By, Shrikant Pratyush
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बहू और बेटियों ने दिया अर्थी को कंधा, शुरू कर दी नई परंपरा.

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बहू और बेटियों ने दिया अर्थी को कंधा, शुरू कर दी नई परंपरा.

सिटी पोस्ट लाइव : अब मौत के बाद कंधा देने के लिए पुत्र जरुरी नहीं, बेटियां भी दे सकती हैं कंधा. नवादा में इस नयी परंपरा की शुरुवात हो गई है. नवादा के होम्योपैथिक चिकित्सक डॉक्टर सुधीर कुमार के पिता सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक दशरथ प्रसाद का निधन हो गया था. उन्हीं के अंतिम संस्कार के लिए परिजनों के साथ ही समाज की महिलाओं ने उनकी अर्थी को कंधा देकर एक नयी परंपरा की शुरुवात की.सुंदरा गांव में हुए अंतिम संस्कार में मृतक की पुत्री इंदु कुमारी, शिक्षिकाएं बहुएं प्रतिभा सिन्हा, संगीता सिन्हा, डॉक्टर अंशुमाला, समधन सुमित्रा, जानवी, एलिजा, सौम्या, सुरभि, जिज्ञासा, जूही, तान्या, तनु समेत परिवार-समाज की अन्य महिलाओं ने अर्थी को कंधा दिया.अर्थी जुलूस की खास बात ये रही कि पुरुष पीछे रहे.

इस दौरान मृतक के पुत्र अशोक कुमार व गौतम कुमार महिलाओं के पीछे शव को कंधा देते देखे गए. महिलाओं ने लोक परंपरा की  परवाह किए बगैर अर्थी को कंधा देकर शमशान तक पहुंचाया. महिलाओं ने रूढ़िवादी परंपराओं  (Traditions) को ठेंगा दिखाते हुए कुछ ऐसा कर दिखाया कि पूरे समाज लिए मिसाल बन गईं. रोह प्रखंड क्षेत्र के सुंदरा गांव की ये महिलायें अर्थी को कंधा देकर मिसाल बन गई हैं. आमतौर पर महिलाएं अर्थी को कंधा नहीं देतीं, लेकिन अर्जक संघ की पहल पर महिलाओं ने अर्थी को कंधा देकर लोगों को रूढ़िवादी परंपरा को तोड़ने का संदेश दिया.

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महिलाओं ने केवल अर्थी को कंधा ही नहीं दिया  बल्कि उन्होंने अर्थी को कंधा देकर शमशान तक पहुंचाया और मुखाग्नि के पहले होने वाले विधान में पुरुषों के बराबर भाग लिया.दरअसल हिंदू समाज में पुरातन काल से ही महिलाओं का श्मशान क्षेत्र में जाना वर्जित माना जाता है. लेकिन बदलते दौर में यहां इस परंपरा को भी तोड़ कर समाज की महिलाओं को प्रेरित किया.

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