By, Shrikant Pratyush
News 24X7 Hour

भगवान वेंकटेश्‍वर का धाम, शाम का मंजर कभी भुलाया नहीं जा सकता

- sponsored -

0

ढलती सांझ का वह मंजर कभी नहीं भुलाया जा सकता। तिरुपति से तिरुमाला पहाड़ी के सवा घंटे के सफर ने दिल्ली से 36 घंटे के ट्रेन के सफर की थकान को मानो खत्म कर दिया था। इस दौरान तीन हजार फीट से कुछ ज्यादा ऊंची पहाड़ी के ऊपर घुमड़ रहे काले बादलों और डूब रहे सूरज के बीच आंख-मिचौली चल रही थी।

Below Featured Image

-sponsored-

सिटी पोस्ट लाइव : ढलती सांझ का वह मंजर कभी नहीं भुलाया जा सकता। तिरुपति से तिरुमाला पहाड़ी के सवा घंटे के सफर ने दिल्ली से 36 घंटे के ट्रेन के सफर की थकान को मानो खत्म कर दिया था। इस दौरान तीन हजार फीट से कुछ ज्यादा ऊंची पहाड़ी के ऊपर घुमड़ रहे काले बादलों और डूब रहे सूरज के बीच आंख-मिचौली चल रही थी।

तो पेड़ों के बीच से आती ठंडी-सरसराती हवा उमस भरी गर्मी को दूर भगाने का सुखद एहसास करा रही थी। ऐसे में एक पेड़ की डाली पर बैठी गौरैया जैसी नन्हीं चिडि़या (संभवत: कॉरमोरेंट) अपना संतुलन बनाने की कोशिश कर रही थी, तो सड़क के किनारे की झाडि़यों में लगे कनेर जैसे पीले फूल झूम-झूमकर आपस में गले मिल रहे थे। आंखें थकावट भूलकर इन दृश्यों को अपने में भर लेना चाहती थीं। भगवान वेंकटेश्र्वर के धाम का यह अभिभूत करने वाला प्राकृतिक सौंदर्य था।

Also Read

-sponsored-

‘जय गोविंदा’ का उद्घोष
मेरे मन में भगवान वेंकटेश्र्वर के दर्शन की वर्षों पुरानी आस कुछ ही घंटों में पूरी होने की उद्विग्नता तो थी ही, दुनिया के सबसे ज्यादा दर्शनार्थियों वाले और सबसे ज्यादा चढ़ावे वाले मंदिर के बारे में नजदीक से जानने-समझने की उत्कंठा भी थी। आंध्र प्रदेश परिवहन की बस जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, अनुभवों को संजोती यह उत्कंठा भी बढ़ती जा रही थी। सफर पूरा हुआ। बस से उतरकर कुछ ही मिनट चला था कि केसरिया रंग की साड़ी पहने एक भद्र महिला ने गर्मागर्म उपमा से भरी कागज की प्लेट हाथ में थमा दी।
अन्‍‍न प्रसादम
पूछा तो जवाब मिला- अन्न प्रसादम! बदले में कुछ देने के लिए जेब में हाथ डाला तो विनम्रता से आगे बढऩे का इशारा कर दिया। तमाम भक्त अन्न प्रसादम ग्रहण कर रहे थे, खा रहे थे और प्लेट को डस्टबिन में डालकर पास लगे आरओ प्लांट से पानी पी रहे थे। इनमें तमिलनाडु के नंबर वाली पोर्शे से आया श्रद्धालु परिवार भी था, बेंगलुरु से आई आइटी पेशेवर युवाओं की टोली भी थी और मध्य प्रदेश के सागर जिले के एक गांव से साथियों के साथ आए किसान रोशन सिंह भी थे। भेदभाव का कहीं नामो-निशां नहीं था। जहां भाषा का भेद रास्ता रोकता था-वहां जय गोविंदा..का उद्घोष आगे का रास्ता बना रहा था। भगवान की धरती पर थोड़े अंतराल में दूसरा सुखद एहसास।

