By, Shrikant Pratyush
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तख्त श्री हरमंदिर पटना साहिब में क्या पंजाब से है आई प्रबंधन की लड़ाई ?

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सिटी पोस्ट लाइव :तख्त श्री हरमंदिर पटना साहिब की प्रबंधन कमेटी का विवाद तूल  पकड़ता जा रहा है. कुछ महीने पहले तक खुले मंच पर धक्का-मुक्की और तलवारों के प्रदर्शन के बाद अब इस विवाद पर मुख्य ग्रंथी के खून की छीटें भी दिखाई दे रही है. ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि आखिर ऐसा क्या है कि गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी का विवाद सुलझने की बजाय खुनी संघर्ष की वजह बन गई है.तख्त श्री हरमंदिर पटना साहिब की कमेटी में विवाद पुराना रहा है. प्रबंधन कमिटी पर वर्चस्व कायम बनाए रखने की कोशिश में यहां दो पक्ष आपस में उलझते रहे हैं, लेकिन इस बार जिस विवाद के कारण यहां तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है. पुराने सेवादारों को हटाने का और नए को रखने को लेकर बड़ा विवाद पैदा हो गया है.

3 महीने पहले जब प्रबंधन कमेटी के अध्यक्ष ने 63 साल से अधिक के सेवादारों के रिटायरमेंट का मंच से ऐलान कर दिया तो कमेटी के ही सदस्य राजा सिंह मंच पर ही भीड़ गए.मंच पर धक्का-मुक्की शुरू हो गई और तलवारें खिंच गई. हालांकि, तब कोई खून-खराबा नहीं हुआ था, लेकिन यह संकेत मिल गए थे कि आगे यह विवाद हिंसा का रूप ले सकता है. यही वजह है कि इसके बाद से ही गुरुद्वारा में सुरक्षा बढ़ा दी गई थी.

अध्यक्ष के विरोधी गुट के कमेटी सदस्य का यह आरोप है कि अध्यक्ष ना केवल खर्च के मामलों में मनमर्जी चलाना चाहते हैं, बल्कि वह पुराने सेवादारों को हटाकर पंजाब के लोगों को नए सेवादार के तौर पर रखना चाहते हैं. तख्त श्री हरमंदिर सेवादार कल्याण समाज के मुख्य संरक्षक त्रिलोकी सिंह के मुताबिक, असल में पंजाब की गुरुद्वारा समितियों से जुड़े लोग पटना साहिब तख्त श्री मंदिर पर अपना प्रभाव कायम करना चाहते हैं. वह वर्तमान अध्यक्ष के जरिए पंजाब के लोगों को पटना साहिब में रखवा कर धीरे-धीरे पटना साहिब तख्त श्री हरमंदिर प्रबंधन पर भी अपना एकाधिकार स्थापित करना चाहते हैं.

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त्रिलोकी सिंह का कहना है कि पटना साहिब तख्त श्री हरमंदिर अपने रीति-रिवाजों और अपने स्थापित मान्यताओं के अनुसार चलता रहा है. इसे बदलने की कोशिश वर्तमान अध्यक्ष और उनके कुछ लोग कर रहे हैं.पंजाब के लोगों को रखने की मंशा से बिहार के सेवादारों को हटाने की बात से सचिव इनकार करते हैं. गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी के सचिव हरवंश सिंह के मुताबिक उम्र दराज सेवादारों को हटाने का फैसला 2019 में ही लिया गया था. सितंबर 2019 में तत्कालीन कमेटी ने नोटिस दिया कि ऐसे लाचार लोग जिनकी उम्र 63 साल हो चुकी है, वे पद छोड़ दें, लेकिन कई नोटिस के बावजूद इसे लोग अब भी नहीं मान रहे हैं और तरह-तरह के तर्क दिए जा रहे हैं.

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