर पहुंचे थे.

आंध्र प्रदेश के पूर्व सीएम चंद्रबाबू नायडू भी अपना पत्ता नहीं खोल रहे हैंआंध्र प्रदेश के सीएम जगनमोहन रेड्‌डी भी विपक्ष के साथ नहीं है. वो खुलकर तो कुछ नहीं बोले रहे हैं, लेकिन बीजेपी और पीएम मोदी के लिए सॉफ्ट जरूर दिखते हैं.यूपी के सीएम अखिलेश यादव की भी राह अलग है. वो भी नीतीश कुमार के नाम पर एग्री नहीं दिख रहे हैं. ऐसे में नीतीश कुमार कैसे विपक्ष को एक कर पाएंगे? यह बड़ा सवाल है. जानकार बताते हैं कि विपक्ष के पास ना कोई विजन है और ना कोई रणनीति। पीएम मोदी और BJP से लड़ाई में ये कहीं हैं ही नहीं.

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