By, Shrikant Pratyush
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मां वन देवी करती हैं भक्तों की हर मुरादें पूरी, नवरात्र के मौके पर जुटती है हजारों की भीड़

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नवरात्र का महीना चल रहा है पूरे देश और प्रदेश में नवरात्रि की चारों तरफ धूम है और लोग नवरात्रि के इस पावन पर्व में भक्तिमय हुए हैं। हम बात करें ऐसे माता के मंदिर की जहां अगर भक्त सच्चे दिल से मांगे तो मां मनोकामना पूर्ण करती है। राजधानी पटना से 35 किमी दूर बिहटा के राघोपुर के कंचपुर मिश्रीचक में स्थित ऐतिहासिक माँ वनदेवी या कहे कनखा मंदिर की ख्याति दूर दूर तक फैली है।

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सिटी पोस्ट लाइव : नवरात्र का महीना चल रहा है पूरे देश और प्रदेश में नवरात्रि की चारों तरफ धूम है और लोग नवरात्रि के इस पावन पर्व में भक्तिमय हुए हैं। हम बात करें ऐसे माता के मंदिर की जहां अगर भक्त सच्चे दिल से मांगे तो मां मनोकामना पूर्ण करती है। राजधानी पटना से 35 किमी दूर बिहटा के राघोपुर के कंचपुर मिश्रीचक में स्थित ऐतिहासिक माँ वनदेवी या कहे कनखा मंदिर की ख्याति दूर दूर तक फैली है। भक्तों में ये मान्यता है कि इस मंदिर में आकर सच्चे मन से माँ से माँगने वाले हर भक्त की मुराद जरूर पूरी होती है। यूँ तो इस मंदिर में हर रोज भक्तों की भीड़ लगती है। लेकिन हर साल नवरात्र में यहाँ आने वाले भक्तों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। पूरे देश और प्रदेश से लोग नाराज के महीने में पूजा करने इस मंदिर में आते हैं. यहां तक कि बड़े बड़े अधिकारी भी इस मंदिर में माथा टेकने नवरात्र के महीने में आया करते हैं।

बात इस मंदिर के इतिहास की करें तो लगभग 400 वर्ष पूर्व माँ विंध्यावासिनी के पिंड का अंश लाकर उनके भक्त व सिद्ध पुरुष विद्यानंद मिश्र ने इनकी स्थापना करायी थी। चूंकि तब मिश्रीचक में काफी जंगल था इसलिये इनका नाम वनदेवी रखा गया। ऐसे तो इस मंदिर को लेकर कई किंवदंतियाँ है लेकिन जो सबसे प्रचलित है, उसमें माँ वनदेवी की स्थापना और अपने भक्त की लाज बचाने के लिए वनदेवी का कनखा माई बनना ज्यादा मशहूर है। बताया जाता है की विद्यानंद जी मिश्र कालांतर में माँ के बड़े भक्त थे। उन्हें लोग अद्भुत सिद्धि के कारण भी आज जानते है। विद्यानंद उनदिनों भी माँ विंध्यावासिनी ,वैष्णोदेवी और मैहर में जाकर पूजा अर्चना किया करते थे। वृद्धावस्था में जब उन्हें चलने में परेशानी होने लगी तो एक रात माँ विंध्यावासिनी उनके स्वप्न में आई। उन्होंने कहा कि हमारे पिंड का कुछ अंश लेकर चलो मैं तुम्हारे साथ चलूँगी।

विद्यानंद इस स्वप्न के बाद विंध्याचल गए और पिंड का अंश लेकर बिहटा के मिश्रीचक स्थित जंगल में पहुँचे। जहाँ एक जगह पर उनकी स्थापना कर प्रतिदिन पूजन करने लगे। उनदिनों बनारस के एक सन्यासी विद्यानंद की परीक्षा लेने के लिए भेड़ों का झुंड लेकर पहुँचा था। विद्यानंद वनदेवी मंदिर में ध्यान में लिन थे। सन्यासी ने अपने भेड़ों से कई सवाल कराकर उनके ध्यान तोड़ने की कोशिश करने लगे। इसपर विद्यानंद ने अपने आगे रखे कलश पर त्रिपुंड से स्पर्श किया तो भेड़ों के सवाल के जवाब उस कलश से निकलने लगे। सन्यासी को इस पर क्रोध आ गया और उसने कलश पर प्रहार कर दिया। जिससे उसका एक कनखा टूटकर अशोक के वृक्ष पर टंग गया। कहा जाता है की माँ वनदेवी अपने भक्त विद्यानंद के साथ सन्यासी द्वारा की जा रही धृष्टता पर क्रोधित हो गयी और उस टूटे कनखे ने उस सन्यासी को दंड देना शुरू कर दिया। माँ के क्रोध को शांत करने के लिए विद्यानंद ने अपना ध्यान तोड़कर क्षमा की अपील की तब जाकर उस सन्यासी की जान बची।

