By, Shrikant Pratyush
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नरेन्द्र मोदी के विजय रथ को रोक पायेगें क्षेत्रीय दल?

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आर्थिक सुस्ती की मार के असर की वजह से राष्ट्रवाद का मुद्दा थोड़ा पीछे चला गया. हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों जगहों पर बीजेपी के विजय पथ में रोड़े अटकाती दिखी है देश की डावांडोल अर्थ-व्यवस्था.इस चुनाव में वैश्विक मंदी का असर और देश में आर्थिक कुप्रंधबन दोनों का असर दिखा है.सबके जेहन में है सबसे बड़ा सवाल-नरेन्द्र मोदी के विजय रथ को रोक पायेगें क्षेत्रीय दल?

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नरेन्द्र मोदी के विजय रथ को रोक पायेगें क्षेत्रीय दल?

सिटी पोस्ट लाइव: इस महीने संपन्न हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों से ये संकेत मिलने लगे हैं कि क्षेत्रीय दलों को ख़त्म कर देने की बीजेपी की योजना बहुत आसान नहीं है.महाराष्ट्र में शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और महज 11 महीने पहले बनी दुष्यंत चौटाला की अगुवाई वाली जननायक जनता पार्टी ने जिस तरह का उम्दा प्रदर्शन किया है, उससे तो यहीं लगता है कि क्षेत्रीय दल नरेन्द्र मोदी के विजय रथ को रोक सकते हैं.

लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी को जैसा प्रचंड बहुमत मिला था, उन्हें वैसी ही अपेक्षाएं इन दोनों राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी थीं.लेकिन इन चुनावों में क्षेत्रीय पार्टियों के प्रदर्शन से ये संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में क्षेत्रीय दल नरेंद्र मोदी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकते हैं.जहां जहां बीजेपी की ज़मीन कमज़ोर है, वहां क्षेत्रीय पार्टियां ही उसका फायदा उठाकर चुनौती पेश करती हैं.जहां कांग्रेस कमज़ोर पड़ गई है वहां बीजेपी को टक्कर देने के लिए क्षेत्रीय पार्टियां ही उभर कर सामने आयेगीं क्योंकि राजनीति में बहुत दिनों तक वैक्यूम नहीं रहता है.

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महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव परिणाम में क्षेत्रीय दलों के बेहतर प्रदर्शन करने के बाद भी कुछ ऐसे लोग हैं जो नहीं मानते कि आनेवाले दिनों में क्षेत्रीय दल मोदी के प्रभुत्व को रोकने में सफल हो सकते हैं. उनका मानना है कि क्षेत्रीय पार्टियों का वर्चस्व राज्यों के चुनाव तक ही सीमित रहा है. मोदी राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं. ऐसे में राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों से बीजेपी को समझौता करना पद सकता है लेकिन केन्द्र की राजनीति में क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा कायम नहीं हो सकता.

मौजूदा राजनीतिक माहौल में मोदी से मुक़ाबला करने के लिए क्षेत्रीय दल कितना एकजुट होगें कह पाना मुश्किल है क्योंकि सबके अपने अपने हित हैं. दिल्ली और झारखंड में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं.अगले साल बिहार में चुनाव होंगे. ​नज़रें ​बिहार की ओर लगी है. बिहार में किस तरह के समीकरण उभर कर सामने आते हैं ,वो काफी मायने रखेगें.हो सकता है बीजेपी के साथ नीतीश कुमार का गठबंधन टूट जाए और वो महागठबंधन के साथ खड़े हो जाएँ.ऐसे में दुसरे राज्यों के क्षेत्रीय दलों पर भी असर पड़ेगा.जिस तरह से  क्षेत्रीय दल कांग्रेस नेता इंदिरा गांधी को चुनौती देने के लिए साथ आ गए थे, मोदी से मुक़ाबले के लिए भी एकजुट हो सकते हैं.

उस समय क्षेत्रीय पार्टियां इंदिरा को चुनौती दे रही थीं. और आज कांग्रेस अपने पैर पर खादी होने के लिए क्षेत्रीय दलों की तरफ देख रही है. हालांकि, यह आसान काम नहीं होगा क्योंकि नीतीश कुमार और आरजेडी के रिश्ते में बहुत खटास आ चुकी है. मायावती अखिलेश एक दुसरे के साथ आने को तैयार नहीं हैं.ममता बनर्जी किसी और को नेता मानेगीं नहीं. और कई जगहों पर कांग्रेस ही क्षेत्रीय पार्टियों की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी है.

मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी से मुक़ाबले के लिए क्या भविष्य में क्षेत्रीय दल साथ आ सकते हैं.अगर झारखंड में झामुमो या झाविमो जैसी क्षे​त्रीय पार्टियां मिल कर बीजेपी को चुनाव हरा देती हैं, बिहार में नीतीश कुमार आरजेडी के साथ आ जाते हैं और मायावती अखिलेश का फिर से गठबंधन हो जाता है तो  तीसरे मोर्चा का विकल्प ज़्यादा मजबूत बन सकता है.लेकिन यह दूर की कौड़ी दिख रही है. क्योंकि मायावती और अखिलेश का नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव का एक साथ आना नामुमकिन लगता है.

लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी को महाराष्ट्र और हरियाणा में अच्छी सफलता हासिल हुई थी. लिहाजा इन विधानसभा चुनावों में ऐसा लगा रहा था कि मोदी का जादू एक बार फिर चलेगा और बीजेपी दोनों राज्यों में प्रचंड जीत हासिल करेगी लेकिन ऐसा नहीं हो सका.दरअसल, आर्थिक सुस्ती की मार के असर की वजह से राष्ट्रवाद का मुद्दा थोड़ा पीछे चला गया. हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों जगहों पर बीजेपी के विजय पथ में रोड़े अटकाती दिखी है देश की डावांडोल अर्थ-व्यवस्था.इस चुनाव में वैश्विक मंदी का असर और देश में आर्थिक कुप्रंधबन दोनों का असर दिखा है.

इन दोनों राज्यों के चुनाव में बीजेपी भले ही सबसे बड़ी पार्टी बनी हो लेकिन उसे अपेक्षित परिणाम नहीं मिले. ऐसे में लगता है कि बीजेपी की रणनीति में कुछ चूक रही. तो क्या बीजेपी भविष्य में अपनी रणनीति बदलेगी.आने वाले समय में राज्य के चुनाव में राज्यों का मुद्दा और बढ़ चढ़ कर सामने आएगा. बिहार के पांच विधान सभा सीटों के उप-चुनाव में स्थानीय मुद्दों की वजह से ही एनडीए को मात कहानी पडी है.

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