चौंकाते हैं तिरुमाला के इंतजाम

26 वर्ग किमी. का पहाड़ी पर बसा कस्बा। प्रतिदिन ६०-७० हजार से लोगों की आमद। लेकिन कहीं भी कूड़ा-करकट और अव्यवस्था का आलम नहीं। आखिरी बार बिजली कब गई थी, स्थानीय लोगों को याद नहीं। उत्तर भारतीयों और तीर्थों की यात्रा करने वालों को तिरुमाला की यह स्थिति चौंकाती है। यहां न तो पूजा सामग्री थमाने की होड़ है और न ही प्रसाद बेचने के लिए श्रद्धालुओं को घेरने की जुगत। न आवारा कुत्तों के झुंड हैं और न ही सड़क के किनारे भीख मांगने वालों की कतार। दक्षिण भारतीय व्यंजन की उपलब्धता तो सामान्य बात है, लेकिन तिरुपति और तिरुमाला में उत्तर भारतीय लोगों के लिए दाल-रोटी भी सुलभ है। मंदिर के आसपास के बड़े इलाके में निजी चौपहिया वाहनों के चलने पर रोक है। जिन साफ-सुथरी-चिकनी सड़कों पर वाहन चलते भी हैं, तो उनकी रफ्तार डराने वाली नहीं होती, कम आमद-रफ्त वाले इलाकों में भी वाहन धीमी रफ्तार से ही गुजरते हैं। शायद यह क्षेत्रीय संस्कृति का हिस्सा है।

सब कुछ है मुफ्त

साधन संपन्न तबके के लिए तो हर जगह रास्ता बन जाता है, लेकिन संसार के सबसे ज्यादा चढ़ावे वाले मंदिर में अल्प साधनों वाले लोगों के लिए भी चौड़ा रास्ता है। सरकारी ट्रस्ट की ओर से ठहरने और सामान रखने का इंतजाम मुफ्त है। वहां वितरित होने वाले अन्न प्रसादम के लिए कोई पैसा नहीं लिया जाता। कस्बे में कहीं जाने-आने के लिए मुफ्त सरकारी बस है। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर आरओ प्लांट से मुफ्त पेयजल की व्यवस्था है।

तिरुपति लड्डूू

भगवान की सर्वदर्शन वाली लाइन में लगने वालों का एंट्री कूपन फ्री बनता है। दो लड्डू वाले प्रसाद के लिए 20 रुपये वाली पर्ची कटती है, तो चार लड्डुओं के लिए 70 की पर्ची। जितने ज्यादा लड्डू-उतना ही महंगा प्रसाद। दर्शनार्थियों का अगला मुकाम मंदिर परिसर में बना बड़ा हॉल बनता है। प्रत्येक हॉल में करीब चार सौ लोग रोके जाते हैं और यहां उन्हें 12 घंटे तक रहना पड़ सकता है। यहां पर चाय, कॉफी, दूध, नाश्ते, खाने की मुफ्त व्यवस्था होती है। अन्य इंतजाम भी हैं। सद्भाव ऐसा कि एक ही लक्ष्य को लेकर देश-दुनिया से आए लोग कहीं लेटें-बैठें, उनके बीच जगह को लेकर कोई हील-हुज्जत नहीं होती।


भगवान से साक्षात्कार

घंटों के इंतजार के बाद जब दर्शन के लिए गर्भगृह की ओर जाने वाला रास्ता खोला जाता है, तब दर्शनार्थियों की भावनाओं का ज्वार देखने वाला होता है। यहां हर स्त्री-पुरुष, बुजुर्ग हो या नौजवान जल्द से जल्द भगवान तक पहुंचने के लिए एक-दूसरे को पीछे छोड़ना चाहता है। करीब 500 मीटर का संकरा-चौड़ा रास्ता भगवान के जयकारों के बीच कब पूरा हो जाता है, पता नहीं चलता। स्वर्ण पत्रों से ढके मुख्य मंदिर में पहुंचकर तो जोश हिलोरे मारने लगता है। कुछ लोगों की आंखों से तो खुशी के आंसू भी छलक पड़ते हैं। भगवान के सामने मनोकामना को बुदबुदाते हुए भक्त दर्शन के क्षणों को लंबा खींचने की हर संभव कोशिश करते हैं, लेकिन व्यवस्था में लगे लोग और पीछे के लोगों का दबाव उन्हें आगे बढ़ने को विवश कर देता है। कुछ क्षणों का भगवान का सामीप्य जीवन का अविस्मरणीय पल बन जाता है। चेहरे पर संतोष का भाव इसकी गवाही देता है।