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वैसे आपको बता दें कि नवरात्र के महीने में मंदिर में पूजा करने दूर दराज से भक्त हर दिन आते हैं. अन्य दिनों में मंगलवार और रविवार को इस मंदिर में काफी संख्या में भक्तों की भीड़ देखी जाती है. ऐसा माना जाता है कि अगर इस मंदिर में भक्त सच्चे दिल से कोई भी मुरादें मांगे तो मां जरूर पूरा करती हैं. इसलिए इस मंदिर का इतिहास और शक्ति पूरे देश और प्रदेश में फैली हुई है. जिले के पुराने और सिद्ध मंदिरों में मां वनदेवी महाधाम भी काफी प्रसिद्ध है और काफी विख्यात है जिसके कारण पटना मुख्यालय में बैठे तमाम आईएएस, आईपीएस अधिकारी भी इस मंदिर में पूजा करने आते हैं।

वही मंदिर के प्रधान पुजारी सितलेश्वर मिश्र ने बताया कि 1600. ई में इस मंदिर मे राघोपुर मिश्रीचक के युगपुरुष विद्यानंद मिश्र के द्वारा मां विंध्यवासिनी के पिण्ड की स्थापना की गई थी. विद्यानंद मिश्र मां विंध्यवासिनी के परम भक्त थे और प्रतिदिन वो मिश्रीचक से अष्टभुजी मां विंध्यवासिनी के दरबार में पूजा करने जाया करते थे. उम्र ढलने के बाद मां उनके सपने में आए और मां के द्वारा ही उन्होंने मां विंध्यवासिनी के पिण्ड की स्थापना मिश्रीचक मां वनदेवी माता में की. जिसके बाद गांव के सभी लोग पूजा करने लगे और आज इस मंदिर का इतिहास और शक्ति सभी लोग को पता है. जिसके कारण प्रतिदिन मंदिर में लोगों की भीड़ होती है खासकर नवरात्र के पावन महीने में नौ दिन अखंड दीप जलते हैं और विशेष सिंगार के अलावा भजन भी होता है.

स्थानीय श्रद्धालु पवन पटेल बताते हैं कि मंदिर का इतिहास काफी गौरवशाली है और मां वनदेवी माहाधाम की विशेषता यह है कि मां विंध्यवासिनी के पिंड की स्थापना गांव के ही युगपुरुष विद्यानंद मिश्र के द्वारा किया गया था और जो भी भक्त सच्चे दिल से मां के मंदिर में आते हैं उनकी मां मुरादे जरूर पूरी करती है । नवरात्रि के महीने में काफी संख्या में दूरदराज से भक्त पूजा करने पहुंचते हैं हालांकि पिछले साल नवरात्रि में ज्यादा रौनक नहीं थी. लेकिन इस बार सरकार की तरफ से थोड़ी छूट मिलने के बाद मंदिर में भी काफी संख्या में भक्त पूजा करने पर भी दिन आ रहे हैं।

आपको बता दें नवरात्र के मौके पर वन देवी मां का विशेष श्रृंगार किया जाता. जिसे देखने और पूजा करने के लिए लोग दूर दराज से आते है। नवरात्र में नौ दिन माँ की विशेष आरती भी होती है । आज अष्टमी पूजा है और आज भी पूजा के लिए माँ वनदेवी मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ लगी है। वैसे बताते चले कि माँ वनदेवी की पूजा अर्चना करने मात्र से सारी मनोकामना पूरी होती है इसलिए हर दिन श्रद्धालु अपनी मनोकामना लेकर माँ के दरबार में पहुँचते है। वही नवरात्र के महीने में मंदिर की रौनक देखने लायक होती है।

पटना से निशांत कुमार की रिपोर्ट

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