By, Shrikant Pratyush
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बिहार में हिंदू भी धूमधाम से मनाते हैं मुहर्रम, 100 साल से चली आ रही परंपरा

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लगभग 100 सालों से भी अधिक समय से यह परंपरा बदस्तूर जारी है. ग्रामीण कहते हैं कि यह परंपरा आगे भी जारी रखेंगे. सप्तमी के दिन यहां उत्‍सव का माहौल होता है. फिर निशान खड़ा किया जाता है, उसके बाद फातिहा पढ़ने के साथ चार दिनों तक पूजा करते हुए ताजिया निशान को गांव में घुमाया जाता है. गांव के लोगों का कहना है कि पूर्वजों द्वारा किए गए वादे को निभाते हुए मुहर्रम मनाने से इस गांव में सुख, शांति और समृद्धि है.

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बिहार में हिंदू भी धूमधाम से मनाते हैं मुहर्रम, 100 साल से चली आ रही परंपरा

सिटी पोस्ट लाइव : आज की तारीख में जब पूरी दुनिया में पैन इस्लामिज्म की बात की जा रही है, बिहार में हिन्दू समाज मुहर्रम (Muharram) का त्यौहार मनाकर साम्प्रदायिक सद्भाव का मिसाल कायम कर रहा है. हिंदू समुदाय के लोग मुहर्रम मनाते हैं और झरनी गाते हैं. मजार पर चादरपोशी भी करते हैं. हिंदु बहुल महमदिया हरिपुर (Mahmadia Haripur) गांव की महिलाएं भी इसमें शामिल होती हैं. हिन्दुओं का गावं होने के वावजूद का त्योहार मनाने की वजह से बिहार का यह महमदिया हरिपुर गावं देश दुनिया के लिए एक मिसाल बन गया है.

बिहार के कटिहार जिले के इस गांव में हिंदू मनाते हैं मुहर्रम, 100 साल से निभा रहे पूर्वजों का किया वादाबिहार के कटिहार जिले के एक गांव महमदिया हरिपुर में हिंदू सजाते मुहर्रम का अखाड़ा.यह परंपरा यहाँ  सौ वर्षों से चली आ रही है.हसनगंज प्रखंड (Hasanganj Block) के जगरनाथपुर पंचायत का हरिपुर गांव साम्प्रदायिक सौहार्द (Communal Harmony) की अनूठी मिसाल पेश कर रहा है.

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अपने पूर्वजों द्वारा किए गए वादे को निभाने के लिए आज भी हसनगंज के महमदिया हरिपुर में हिंदू समुदाय (Hindu Community) के लोग मुहर्रम (Muharram ) मनाते हैं. इसको लेकर करीब 1200 की हिंदू आबादी वाला यह गांव आज भी सुर्खियों में है.बताया जाता है कि इस गांव का हिंदू समुदाय सौ वर्षों से भी अधिक समय से नियम और निष्ठा के साथ मुहर्रम मनाते आ रहे हैं. मुहर्रम को लेकर सभी रीति और परंपराओं का भी बखूबी पालन किया जाता है.

इमाम हुसैन का जयकारा और निशान खड़ा करने के साथ फातिहा भी पढ़ा जाता है. इस दौरान हिंदू समुदाय के लोग झरनी गाते हैं और मजार पर चादरपोशी भी करते हैं. सबसे खास कि मुहर्रम में बड़ी संख्या में हिंदू महिलाएं भी शामिल होती हैं. बता दें कि महमदिया हरिपुर गांव में स्थित स्व. छेदी साह का मजार है. इस गांव में तकरीबन सौ वर्षों से मुहर्रम मनाने की परंपरा चली आ रही है.

ग्रामीणों के अनुसार वकील मियां नाम के शख्‍स इस गांव में रहते थे. उनके पुत्र की किसी बीमारी से मौत हो गई थी. इससे दुखी होकर उन्होंने गांव ही छोड़ दिया, जाते वक्त उन्होंने छेदी साह को इस वादे के साथ अपनी जमीन दे दी थी कि उनके चले जाने के बाद भी ग्रामीण मुहर्रम मनाते रहेंगे. मनोज की मानें तो पूर्वजों द्वारा किए गए इस वादे को निभाने के लिए हिंदू समुदाय के लोग मुहर्रम मनाते आ रहे हैं.

लगभग 100 सालों से भी अधिक समय से यह परंपरा बदस्तूर जारी है. ग्रामीण कहते हैं कि यह परंपरा आगे भी जारी रखेंगे. सप्तमी के दिन यहां उत्‍सव का माहौल होता है. फिर निशान खड़ा किया जाता है, उसके बाद फातिहा पढ़ने के साथ चार दिनों तक पूजा करते हुए ताजिया निशान को गांव में घुमाया जाता है. गांव के लोगों का कहना है कि पूर्वजों द्वारा किए गए वादे को निभाते हुए मुहर्रम मनाने से इस गांव में सुख, शांति और समृद्धि है.

गौरतलब है कि करीब 1200 आबादी वाले हिन्‍दू बहुल गांव और इसके आसपास कई किलोमीटर तक कोई भी मुस्लिम परिवार नहीं है, लेकिन पूर्वजों द्वारा किया गए वादे को निभाते हुए मुहर्रम मनाने की यह परंपरा आज भी जारी है. अगर इस गावं का मुहर्रम देश दुनिया की नजर में आ जाए तो एक झटके में देश में साम्प्रदायिक सद्भाव स्थापित हो जाएगा.

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