लूट-खसोट का खतरा नहीं

यह दक्षिण भारत की संस्कृति का हिस्सा है। तिरुमाला में देर रात तक अकेले सड़कों पर घूमिए या भीड़ में शामिल होकर मंदिर की ओर बढि़ए, कहीं भी लुटने, पिटने या जेब कटने का खतरा नहीं। यहां खाकी की गैरमौजूदगी सोचने को विवश करती है। मुख्य मंदिर में गर्भगृह के बाहर सिर्फ एक कारबाइन धारी सुरक्षाकर्मी और एक-दो खाकी वर्दीधारी दिखाई दिए, लेकिन मंदिर परिसर ही नहीं आसपास का इलाके भी सीसीटीवी कैमरों से सघन निगरानी में हैं। सब जगह व्यवस्था की कमान भगवान की सेवा में जुटे स्वयंसेवकों के हाथों में है। इनमें बड़ी संख्या में कुलीन परिवारों की पढ़ी-लिखी महिलाओं की थी, जो एक सप्ताह या दो सप्ताह की नि:शुल्क सेवा के लिए भगवान के धाम आती हैं। वैसे, सरकार द्वारा संचालित देवस्थानम बोर्ड के स्थायी और अनुबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की बड़ी संख्या भी यहां तैनात है। व्यवस्थाओं के संचालन के लिए मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त हैं, जो वरिष्ठ आइएएस अधिकारी होते हैं।


भगवान की महिमा अपरंपार

भगवान विष्णु के अवतार माने जाने वाले भगवान वेंकटेश्‍वर के कई नाम हैं। उन्हें भगवान कृष्ण का प्रतिरूप माना जाता है, इसलिए उन्हें गोविंद भी कहा जाता है। तिरुमाला पहाड़ी पर स्थित मंदिर के गर्भगृह के निर्माण और उसमें मूर्ति की स्थापना के समय को लेकर इतिहासकारों में मतैक्य नहीं है। बुद्धिजीवी श्रद्धालु मंदिर के पांच हजार साल पुराना होने का दावा भी करते हैं, लेकिन 1100 साल पहले के पल्लव राजवंश के समय से मंदिर में पूजा-अर्चना होने का इतिहास में वर्णन है। अब हर साल करीब तीन करोड़ लोग भगवान के दर्शन के लिए तिरुमाला आते हैं। यह दुनिया के किसी भी धर्मस्थल में पहुंचने वाली श्रद्धालुओं की सबसे बड़ी संख्या है। ये लोग व्यक्तिगत रूप से इतना चढ़ावा चढ़ाते हैं कि यह मंदिर दुनिया का सबसे धनी धर्मस्थल बन गया है। गर्भगृह के नजदीक बड़े हॉल में दान हुंडियों में आए नोट गिनने में जुटे दर्जनों लोग इसकी ताकीद करते हैं। यहां नियमित रूप से आने वाले भक्तों में उद्योगपति मुकेश अंबानी हैं, तो अमिताभ बच्चन जैसे मेगास्टार भी।

तिरुपति में बड़ी संख्या में होटल और गेस्ट हाउस :

तिरुमाला में कुछ होटल और बड़ी संख्या में ट्रस्ट के गेस्ट हाउस- तिरुमाला के गेस्ट हाउस में 50 से 500 रुपये के सुविधाजनक रूम- गेस्ट हाउस रूम की ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा – तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम की वेबसाइट पर सभी आवश्यक सूचनाएं

-sponsered-

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

-sponsored-

Leave A Reply

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More